काम क्यों करें? 

01-02-2026

काम क्यों करें? 

डॉ. प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

गाँव की पान की दुकान पर खड़े एक 35 वर्षीय निठल्ले बेरोज़गार युवक से मैंने पूछा, “कुछ कमाते-धमाते क्यों नहीं? दिनभर शराब पीते हो, राजश्री खाकर थूकते रहते हो।”

वह बोला, “मेरी मर्ज़ी।” 

इस ‘मेरी मर्ज़ी’ में आलस्य नहीं, पूरी व्यवस्था का आत्मविश्वास झलक रहा था। 

मैंने पूछा, “शादी हो गई?”

बोला, “हो गई।”

मैंने कहा, “कैसे की?”

वह बोला, “श्रम कार्ड से मुख्यमंत्री आदर्श विवाह योजना के 30,000 और अंतर्जातीय कन्यादान योजना से 2,50,000 मिल गए।” 

मैंने समझ लिया—अब विवाह संस्कार नहीं, योजना-आधारित कार्यक्रम है। मैंने कहा, “अब बाल-बच्चे भी होंगे, उनके लिए तो कमाओ।”

उसने गुटखा दबाते हुए कहा, “जननी सुरक्षा योजना से डिलीवरी फ़्री हुई, साथ में 1,500 का चेक मिला और श्रम कार्ड में भगिनी प्रसूति योजना से 20,000 अलग से।”

मुझे लगा, बच्चे अब माँ के गर्भ से नहीं, योजना के आवेदन-पत्र से जन्म लेते हैं। मैंने कहा, “तो बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के लिए कमाओ।”

वह पिचक कर बोला, “उनके लिए पढ़ाई, यूनिफ़ॉर्म, किताबें और भोजन सब सरकार की तरफ़ से फ़्री हैं। श्रम कार्ड से मुख्यमंत्री नौनिहाल और मेधावी छात्रवृत्ति योजना में हर साल पैसे मिलते हैं। कॉलेज में बी.पी.एल. सूची की वजह से फ़्री एडमिशन और स्कॉलरशिप भी। फिर ट्यूशन क्यों?” 

मैंने पूछा, “घर कैसे चलाते हो?”

वह बोला, “छोटी लड़की को सरकार से साइकिल मिली है, लड़के को लैपटॉप मिला है, माँ-बाप को वृद्धावस्था पेंशन मिलती है और एक रुपये किलो में पूरे महीने का चावल।”

मैंने कहा, “माँ-बाप को तीर्थयात्रा के लिए तो कमाओ।”

वह बोला, “मुख्यमंत्री तीर्थयात्रा योजना से भेज दिया है।” 

मैंने कहा, “कम से कम इलाज के लिए तो कमाओ।”

उसने शान्ति से कहा,”आयुष्मान कार्ड है न, पाँच लाख तक का इलाज फ़्री।”

ग़ुस्से में मैंने कहा, “माँ-बाप के मरने के बाद जलाने के लिए तो कमा।”

वह बोला, “एक रुपये में विद्युत शवदाह गृह है।” 

मैंने आख़िरी कोशिश की, “अपने बच्चों की शादी के लिए तो कमाओ।”

वह मुस्कराया और बोला, “फिर वही प्रश्न? वैसे ही होगी जैसे मेरी हुई।” फिर उसने मेरी ओर देखकर वह बात कही, जो इस पूरे दृश्य का सार थी, “तुम जैसे लोग मेहनत करो, नौकरी करो, टैक्स भरो। टैक्स देना तुम्हारा काम है। हम तो उस टैक्स पर ऐश करने के लिए पैदा हुए हैं। हमें कोई टैक्स नहीं देना पड़ता। टैक्स तो तुम जैसे मेहनत के श्लोक पढ़ने वाले लोग करते हैं। हम तो बस शासन की दी हुई स्कीमों पर चलते हैं।” 

उसने आगे कहा, “किसान खेत में मेहनत करता है, सरकार उससे अनाज ख़रीदकर हमें मुफ़्त में देती है। तुम लोग काम करके टैक्स देते हो, सरकार योजनाएँ बनाती है और हम उन्हें लेते हैं। फिर बताओ, हम काम क्यों करें?” 

उस क्षण मुझे समझ आया—यह युवक बेरोज़गार नहीं है। यह व्यवस्था का स्थायी उपभोक्ता है। काम उसके लिए अनिवार्यता नहीं, विकल्प है—और विकल्प वही छोड़ता है जिसे व्यवस्था छोड़ने की पूरी छूट देती है। 

हरिशंकर परसाई होते तो शायद कहते—जिस समाज में टैक्स देने वाला सफ़ाई देता फिरे और टैक्स पर पलने वाला दर्शन झाड़े, वहाँ समस्या आदमी की नहीं, व्यवस्था की आत्मा की होती है। 

मैं वहाँ से चला आया। पान की दुकान वहीं थी, युवक वहीं था, योजनाएँ वहीं थीं। बस एक चीज़ ग़ायब थी—श्रम की इज़्ज़त। 

यह कहानी किसी एक गाँव, किसी एक राज्य या किसी एक देश की नहीं है—यह उस पूरी दुनिया की है जहाँ मेहनत करने वाला अल्पसंख्यक और सुविधा पर जीने वाला बहुसंख्यक बनता जा रहा है। 

यहाँ भाषाएँ बदलती हैं, सरकारें बदलती हैं, योजनाओं के नाम बदलते हैं—पर एक बात स्थिर है, काम करने वाला टैक्स देता है और न करने वाला तर्क। आज का संकट बेरोज़गारी का नहीं, जवाबदेही के लुप्त हो जाने का है। 

जब जीवन जन्म से मृत्यु तक
योजना–आश्रित हो जाए, 
तो श्रम बोझ लगता है, 
और आत्मसम्मान अतिरिक्त ख़र्च। 
ऐसे समय में सवाल यह नहीं कि
वह युवक काम क्यों नहीं करता, 
सवाल यह है कि
क्या हमने काम को अनावश्यक बना दिया है? 
 
यदि यही क्रम चलता रहा, 
तो आने वाली पीढ़ी किताब में नहीं पूछेगी—
“रोटी कैसे कमाई जाती है?” 
बल्कि यह पूछेगी—
“किस योजना में मिलती है?” 
और तब पान की दुकान पर खड़ा वह युवक
अपवाद नहीं रहेगा—
वह नया आदर्श नागरिक होगा। 

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