01-09-2019

कितना मीठा है यह अहसास

सुमन कुमार घई

प्रिय मित्रो,

पिछले कुछ दिनों से सुबह बाहर जब बग़ीचे में निकलता हूँ, तो हवा में आने वाली ऋतु का आभास होने लगा है, हल्की ठंडक है, ताज़गी है। 

ऋतु बदलने की तैयारी में है; उमस समाप्त हो चुकी है। कल मैंने ऋतु के दो नन्हे शिशु देखे। एक छोटा सा “सीगल” हवा में तिरता हुआ गाड़ी के आगे से निकल गया और घर के समीप पहुँचने से थोड़ी दूर पहले एक छोटी सी गिलहरी को फुदकते हुए सड़क पार करते देखा तो स्वतः पैर ब्रेक पर चला गया। इन बच्चों को देखते हुए कार की पिछली सीट पर बेबी-सीट में बैठे अपने पौत्र की ओर ध्यान केन्द्रित होने लगा। 

युवान बाईस महीने का हो गया है। नन्ही-नन्ही शरारतें करने लगा है। सुबह अपने बेटे के घर जाकर उसे ले आता हूँ। सारा दिन हम दोनों उसे अपने पास रखते हैं और शाम को वापिस छोड़ आते हैं। दिनचर्या का निर्धारण नन्हे युवान पर निर्भर है। ड्राईव-वे में कार पार्क करते ही, वह चहक उठता है कि दादी-माँ का घर आ गया। अभी थोड़ा-थोड़ा बोलने लगा है। कार का पिछला दरवाज़ा खोल कर जब उसकी सीट-बेल्ट खोलता हूँ तो अपनी गर्दन उठा कर मेरी आँखों में देखता हुआ मुस्कुराता है और उँगली उठा कर कार में दरवाज़े के ऊपर जली लाईट को दिखाता है। जानता हूँ कि यह मुझे अपनी अगली माँग के लिए बहला रहा है। हम भी तो इसका ध्यान बँटाने के लिए बहलाते रहे हैं। बेल्ट खोलता हूँ तो झपट कर उसको पकड़ कर “हम्म–हम्म” बोलने लगता है। आँखों में शरारत नाचने लगती है। वह स्वयं बेल्ट को फिर से लगाना चाहता है। अभी यह समझ नहीं पाया हूँ कि वह हिन्दी का “हम” कह रहा है या अँग्रेज़ी का “आई एम”। यहाँ पर सभी प्रवासियों के बच्चे जीवन के पहले कुछ वर्षों तक द्विभाषी ही होते हैं - हाँ बड़े होते-होते अँग्रेज़ी प्रधान हो जाती है। 

युवान बेल्ट लगानी जानता है, परन्तु अगर पहली बार ही बेल्ट लगा ले तो खेल समाप्त हो जाएगा। अब वह चालाकी करता है कि जान-बूझ कर बेल्ट ग़लत लगा कर ज़ोर लगाता है और मेरी ओर देख कर मुस्कुराता है। मैं उसके नन्हे मोती से दाँतों को देखता हूँ, उसकी आँखों से झलकती उसकी चालाकी को देखता हूँ, मेरा मन भाव विभोर होने लगता है। भूल जाता हूँ कि अन्दर नीरा भी युवान के आने की प्रतीक्षा कर रही है। मैं युवान को एक-दो बार यही करने देता हूँ। उसकी नन्ही चालाकी से मूर्ख बनता हूँ, फिर उसे बाहर आना ही पड़ता है। ड्राईव-वे पर पाँव टिकते ही उसकी दृष्टि लॉन में लगे मेपल के वृक्ष की शाखाओं पर जा बैठती है। गर्दन ऊपर करते हुए, नीले आकाश की चौंधिहाट से उसकी एक आँख बंद हो जाती है, नाक सिकोड़ कर खुले मुँह से वह पक्षियों को खोजने लगता है। इस तरह से मेरा दिन आरम्भ होता है।

पिछले दो दिनों से युवान मोण्टेसरी स्कूल में जाने लगा है। सोचा था कि अब मेरे पास खाली समय होगा तो बहुत कुछ कर पाऊँगा। यह पता ही नहीं चला था कि मेरे जीवन की हर सुबह अब युवान के बिना अधूरी है। एक बार फिर से मुझे अपना आधार खोजना पड़ रहा है। निरुद्देश्य एक कमरे से दूसरे कमरे में घूमता हूँ। मेरा कम्प्यूटर मेरी ओर ताकता है। अपने आप को फिर से व्यस्थित करने के लिए संघर्षरत हूँ। सम्पादकीय लिखने बैठ जाता हूँ और युवान चुपचाप मेरे लेखन पर छा जाता है। आज मुझे कम्प्यूटर के डेस्क्टॉप पर दो विंडोज़ नहीं खोलनी पड़ीं। प्रायः दादा और पोता डैस्कटॉप का विभाजन कर लेते हैं। वह अपनी विंडो में नर्सरी-गीत सुनता है और मैं साहित्य कुञ्ज में खो जाता हूँ। वह बगल में इतना चिपट कर बैठता है कि दायीं बाँह को हिलने में रुकावट पैदा होती है। अगर मैं किसी रचना में खो जाऊँ तो उसे गवारा नहीं होता और मेरी विंडो में घुसपैठ करने लगता है। और मैं अपनी सत्ता समेट कर कंप्यूटर की बाग-डोर उसके हवाले कर देता हूँ। आज… आज बगल खाली है। लिखने की पूरी स्वतन्त्रता है, किसी भी विषय पर लिख सकता हूँ; परन्तु युवान मेरे मस्तिष्क में घुसपैठ कर रहा है। कितना मीठा है यह अहसास, कितनी वांछनीय यह परतन्त्रता।

- आपका
सुमन कुमार घई

सम्पादकीय (पुराने अंक)

2019
2018
2017
2016
2015