ज़िन्दा रहूँगा

राहुलदेव गौतम

शाश्वत सच के,
अभिव्यक्ति में ज़िन्दा रहूँगा।

मिट जायेगा,
यह क्षणिक शरीर,
किसी न किसी नाम में ज़िन्दा रहूँगा।

ख़ुशियों के रोशनी में,
मेरा अक़्स न पाओगे तुम,
मैं अन्धेरों की शक्ल में ज़िन्दा रहूँगा।

तुम्हें किस बात का रंज है,
किस बात की तकलीफ़,
कम से कम इन्हीं कसक में ज़िन्दा रहूँगा।

न दिन में रहूँगा,
न रात में रहेगा मेरा वजूद,
उगते सूरज ढलते सूरज में ज़िन्दा रहूँगा।

तुम किसी नग़मों को न समझो,
कोई साज तुम्हें न आये,
ध्यान तो लगाना एक बार,
शुरू के कड़ी में आख़िरी कड़ी में ज़िन्दा रहूँगा।

पत्थरों को जोड़ जब बनेगा,
किसी आशियानों का हरम,
देखना किसी गिरती दीवार में ज़िन्दा रहूँगा।

पढ़ना जब तुम कोई तहरीर,
कहानी हो या दुःख की तस्वीर,
किसी पन्ने पर एक शब्द में ज़िन्दा रहूँगा।

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