तेजेन्द्र शर्मा  बहुमुखी पप्रतिभा के साहित्यकार हैं। प्रवासी कहानियों में उनका कोई तोड़ नहीं है। कहानियों की प्रस्तुति इतनी मार्मिक और शानदार करते हैं कि लगता है कोई फ़िल्म चल रही है। बहुत कम लोग जानते हैं कि कविता तेजेन्द्र शर्मा की प्रिय विधा है। वह जिस मन से कविताएँ और ग़ज़लें लिखते हैं उसी मन से उसे पढ़ते और गाते भी हैं। तेजेन्द्र शर्मा की कविताओं पर पर कुछ लिखूँ उससे पहले एक कहानी सुनाती हूँ। 'बात उन दिनों की है जिन दिनों हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर बंगला के अप्रतिम कथाकार शरत चंद्र की जीवनी 'आवारा मसीहा' लिख रहे थे। उन्हीं दिनों शरतचंद से मिलने के लिए जब वह बंगाल पहुँचे तो पता चला कि, आजकल शरतचंद किसी वेश्यालय में रह रहे हैं। अपने प्रिय रचनाकार की इस घटना ने विष्णु जी को अचंभित किया। वह जानते थे शरत चंद महान और लोकप्रिय साहित्यकार हैं… आगे पढ़ें
हिन्दी भाषा साहित्य में कथाकार श्री तेजेन्द्र शर्मा की पहचान विश्व-व्यापी है। उनकी जीवन-यात्रा के समान ही कहानियों की यात्रा ने "जितनी ज़मीं उन्हें मिली, उतना आसमां छुआ है”। वैसे तो गीत लिखे जायें, कविता, या कहानी लेखक की संवेदनाओं की झलक उनमें व्याप्त होती है।  लेखक को एक व्यक्ति की भूमिका में देखने का अवसर मुझे वर्ष 2018 में मिला जब मैं पारिवारिक यात्रा पर लंदन (यू.के.) गई। मैंने तेजेन्द्र जी के दो कहानी संग्रह, ग़ौरतलब कहानियाँ और बेघर आँखें, भारत में पढ़े थे। लंदन के नेहरू सेन्टर में एक साहित्यिक सम्मेलन में आदरणीय से भेंट हुई। वे अपने किरदार में भी उतने ही सच्चे दिखे जितना वो अपने लेखन में होते हैं। किसी प्रतिष्ठित साहित्यकार से जिस तरह मिलते हैं वैसे ही एक नये उभरते हुए रचनाकार के प्रति आदर/स्नेह भाव रखते हैं। तेजेन्द्र जी ने मुझे कथा यू.के. के एक आयोजन में रचना पाठ हेतु… आगे पढ़ें
आज सौ वर्षों से अधिक की हो चुकी हिंदी कहानी ने अपनी इस विकास-यात्रा में विभिन्न आन्दोलनों और विमर्शों से गुज़रते हुए परिवर्तन के विविध पड़ावों को पार किया है। इस कालखण्ड में हिंदी कहानी युद्ध के मैदानों से सड़कों, सड़कों से घरों और घरों में रसोई से लेकर शयनकक्ष तक पहुँची है। सरल शब्दों में कहें तो हिंदी कहानी के विषयों का फलक इन सौ वर्षों में निरंतर रूप से विस्तार को प्राप्त हुआ है; और तेजेंद्र शर्मा की कहानियाँ भी अपने में इसी विस्तार के एक बड़े हिस्से को समेटे हुए हैं। 1980 में ‘प्रतिबिम्ब’ नामक कहानी से अपने कथा-लेखन का आग़ाज़ करने वाले तेजेंद्र शर्मा की कहानियों में समय के साथ कथ्य के स्तर पर व्यापक परिवर्तन दिखाई देते हैं। देखा जाए तो तेजेंद्र शर्मा के समग्र कथा-साहित्य के विषयों के तीन स्रोत प्रतीत होते हैं। एक, जो खुराक जीवन से उन्हें मिली यानी जो… आगे पढ़ें
बदलते समय के परिदृश्‍य में हिंदी कथा साहित्‍य का क्षेत्र भी बदला है और आज हम सभी इस बदलाव को पूरी तरह से न सही परंतु आंशिक रूप से थोड़ा और अधिक स्‍वीकार कर चुके हैं या यूँ कहें कि हम स्‍वीकार कर रहे हैं।  प्रश्‍न यह है कि किस स्‍वीकारोक्‍ति की बात हो रही है? तो उत्‍तर है कि भारत से इतर रचे जाने वाले साहित्‍य की। प्रत्‍येक देश और उस देश में स्‍थित समाज का अपना कोई न कोई महत्‍व होता है। वह महत्‍व सामाजिक क्षेत्र का भी हो सकता है, आर्थिक क्षेत्र का भी और राजनैतिक क्षेत्र का भी हो सकता है और सांस्‍कृतिक क्षेत्र का भी।  परंतु हर वह देश प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति के लिये महत्‍वपूर्ण एवं सुखद अनुभूति प्रदान करनेवाला होता है, जहाँ उसके नागरिक सुखी एवं स्‍वतंत्र रूप से निवास कर सकें। वह देश एवं उसका समाज तभी अपने नागरिकों के लिये गौरव… आगे पढ़ें
