डायन

सुनील कुमार शर्मा  (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

वह रात के भयानक सन्नाटे में, पहाड़ की उस पगडण्डी पर तेज़ी से बढ़ता जा रहा था। जिस पर लोग दिन में भी अकेले जाने से डरते थे।

वह सोच रहा था—किसी कुँए में डूबकर अथवा किसी गाड़ी के नीचे कटकर मरने से अच्छा है, उस कलेजा निकालने वाली डायन से कलेजा निकलवा लिया जाए। जिससे बिना किसी ज़्यादा तकलीफ़ के पत्नी की रोज़ की झख-झख, और लेनदारों की गालियों से छुटकारा मिल जाएगा, और वह दुनियादारी से मुक्त हो जाएगा।

यह सोचते हुए, वह उस पगडण्डी के एक मोड़ पर सीधा उसी डायन से कब टकरा गया, उसे पता भी ना चला। उसकी टक्कर से वह नीचे गहरी खाई में गिरते-गिरते बची; क्योंकि उसने, उसे गिरने से बचाने के लिए अपना दाहिना हाथ उसकी कमर में डाल दिया, और इस प्रयास में बायाँ हाथ उसके चेहरे पर ज़ोर से लगा; जिससे डायन का मुखौटा दूर जा गिरा।

चाँदनी रात में डायन का असली चेहरा देखकर, उसके। मुँह से निकला, “डोलु की बहू . . .?” फिर वह वस्तुस्थिति को समझकर चिल्लाया, “तुम्हीं ने डायन बनकर इतने लोगों को मारा है . . . . . . मैं तुम्हें छोड़ूँगा नहीं . . . पुलिस के हवाले करूँगा . . .”

जिसे सुनकर, वह कुछ ना बोली। दो क़दम पीछे हटी और गहरी खाई में कूद गई। नुकीले पत्थरों से टकराती हुई, नीचे दूर तक लुढ़कती चली गई।

वह घबरा कर वापस घर की तरफ़ भागा। और चुपचाप जाकर अपनी उस चारपाई पर लेट गया; जिसपर से उठकर वह आत्महत्या करने के लिए निकला था। रात आधी से ज़्यादा बीत चुकी थी, इसी घटना को सोचते-सोचते, सवेर हो गई; पर वह उठा नहीं।

तभी उसकी पत्नी की आवाज़ आई, “. . . उठो भी, कब का दिन निकल चुका है . . . खटिया पर पड़े-पड़े पता नहीं क्या झख मार रहे हो, बाहर जाकर देखो क्या हो गया है।”

“. . . क्या हुआ?” उसने चादर से बाहर मुँह निकालते हुए पूछा।

“. . . डोलु की बहू का भी, कलेजा निकालने वाली डायन ने कलेजा निकाल लिया है . . . पता नहीं रात को वह उधर क्यों गई थी . . . या डायन ही उसे उठाकर ले गई?” पत्नी हैरान होकर बोली। 

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