जनसंख्या नियंत्रण: अब कोई योजना नहीं, बस हालात
डॉ. प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार
भारत में जनसंख्या नियंत्रण अब कोई सरकारी योजना नहीं रही। न नसबंदी की ज़रूरत है, न पोस्टर, न नारे, न लाल टोपी पहनकर भाषण। यह काम अब पूरी निष्ठा से पानी, खाना, दवा और व्यवस्था कर रही है। चारों इतने ईमानदार हैं कि किसी एक पर उँगली उठाना भी अन्याय होगा—यह तो सामूहिक प्रयास है।
सबसे पहले बात पानी की। पानी अब केवल प्यास नहीं बुझाता, वह सीधे जीवन का बिल भी वसूलता है। नल से जो निकलता है, वह जल है या ज़हर—यह पहचानने से पहले ही अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हो जाती है। कहीं टंकी में सीवेज, कहीं पाइप में इतिहास जमा है। और अगर कोई मर जाए, तो व्यवस्था तुरंत ज्ञान बाँटती है—“उबालकर नहीं पिया होगा।”
अब भला लाश से कौन पूछे कि उबालने का समय मिला था या नहीं?
खाने की व्यवस्था भी कमाल की है। भोजन अब पोषण नहीं, रोमांच है। दूध ऐसा कि बचपन सीधा ICU में पहुँच जाए। फल इतने चमकदार कि आईना शर्मा जाए—मोम की परत में सेहत ढूँढ़नी पड़ती है। सब्ज़ियाँ रंग-बिरंगी हैं, मानो चुनाव लड़ने आई हों।
जो जितना ताज़ा दिखे, समझ लीजिए उतना ही ख़तरनाक है।
थाली भरी होती है, और अस्पताल भी।
रिपोर्ट आती है—“खाना ख़राब था।”
पर जिसने परोसा, वह आज भी सम्मानित नागरिक है।
फ़ूड पॉइज़निंग अब आकस्मिक नहीं, सामूहिक आयोजन है। शादी में हो तो “दुर्भाग्य”, स्कूल में हो तो “जाँच”, अस्पताल में हो तो “प्रबंधन की चूक।”
मौत हर जगह हो जाती है, दोष कहीं नहीं टिकता।
आधुनिक भारत ने इसमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी लिया है—पिज़्ज़ा, बर्गर, पास्ता।
बच्चा ख़ुश, माता-पिता गर्वित—“हम कितने मॉडर्न हैं।”
स्वाद तेज़, असर और तेज़।
इसे फ़ास्ट फ़ूड कहते हैं, क्योंकि यह आदमी को तेज़ी से अंतिम पड़ाव तक पहुँचाता है।
नवजात शिशुओं के लिए भी विशेष प्रबंध हैं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर हों या न हों, चूहे पूरे स्टाफ़ के साथ उपलब्ध हैं। नन्हे हाथ, नन्हे पाँव और विशाल लापरवाही।
बच्चा मर जाए तो बयान ज़िंदा रहता है—“पहले से गंभीर था।”
कितना सौभाग्य है कि हर मृत बच्चा जन्म से ही गंभीर निकलता है।
अगर पानी-खाना असफल हो जाए, तो दवाइयाँ हैं न!
यहाँ बीमारी से पहले दवा तैयार रहती है।
कफ सिरप पीकर बच्चे मरते हैं—खाँसी नहीं गई, साँस ज़रूर चली गई। माँ ने भरोसे से पिलाया, सरकार ने भरोसे से समिति बनाई। बीच में कुछ छोटे ताबूत निकल गए, पर व्यवस्था बिल्कुल सुरक्षित रही।
दर्द हो तो चिंता मत कीजिए—पेनकिलर हर दुकान पर उपलब्ध है। नाम से लगता है दर्द मारेगा, पर काम आदमी मारने का करता है।
पहली गोली आराम,
दूसरी आदत,
तीसरी किडनी,
चौथी विदाई।
डॉक्टर लिख देते हैं—“ऑर्गन फेल्योर।”
किस दवा से, कितनी मात्रा से—यह सवाल बहुत असभ्य माना जाता है।
प्रतिबंधित दवाइयाँ?
अरे साहब, वही तो सबसे भरोसेमंद हैं।
जिन पर रोक है, वे दुकान की शान हैं।
केमिस्ट डॉक्टर है, ग्राहक मरीज़ है, पर्ची पुरानी सभ्यता की चीज़ है।
कोई पूछ ले तो जवाब तैयार है—“सब ले रहे हैं।”
इस तरह पानी मारता है, खाना मारता है, प्रदूषण मारता है, दवाइयाँ इलाज के नाम पर मारती हैं, चूहे अस्पताल में मारते हैं, और व्यवस्था—वह कुछ नहीं मारती, वह बस कहती है—“जाँच जारी है।”
इसलिए अब परिवार नियोजन की कोई आवश्यकता नहीं।
यहाँ लोग पीते-पीते मर रहे हैं, खाते-खाते मर रहे हैं और दवा खाते-खाते हमेशा के लिए चुप हो जा रहे हैं।
इसे विफलता मत कहिए, इसे आधुनिक प्रबंधन कहिए।
क्योंकि जहाँ जीवन की रक्षा प्राथमिकता न हो, वहाँ मृत्यु सबसे सस्ती, सबसे आसान और सबसे सुव्यवस्थित सेवा बन जाती है।
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