यह थप्पड़ भी न माँ-बाप की तरह होते हैं,
नाराज़ तो बहुत होता है मन इनसे,
लेकिन हमेशा अच्छा होता है।

 

यह रिश्ते भी न पुल की तरह होते हैं,
ना जाने कब टूट जाए, गिर जाए
कोई अंदाज़ा नहीं होता है।

 

सर, सर, सर, सर, सरसराहट
यह हवा रोज़ गीत सुनाती है कानों में,
या दबी-दबी आवाज़ में,
किसी की शिकायत कर जाती है मुझसे
कुछ पता ही नहीं चलता है।

 

फिर से मन के हल्कूआ ने
जीवन के खेत में दो आँखें बोयीं थीं,
लेकिन फिर किसी आग ने,
उसकी इस फ़सल को जला दिया है,

आज भी कहीं हल्कूआ
किसी मेड़ पर बैठा रोये जा रहा है।

 

तुम्हारे घर के छत से चाँद क्या निकला,
आधी रात में जगा... कि,
सूरज की सुबह वाली किरनें आ गईं,
तो निकल पड़ा मज़दूरी करने,
कुछ ख़्वाहिशों का पेट भरने के लिए।

 

सुना है तुम्हारे यहाँ रुस्वाइयाँ बाँटी जाती हैं,
ज़रा एक मेरे लिए भी ला देना,
पता चला है कि आजकल दुःख सस्ते हो गये हैं।

 

अब जाकर पता चला मुझे,
लोगों का दिल इतना कठोर क्यों हो गया है,
कितने मज़बूत होते जा रहे हैं सब,
क्योंकि बाज़ार में बेजोड़ सीमेन्ट का दौर चल पड़ा है।

 

कुछ लोग सड़कों पर यूँ ही नहीं बैठते हैं जनाब, 
पेट हमेशा खाने से ही नहीं भरता है,
कभी-कभी धूल से भी भर जाता है जनाब।

 

मैं तो बात-बात पर,
सिगरेट ही जलाता हूँ हुजूर!
यहाँ न जाने कितने,
बात-बात पर घर जला जाते हैं।
फिर भी मैं.......

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