सब कुछ ख़त्म हो गया

01-04-2021

सब कुछ ख़त्म हो गया

संजय कवि ’श्री श्री’

 

एक ड्योढ़ी पर

टूटा दिल

देखा;

रोते,

बिलखते,

आँसू बहाते,

दर्द में नहाते,

फ़रियाद थी..

बिछड़ गए हम, वो खो गया;

सब कुछ ख़त्म हो गया।

 

फिर मुलाक़ात,

कामयाब

मुहब्बत से हुई;

लड़ते,

झगड़ते,

संबंधों को त्यागते,

एक दूसरे से भागते,

आरोप था..

तुम्हें पाकर सुकून खो गया;

सब कुछ ख़त्म हो गया।

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
कविता - क्षणिका
नज़्म
खण्डकाव्य
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में