मरी हुई साँसें – 002 

15-09-2021

मरी हुई साँसें – 002 

राहुलदेव गौतम

1.
तुम्हें महसूस ना करने के लिए
मैं भले ही बेचैन हुए जा रहा हूँ,
असल में
तुम मुझे महसूस ना हो
बस एक असर . . .
सहारा ले रहा हूँ।
 
2.
तुम रोशनी से उतरो
मैं आज स्मृतियों का
यज्ञ कर रहा हूँ।
मैं ख़ुद से ख़ुद की
समिधा भर रहा हूँ . . .
अब तो चली,
आओ!!!
 
3.
मैं एक-एक करके,
टूट रहा था।
जब-जब तुम्हें ख़ामोश,
देख रहा था।
तुम्हारे जाने के बाद
अब मैं कुछ रहा ही नहीं।
 
4.
तुम इन नज़ारों से निकलकर
क्यों नही आ जाते अब,
मैं उद्भट मिलन के
आख़िरी किनारे पर खड़ा हूँ।
 
5.
तुम क्यों पूछ बैठते थे
मेरी हथेलियों से . . .
अपने सुनहरे बालों की चमक,
जो आज तुम्हारी स्मृतियों का
शव ढोए जा रही हैं।
 
5.
अब,
जब भी तुम्हें
याद करना होता है
किसी शाम!
मैं अब,
एक ख़ामोशी सहेज लेता हूँ।
 
6.
अगर अदब से कहूँ
तो मेरा लिखना . . .
एक बचकाना प्रयास है।
अगर स्वाभिमान से कहूँ
तो मेरा लिखना . . .
एक भूखे-प्यासे
तकलीफ़ों से त्रस्त
एक व्यक्ति का एकांत बयान है।
 
7.
अगर हलक़ के
सफ़ मक़बूलियत से कहूँ तो,
मैं किस अनजान सच के लिए
जीये जा रहा हूँ मुझे नहीं पता।
 
8.
तुम्हारे सच से,
एक दिन,
हम ऐसे ही
बाहर आये होंगे . . .
जब तुम्हारे कटे हाथ से
लगातार ख़ून बहे होंगे।
 
9.
तुम्हारी यादों में
जीने से अच्छा है
तुम्हारी यादों को अपना लेना
ज़्यादा अच्छा है।
 
तुम्हारी यादों में
जीने से अच्छा है,
तुम्हारी यादों में,
मरना!
ज़्यादा अच्छा है।
 
10.
ये धूप और अँधेरे
इनमें मैं हूँ,
या यह मुझमें हैं!
हम तीनों ताक रहे हैं
किसी के क़दमों की आहट!

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
नज़्म
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में