समकालीन प्रवासी कथा साहित्यकारों में तेजेन्द्र शर्मा का नाम चर्चित कहानीकारों में से है। प्रवासी साहित्यकार अपनी अन्वेषणीय व मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के माध्यम से न सिर्फ़ भारतीयों बल्कि पश्चिमी संस्कृति से जुड़े लोगों की वेदनाओं और पीड़ाओं को महसूस करके, न‌ई-नई कथाओं का सृजन कर रहे हैं। इससे कथा संसार को बहुत विस्तार मिला है। जो भारतीय विदेशों में नौकरियाँ करने जाते हैं वे अपने परिवेश और आत्मीय संबंधों से दूर रहकर एक नई दुनिया बसाते हैं। उनके लिए वहाँ की संस्कृति, स्थितियों-परिस्थितियों और लोगों के साथ तारतम्य स्थापित करना आसान नहीं होता है। जिसकी वज़ह से अनगिनत द्वंद्वों-अंतरद्वंद्वों से उनका सामना होता है और बहुत-सी समस्याएँ सामने आती हैं जिनको एक उत्कृष्ट साहित्यकार अपनी सूक्ष्म दृष्टि से पकड़ कर कहानियों या कविताओं का रूप देता है। अगर हम तेजेंद्र शर्मा जी की कहानियों की बात करें तो उनका अन्वेष्णात्मक दृष्टिकोण ही उनकी कहानियों को विषयगत विविधता देता… आगे पढ़ें
हमें अपने जीवन कला, संस्कृति, साहित्य, रंगमंच आदि के क्षेत्रों में कुछ ऐसे व्यक्तित्व मिलते हैं जिन्हें हम चलती फिरती संस्था कह देते हैं। ये लोग अपनी अद्भुत प्रतिभा से हमें प्रभावित करते रहते हैं। ब्रिटेन के साहित्य एवं समाज से जुड़े कथाकार तेजेन्द्र शर्मा एक ऐसी ही शख़्सियत हैं। यह कहना अनुचित न होगा कि अभिमन्यु अनंत के बाद प्रवासी साहित्य का सबसे पहचाना नाम तेजेन्द्र शर्मा ही है। तेजेन्द्र शर्मा किसी एक विधा से जुड़े व्यक्ति का नाम नहीं है। वे कहानीकार, कवि, ग़ज़लकार, मंच अभिनेता-निर्देशक, सिनेमा कलाकार, टीवी सीरियल लेखक, रेडियो पत्रकार, संपादक, मंच संचालक होने के साथ साथ ’कथा यूके’ संस्था के महासचिव भी हैं। हिन्दी भाषा और साहित्य को ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स एवं हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में ले जाने का श्रेय हम सीधे-सीधे तेजेन्द्र शर्मा को दे सकते हैं।  तेजेन्द्र शर्मा ब्रिटेन के एक अकेले कथाकार हैं जिनके लेखन… आगे पढ़ें
मनुष्य जन्म व्यक्ति को मिला एक अनमोल वरदान है। जीवलोक की अनेक लक्ष योनियों से गुज़रकर मनुष्य जन्म मिलता है। मनुष्य की विशेषता यह है कि वह परिवार बनाकर रहता है। उसका परिवार उसके जीवन की ऊर्जादायिनी शक्ति होती है। परिवार नामक शक्ति की सहायता से ही वह जीवन में आनेवाली असंख्य बाधाओं का हँसकर सामना करते हुए उन पर विजय प्राप्त करता है। माँ, बाप, पति, पत्नी, बेटा, बेटी, भाई, बहन आदि अनेक सदस्यों से परिवार नामक इकाई बनती है। परिवार से ही समाज बनता है। इस समाज को आगे बढ़ानेवाली संस्था के रूप में विवाह संस्था सर्व प्रचलित है। वैवाहिक संस्कार से ही दो अपरिचित स्त्री और पुरुष प्रेम के बंधन में बँधकर अपना सारा जीवन व्यतीत करते हैं। विश्वास की डोर थामे दो अपरिचित स्त्री-पुरुष आजीवन एक-दूसरे का सुख-दुःख में साथ देते हुए प्रेमपूर्वक जीवन जीते हैं। उनके जवीन की नाव विश्वास के भरोसे ही… आगे पढ़ें
