पंद्रह सिंधी कहानियाँ (रचनाकार - देवी नागरानी)
प्रकाशकीय
किसी एक भाषा में व्यक्त विचारों को दूसरी भाषा में व्यक्त करना निश्चय ही कठिन कार्य है, क्योंकि प्रत्येक भाषा का अपना स्वरूप होता है, उसकी अपनी निजी ध्वनि, शब्द, रूप, वाक्य तथा अर्थमूलक विशेषताएँ होती हैं। कभी-कभी स्रोत भाषा का कथ्य लक्ष्य भाषा में अपेक्षाकृत विस्तृत, कहीं संकुचित और कहीं भिन्नरूपी हो जाता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न राष्ट्रों के बीच राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, औद्योगिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक स्तर पर बढ़ते हुए आदान-प्रदान के कारण अनुवाद-कार्य को नई दिशा प्राप्त हुई है।
अनुवाद यांत्रिक प्रक्रिया नहीं अपितु मौलिकता का स्पर्श करता हुआ कृतित्व है। उसके एक छोर पर मूल लेखक होता है तो दूसरे छोर पर अनुवादक। इन दोनों के बीच है अनुवाद की प्रक्रिया। एक कुशल अनुवादक अपने आपको मूल लेखक के चिंतन की भूमि पर प्रतिष्ठित कर अपनी सूझबूझ एवं प्रतिभा के बल पर स्रोत-सामग्री को अपनी कला और कुशलता से प्रस्तुत करता है, ताकि उसका ‘अनुवाद’ मौलिक रचना के स्तर तक पहुँच सके।
यह निर्विवाद सत्य है कि अनुवाद मूल लेखन से कहीं अधिक कठिन कार्य है। मूल लेखक जहाँ अपने विचारों की अभिव्यक्ति में स्वतंत्र होता है, वहीं अनुवादक एक भाषा के विचारों को दूसरी भाषा में उतारने में अनेक तरह से बँधा होता है। उन दोनों भाषाओं की सूक्ष्मतम जानकारी के अतिरिक्त विषय की तह तक पहुँचने की क्षमता तथा अभिव्यक्ति की पूर्ण कुशलता अच्छे अनुवादक के लिए अपेक्षित है।
श्रीमती देवी नागरानी द्वारा सिंधी भाषा में लिखी गई पंद्रह कहनियों का अनुवाद रसविभोर कर देता है। मैंने कहानियों को मूल भाषा में नहीं पढ़ा है, लेकिन इस अनुवाद के माध्यम से उन्होंने निश्चय ही पाठक को मूल रचना का आनंद प्रदान किया है, ऐसा कहना ग़लत न होगा। हमारा संस्थान इन कहानियों को प्रकाशित कर गौरवान्वित है।
— डॉ.गिरिराजशरण अग्रवाल
निदेशक
हिंदी साहित्य निकेतन
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