बेटियाँ

15-03-2026

बेटियाँ

कृषभो (अंक: 294, मार्च द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

वो आँगन जिसमें घुटनों से चलना सीखा, 
वही आज एक पराई जागीर हो गया, 
ब्याह की रस्म क्या हुई, रूह पर बँधन लग गए, 
हक़दार से हाथ, एक पल में ‘मेहमान’ हो गया। 
पिता ने तिलक लगाया, और कह दिया
“अब ये घर तुम्हारा नहीं, वो घर तुम्हारा है,”
पर कोई उस पिता से पूछे, क्या दिल के कोनों में, 
बेटियों के बचपन का अब भी गुज़ारा है?
 
फ़र्ज़ की पोटली कांधे पर उठाए वो चली गई, 
पीछे छूट गई वो खिलखिलाहट, वो नादानी, 
मगर अजब रीत है इस दुनिया की, 
बेटे को विरासत मिली, और बेटी को बस कहानी।
 
उसने कभी हिस्सा नहीं माँगा, न ज़मीन, न सोना, 
उसकी मुट्ठी में तो बस पिता का मान था, 
जिस पिता ने उसे अपनी जागीर से बेदख़ल किया, 
वही पिता उसकी दुनिया का कुल आसमान था।
 
वो महान है, जो ख़ाली हाथ विदा होकर भी, 
मन के संदूक में पिता की यादें सहेजती है, 
हक़ की लकीरें ज़मीन पर खिंचती होगी, 
पर बेटियाँ तो दुआओं में उम्र भर पिता को भेजती हैं। 

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