चौबीस घंटे में

15-01-2021

चौबीस घंटे में

राहुलदेव गौतम

मैं जी लेता हूँ ख़ूब,
सब दु:ख-दर्द भूल जाता हूँ
जब किसी बच्चे को गले लगाता हूँ
उसे दुलारता हूँ,
उसके साथ हँसते,
उसे गोद में उठाता हूँ,
उसके साथ बच्चा बन जाता हूँ,
बस उसके साथ ख़ूब
जी लेता हूँ।
 
मगर
मैं मरता भी हूँ
ख़ूब जल्दी
पल-पल जब यह याद करता हूँ कि...
जिससे मैं इश्क़ हक़ीक़ी,
करता था,
हालात से हार कर
अब उसे,
मैं प्यार नहीं करता हूँ
मैं उसे भूला करता हूँ
अब किसी से बात नहीं करता हूँ
अब कोई काम नहीं करता हूँ
वो अब मेरे बारे में क्या,
सोचती होगी?
उफ्फ!
अभी-अभी हृदय की गति
थम गई मेरी!

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में