संस्कारों की विरासत
डॉ. प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार
सुबह की शान्ति को भंग करती हुई मोबाइल की घंटी बजी।
मैंने जैसे ही फोन उठाया, उधर से बेटे की चिंतित आवाज़ आई, “मम्मी, सामान घर पहुँच गया होगा . . . पापा से कहना कि बोरी में हाथ डालकर सामान न निकालें, उसे फाड़ लें . . . कल भरते समय बहुत टाइट था, मेरी उँगलियाँ तक छिल गई थीं . . . कहीं पापा को चोट न लग जाए . . . ”
उसके शब्दों में छिपी चिंता ने मेरे हृदय को भिगो दिया।
आँखों से अश्रुधारा बह निकली—यह दूरी का दर्द नहीं था, यह अपनेपन का अमृत था।
मन ही मन एक चित्र उभर आया—
वर्षों पहले का . . .
जब मेरे पति, अपने पिता की एक पुकार पर तुरंत उठ खड़े होते थे।
उनके चेहरे पर कभी थकान नहीं दिखती थी, केवल कर्त्तव्य का तेज झलकता था।
अचानक स्मृतियाँ और भी सजीव हो उठीं—
दो दिन पहले की ही बात थी . . .
मैं अस्वस्थ थी, शरीर में ज़रा भी शक्ति नहीं थी।
सुबह जब नींद खुली, तो देखा—रसोई से चाय की सौंधी ख़ुश्बू आ रही थी।
मैंने आश्चर्य से पूछा, “पापा कहाँ हैं?”
वे सहज भाव से बोले, “कोई बात नहीं . . . मैंने चाय बना दी थी, नाश्ता भी तैयार कर दिया . . . उन्हें खिला-पिला दिया।”
उनकी सरलता में जो समर्पण था, वही तो वर्षों से मैंने देखा था—अपने पिता के प्रति उनका आदर, सेवा और समर्पण।
और आज . . .
वही भाव, वही चिंता, वही संस्कार—बेटे की आवाज़ में झलक रहे थे।
उस क्षण मुझे लगा—जीवन का सबसे बड़ा धन संपत्ति नहीं, बल्कि संस्कारों की वह अमूल्य विरासत है, जो बिना कहे, बिना सिखाए, पीढ़ी दर पीढ़ी बहती रहती है।
सच ही तो है—
“हम जैसा बोते हैं, वैसा ही फल हमें प्राप्त होता है।”
उस दिन मेरे आँसू दुःख के नहीं थे . . .
वे गर्व के थे—उस विरासत पर, जो हमने जीकर सौंपी थी . . . और जो अब हमारे बेटे के हृदय में जीवित थी।
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