लोकतंत्र!

मेरे गाँव में

किसी मरे हुए

जानवर की लाश की तरह है

जिसके चारों ओर

कुछ मेरे गाँव के कुत्ते

कुछ दूसरे गली,

नगर के कुत्ते

उसके प्राण हीन

मांस को नोचने के लिए

एक-दूसरे पर घिघिया रहे हैं

मगर जो किसी से भी

घिघिया नहीं रहा,

वह चुपचाप खाये जा रहा है

और

कौवों के काँव-काँव

चीलों की चिचिहाते

आवाज़ों के बीच

मैं और अबोध बालक की तरह

मेरी जनता

चुपचाप तमाशा देखे जा रही है।

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