गेहूँ और मैं

01-07-2020

गेहूँ और मैं

राहुलदेव गौतम

जब जब मैंने
गेहूँ को काटा
मेरे हाथ ख़ून से सने
जब जब मैंने
गेहूँ को खाया
मेरा चेहरा ख़ून से लथपथ था
मैं कैसे भूल गया
इस गेहूँ की उपज
यूँ ही नहीं हुई थी...
मेरे गाँव के
किसानों के ख़ून का क़तरा क़तरा
उन खेतों में फैला हुआ था
काँपते हाथों से
मैंने उस पेड़ से
वह रस्सी उतारी थी
जो हमारे खेतों की मेड़ पर थी
जिसके फंदे पर लटक रहे थे
मेरे गाँव के चार किसान
जिसमें एक लाश
मेरे दादा जी की थी।

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