धिक्कार है तुम पर!

01-02-2026

धिक्कार है तुम पर!

कृषभो (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

धिक्कार है तुम पर, 
मेरी कोशिशों ने
तुम्हें सहूलियत दी, 
और तुम्हारा ये एटीट्यूड, 
जैसे तुम्हें भाग्य पर नाज़ हो। 
तुम नस्ल के कलंक
पहले नहीं हो, 
पहले भी हुए हैं
तुम्हारे जैसे कुछ मूर्ख, 
जिन्होंने निरा व्यर्थ ही समझा
उनके लिए हुए बलिदानों को, 
सीढ़ियों को, 
खप गई पीढ़ियों को; 
रो घिघिया कर
वो बेख़ुद्दार जब बड़े हुए, 
किसी के संघर्ष और साहस से जब खड़े हुए; 
तो वो भी मुस्कराये थे
अपने भाग्य का बखान करके, 
आज मिलते हैं कभी कभी
मानसिक विकलांग हों जैसे
ठहरे हुए सड़े पानी की तरह, 
तुम उन्हीं के अतीत का ‘आज’ हो; 
धिक्कार है तुम पर
मेरी कोशिशों ने तुम्हें सहूलियत दी, 
और तुम्हारा ये एटीट्यूड, 
जैसे तुम्हें भाग्य पर नाज़ हो। 

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