मेरे प्रेम का तिरस्कार, मुझे सहर्ष है स्वीकार

01-03-2021

मेरे प्रेम का तिरस्कार, मुझे सहर्ष है स्वीकार

संजय कवि ’श्री श्री’

मेरे प्रेम का
तिरस्कार,
मुझे
सहर्ष है स्वीकार।
मुक्त कर दो
मोह से अपने,
टूट जाने दो
कुछ सपने।
बनने दो
मुझे साधक तुम,
मत बनो
बाधक तुम।
जाना है
मुझे लक्ष्य तक,
अमिट
अटल सत्य तक।
होने दो
कर्म-बोध अंगीकार,
वही तो है
जीवन का आधार।
मेरे प्रेम का
तिरस्कार,
मुझे
सहर्ष है स्वीकार।

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