वनमंत्री जी, एक वन का अवलोकन कर रहे थे। तभी उन्हें वन में घूमता हुआ, एक जंगली कुत्ता पसंद आ गया। मंत्री जी के आदेश से, वह कुत्ता तुरंत उनकी कोठी में पहुँचा दिया गया।

वह कुत्ता मंत्री जी की कोठी का माल खा-खाकर खूब मोटा-ताज़ा हो गया! पर वह जंगली होने के कारण भौंकता नहीं था। मंत्री जी ने बड़े-बड़े श्वान विशेषज्ञओं को बुलाया; पर वह उसे भौंकना ना सीखा सके। नेताजी का कुत्ता होकर भौंकें ना? यह तो समस्त नेता बिरादरी के लिए बड़ी शर्म की बात थी। जिससे मंत्री जी, उस कुत्ते को पुनः जंगल में छोड़ने पर विचार करने लगे। पर अचानक एक करिश्मा हो गया। हुआ यह कि वह कुत्ता, ग़लती से उस समय नेताजी के साथ संसद भवन पहुँच गया, जब संसद में किसी विधेयक पर ज़ोरदार बहस चल रही थी। उस बहस का उस कुत्ते पर ऐसा असर हुआ कि वह चुप कराने से भी चुप नहीं होता, बस लगातार ज़ोर-ज़ोर से भौंकें जा रहा है।

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