ओ कॉलेज के शेरो! ज़रा ब्रेक भी नाम की चीज़ होती है
डॉ. प्रीति सुरेंद्र सिंह परमारओ कॉलेज के शेरो! ज़रा ब्रेक भी नाम की चीज़ होती है
ओ कॉलेज के महारथियो!
ओ रील के रफ़्तार वीरों!
इतनी जल्दी है तो ज़रा बता दो—
किस ट्रेन का टिकट कटवाया है?
या सीधे स्वर्ग का पास चाहिए?
तुम सड़क पर गाड़ी नहीं चलाते,
तुम सड़क को रनवे समझते हो।
हेलमेट तुम्हें स्टाइल बिगाड़ने वाला दुश्मन लगता है,
और सीट बेल्ट—
अरे छोड़ो यार,
हीरो लोग बेल्ट नहीं बाँधते!
तुम्हें लगता है
रफ़्तार तुम्हारा हक़ है।
गलतफ़हमी है दोस्त,
रफ़्तार तुम्हारी सज़ा बनती जा रही है।
कॉलेज से निकलते ही
गाड़ी नहीं,
ईगो स्टार्ट होती है।
दोस्त पीछे बैठा है,
मोबाइल कैमरा ऑन है,
रील बननी है—
“भाई का स्टाइल देखो।”
और माँ?
माँ सिर्फ़ कहती है—
“धीरे चलाना बेटा।”
तुम हँस देते हो—
“माँ, सब कंट्रोल में है।”
हाँ, कंट्रोल में ही तो है—
मौत का रिमोट।
तुम्हें लगता है
तुम बहुत स्मार्ट हो।
एक हाथ में मोबाइल,
दूसरे में स्टेयरिंग,
और दिमाग़ . . .
वह शायद वाई-फ़ाई ढूँढ़ रहा है।
फिर एक मोड़ आता है।
बस एक मोड़।
और सारा “स्टाइल”
स्ट्रेचर पर सीधा हो जाता है।
तुम कहते हो—
“सर, एक्सीडेंट हो गया।”
नहीं भाई,
एक्सीडेंट नहीं हुआ,
तुम्हारी अक़्ल छुट्टी पर थी।
अख़बार में दो लाइनें छपती हैं—
“कॉलेज छात्र की सड़क दुर्घटना में मौत।”
कोई नहीं लिखता—
“माँ की गोद
हमेशा के लिए सूनी हो गई।”
कोई नहीं लिखता—
“पिता अब
हर बाइक की आवाज़ से काँप जाता है।”
कोई नहीं लिखता—
“घर अब
हँसी की आवाज़
याद करके रोता है।”
तुम सोचते हो
तुम्हारी ज़िंदगी तुम्हारी है।
एक बार माँ की आँखों में देखो,
पता चल जाएगा—
तुम कई ज़िंदगियों की
इकलौती उम्मीद हो।
और सुनो,
मौत को
तुमसे बेहतर ड्राइविंग आती है।
वह न हेलमेट देखती है,
न ब्रेक लाइट,
न उम्र।
जब सब ख़त्म हो जाता है,
तो वही दोस्त
जो वीडियो बना रहे थे,
कंधा देने आते हैं।
और माँ-बाप?
वे फोटो के सामने
चुपचाप बैठ जाते हैं—
क्योंकि रोने की भी
एक सीमा होती है।
इसलिए ओ कॉलेज के शेरो,
रफ़्तार से नहीं,
ज़िम्मेदारी से पहचान बनाओ।
रील दो सेकंड की होती है,
पर माँ का दर्द
ज़िंदगी भर का।
ब्रेक लगाओ,
स्टाइल नहीं घटेगा।
धीरे चलो,
ज़िंदगी बचेगी।
वरना कल
कोई और लिखेगा—
“एक और होनहार
जल्दी पहुँच गया।”
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