विश्व में भूमंडलीकरण की प्रक्रिया बहुत पहले शुरू हो चुकी थी, जिसके तीन चरण देखे जा सकते हैं लेकिन यहाँ विशेषतः अन्तिम चरण अर्थात् 1990 के बाद के भूमंडलीकरण एवं इसकी स्थिति को समझने की आवश्यकता है। यह एक ऐसी वैश्विक परिघटना है जो वैश्विक परिदृश्य पर आधारित है। समस्त विश्व की अर्थव्यवस्थाओं का एकीकरण भूमंडलीकरण का आधारभूत तत्व है, जिसमें माल, सेवा, वित्त, सूचनाएँ संस्कृतियाँ सभी कुछ परस्पर देशों में अबाधित रूप से प्रवाहित होती हैं। इसके अंतर्गत आर्थिक गतिविधियाँ स्वतंत्र बाज़ार के नियमों से संचालित होती हैं और बाज़ार का महत्त्व बढ़ने लगता है। परिणाम स्वरूप कॉरपोरेट जगत के अधिकार क्षेत्रों का विस्तार होने लगता है। दरअसल वैश्वीकरण का आधार ही बाज़ार और उपभोक्तावाद है जो विश्व की स्थानीय एवं सांस्कृतिक भिन्नता को एक रंग में रँगना चाहती है। यदि कहें तो भूमंडलीकरण एक ऐसी आँधी है जिसने तमाम विश्व की अस्मिताओं के समक्ष उनके अस्तित्व… आगे पढ़ें
वरिष्ठ साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा के कृतित्व पर लिखना, चुनौती भरा काम है। एक ऐसा साहित्यकार जो भारत में रहते हुए वैश्विक साहित्य रच रहा था और अब वर्षों से विदेश में रहते हुए वैश्विक साहित्य के साथ-साथ भारतीय संस्कृति पर भी लिख रहा है। जिसकी हर कहानी नया विषय, नया थीम लिए होती है। जो यह मानता है कि जब तक कुछ नया कहने को ना हो, नहीं लिखना चाहिए! यानी हर बार कुछ नया रचें! नयेपन की ललक के बावजूद शर्मा जी की कहानियों में मौत, स्त्री विमर्श और मानवीय संवेदनाएँ स्थायी चरित्र के रूप में विद्यमान रहते हैं। तेजेन्द्र शर्मा की अब तक प्रकाशित लगभग अस्सी-ब्यासी कहानियों में अनेक बार मौत का चित्रण हुआ है परन्तु हर बार मौत अलग-अलग चरित्रों में, अलग सामाजिक स्तर में और बिल्कुल पृथक अंदाज़ में आती है। कभी-कभी ऐसा भी हुआ कि शब्दों के माध्यम से चरित्र की मौत हुई… आगे पढ़ें
विश्व रंग, भोपाल द्वारा आयोजित कार्यक्रम में सुषम जी और अन्य विशिष्ट व्यक्तियों से सम्मान ग्रहण करते हुए जिंदगी को गूंगा करता मौत को वाचाल वक्त क्यों  मुझसे, तुमसे  बड़ा हो जाता है - सुषम बेदी मेरी पुस्तक ‘प्रवासी लेखन : नयी जमीन : नया आसमान’ की पांडुलिपि तैयार थी। पुस्तक की भूमिका किसी वरिष्ठ लेखक से लिखवाने के अनुरोध के लिए विचार कर रहा था। प्रवासी साहित्य में सुषम बेदी जी के योगदान को देखते हुए लगा वही इस कार्य के लिए सर्वाधिक उपयुक्त रहेंगी।  ब्रिटेन में जल्दी ही पुस्तक का लोकार्पण होना था। मैं संकोच में था! क्या वें इतनी जल्दी लिख पाएँगी! मैं उन दिनों फीजी के भारतीय हाई कमीशन में काम कर रहा था। वहाँ से मैने पुस्तक की पांडुलिपि के साथ एक मेल भेजा जिसमें मैंने सुषम बेदी जी से पुस्तक की भूमिका लिखने का अनुरोध किया। दो दिन बाद मेरे पास सुषम जी… आगे पढ़ें
सन्दर्भ : कितने-कितने अतीत     किसी भी साहित्यकार के लिए उसका देशकाल भौगोलिक जगत या समय से निश्चित नहीं होता। निश्चित होता है मानवीय संवेदना के ग्राफ से जिसके पैमाने हर व्यक्ति के लिए अपने-अपने होते हैं लेकिन अपने मूल रूप में वह निज से मुक्त होकर व्यापक मनुष्यता से जुड़े होते हैं। सुषम बेदी की कहानियाँ बार-बार इसी सत्य का एहसास कराती हैं। इन कहानियों के केंद्र में परिस्थितियाँ या जीवन-स्थितियाँ छोटी-छोटी हैं यानी हमारी रोज़मर्रा के जीवन में आने वाली असंख्य स्थितियाँ जो अक्सर हमारी नज़र से छूट जाती हैं या जिनको कभी हमने इतना महत्व नहीं दिया कि वह साहित्य के माध्यम से मानवीय सभ्यता के संकट को निर्देशित कर सकें। सुषम जी अपनी सूक्ष्म दृष्टि से इन्हीं जीवन स्थितियों को अपने साहित्य में पुनर्जीवित करती हैं और बड़े धैर्य के साथ छोटे-छोटे ब्योरे, छोटे-छोटे प्रसंग जीवन व्यापी प्रश्नों को हमारे समक्ष उपस्थित कर देते… आगे पढ़ें