चाइनीस माँझा: धागा नहीं, हमारी सामूहिक लापरवाही
डॉ. प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार
चाइनीस माँझा कोई मामूली धागा नहीं है।
यह पतंग उड़ाने का साधन नहीं,
व्यवस्था की गर्दन पर फिरती धार है।
यह हवा में नहीं उड़ता,
यह हमारी आँखों के सामने चलता है
और हम उसे “त्योहार का उत्साह” कहकर अनदेखा कर देते हैं।
इस माँझे के बनने की कहानी बहुत साधारण है।
नायलॉन के धागे में काँच का बुरादा मिलाइए,
उसमें केमिकल और धातु का चूर्ण डालिए,
फिर मशीन से इतना तेज़ बनाइए
कि वह हवा, चमड़ी और ज़मीर—
तीनों को एक साथ चीर दे।
यह खेल के लिए नहीं बनता,
यह प्रतिस्पर्धा के लिए बनता है—
किसकी पतंग कटेगी,
कौन ऊपर रहेगा।
किसकी गर्दन कटेगी,
यह सवाल बाद में आता है।
यह माँझा भारत कैसे पहुँचा?
सीमा पार करके नहीं,
अनदेखी पार करके।
कभी “सिंथेटिक स्ट्रिंग” बनकर,
कभी “जनरल आइटम” बनकर।
कस्टम ने काग़ज़ देखे,
माल नहीं।
काग़ज़ सही थे,
इसलिए आँखें बंद रहीं।
यहीं से माँझा देशी हो गया—
नाम भले विदेशी रहा।
हर साल सरकार प्रतिबंध लगाती है।
हर साल अधिसूचना निकलती है।
और हर साल माँझा पहले से ज़्यादा धारदार होकर लौट आता है।
क्योंकि इस देश में प्रतिबंध
दीवारों पर टाँगने की चीज़ है,
ज़मीन पर उतारने की नहीं।
फिर त्योहार आता है।
आकाश रंगीन होता है।
छतें भर जाती हैं।
और सड़कें अचानक ख़तरनाक हो जाती हैं।
कोई बाइक से जा रहा होता है,
कोई साइकिल पर,
कोई पैदल।
माँझा किसी से पहचान नहीं पूछता।
वह बराबरी से काटता है—
बच्चा हो या बूढ़ा,
ग़रीब हो या कमाने वाला।
पक्षी तो उसके लिए अभ्यास मात्र हैं।
अगले दिन अख़बार में ख़बर छपती है—
“चाइनीस माँझे से युवक की मौत।”
नीचे लिखा होता है—
“दुर्भाग्यपूर्ण हादसा।”
पर जो हर साल हो,
वह हादसा नहीं होता।
वह सिस्टम की आदत होती है।
सब जानते हैं
कौन बेचता है,
कहाँ बेचता है,
किस महल्ले में छिपाकर रखता है।
फिर भी छापे त्योहार के बाद पड़ते हैं।
पहले लाश गिरे,
फिर कार्रवाई हो—
यही हमारी कार्यशैली है।
क्योंकि कार्रवाई जीवित लोगों के लिए नहीं,
फ़ाइलों के लिए होती है।
और जनता?
वह सबसे ज़्यादा मासूम बनती है।
वह कहती है—
“हमने तो नहीं उड़ाया।”
लेकिन जिसने ख़रीदा,
जिसने देखा,
जिसने मना नहीं किया,
जिसने चुप्पी को सुविधा बनाया—
उसकी उँगलियों में भी
माँझे की धार लगी है।
चाइनीस माँझा सिर्फ़ गर्दन नहीं काटता।
यह उस भ्रम को काटता है
कि क़ानून समय पर आएगा।
यह भरोसे को काटता है
कि जान की क़ीमत है।
यह हर साल बताता है
कि यहाँ धागा सस्ता है
और इंसान की ज़िंदगी
उतनी ही महँगी है
जितनी एक अख़बारी सुर्ख़ी।
अगर सच में त्योहार बचाने हैं,
तो पहले लापरवाही काटनी होगी।
माँझा नहीं,
अपनी ढील काटनी होगी।
वरना हर साल
पतंगें कम उड़ेंगी
और शोक संदेश
पहले पन्ने पर उड़ते रहेंगे
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