आईना दिखाकर बेचैन करने वाला शायर अदम गोंडवी 

01-05-2026

आईना दिखाकर बेचैन करने वाला शायर अदम गोंडवी 

डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफरी (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

"काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में . . ." 

 

उत्तर प्रदेश के इटावा में एक मुशायरा अपने शबाब पर है। मंच के बाहर अगली कुर्सी पर तमाम डेमोक्रेट बैठे हुए हैं। सबके साथ उस समय के मुख्यमंत्री भी विराजमान हैं। बड़े और ओहदेदार शायर मंच पर हैं। शायरों को पता है वही कविता पढ़नी है जिससे, सल्तनत नाराज़ न हो। प्रेम के गीत, जुदाई की ग़ज़लें, और स्तुति की कविताएँ पढ़ी जा रही हैं। मंच पर जहाँ क़ीमती लिबास में लोग बैठे हुए हैं, वहीं पर मख़मल में लगे पैवंद की तरह गाँव का एक शायर बेतरतीब बाल, बढ़ी हुई मूँछ, मटमैला धोती-कुर्ता, गले पर खादी का बेरंग गमछा पहने हुए बैठा हुआ है। जैसे ही उसकी बारी आती है, और वह शेर पढ़ना शुरू करता है पूरा मजमा उसकी तरफ़ हो जाता है। उसके बस एक शेर से सत्ता तिलमिला जाती है। लेकिन उस ज़बरदस्त सच्चाई के आगे प्रतिकार नहीं कर पाती है। शायर आगे की कुर्सी पर बैठे हुए सफ़ेद पोशों पर उँगली दिखाते हुए कहता है:

जितने हरामख़ोर थे क़ुरबो जवार में 
परधान बन के आ गए अगली क़तार में 

शायरी में सिर्फ़ सच्चाई, बेबाकी और नए लहजे गढ़ने वाला इस शायर को दुनिया अदम गोंडवी के नाम से जानती है। 

अगस्त 1947 में पैदा हुए अदम का पूरा नाम रामनाथ सिंह था। किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में उन्होंने पढ़ाई नहीं की। जैसे टैगोर, प्रसाद और निराला ने नहीं की थी, लेकिन अनुभवों की यूनिवर्सिटी ने अदम को इतनी तालीम दी कि दुनिया की सारी तालीम फीकी पड़ गई, और दुनिया की सारी किताबों में अदम पढ़े जाने लगे। पूरी हिंदी ग़ज़ल में दुष्यंत के बाद एक ही चेहरा नज़र आता है और वह चेहरा अदम गोंडवी का है। 

‘समय से मुठभेड़’ और ‘धरती की सतह पर’ अदम गोंडवी की किताबें हैं। कहते हैं समय से ‘मुठभेड़ साये में’, ‘धूप के बाद’ सबसे अधिक बिकने वाली किताब है। अदम सत्तर के दशक के दुनिया के पहले शायर हैं, जो सिर्फ़ सवाल नहीं करते सवाल कर सारे तंत्र को बेचैन भी करते हैं, फिर वो सब बेचैन होते होता है, जिसने जनता के हक़ को दबाया है। उस शायर का नाम भी अदम्य है, अर्थात्‌ जिसे दबाया न जा सके। अदम किसी विचारधारा के शायर नहीं हैं। वह जनता के शायर हैं, उस इनोसेंट जनता के जिसे अब तक हाशिये पर रखा गया है। देश को आज़ादी के इतने साल बाद भी उन तक आज़ादी नहीं पहुँची:

सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद है 
दिल पर रख कर हाथ कहिए देश कि आज़ाद है

उनकी ग़ज़लों में गाँव की सुगंध आती है। काग़ज़ी आज़ादी का मतलब समझ आता है। ग़ज़ल महबूब और मनोरंजन से निकलकर ज़मीन की सतह पर आती है। बादशाहों के छप्पन भोग से निकलकर भूखी आंतों तक पहुँचती है। दलित पहली बार ग़ज़ल का हिस्सा बनता है। औरतों की आबरूरेज़ी पर शायर का क्रोध और संवेदना जागृत होती है, और हिंदी कविता के इतिहास में सवर्णों के ख़िलाफ़ पहली बार कार्रवाई होती है:

“आइये महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को 
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको”

“जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊबकर 
मर गई फुलिया बेचारी कल कुएँ में डूब कर” 

अदम ग़ज़ल लिखते हुए न किसी प्रतीक का सहारा रहते हैं, न अपनी बात को घुमावदार बनाने के लिए किसी व्यंजना का। उन्हें जो कहना है, वह स्पष्ट कहते हैं, बाबा रामदेव से लेकर ओशो तक उनके निशाने पर आते हैं। भटके हुए समाजवादी की वह ख़बर लेते हैं, और हुकूमत की कार्य शैली पर सीधे आक्रमण करते हैं। उनकी चिंता है कि देश की आज़ादी के इतने साल बाद भी कोई परिवर्तन नहीं आया। जो बदलाव है वह महज़ फ़ाइलों में है:

“तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आँकड़े झूठे हैं यह दावा किताबी है” 

और फिर अदम का यह शेर तो तीखे यथार्थ के कारण हिन्दी ग़ज़ल का सबसे मशहूर शेर बन जाता है:

“काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में 
उतरा है रामराज विधायक निवास में” 

ग़ज़ल अपनी जिस नज़ाकत के लिए जानी जाती है—अदम गोंडवी के पास आकर वह ठेठ गँवई अंदाज़ में बदल जाती है। साक़ी, शराब, हुस्नो, इश्क़ और गुलो-बुलबुल की बात करने वाली ग़ज़ल दबे-कुचले की आवाज़ बन जाती है। उन्होंने ग़ज़ल को ग़ज़ल की तबीयत में नहीं अपनी तबीयत में फ़िट किया। पूरी हिंदी ग़ज़ल की परंपरा में व्यवस्था के ख़िलाफ़ जनता के पक्ष में लिखने वाला दुष्यंत के साथ ये सबसे बड़ा शायर है। इनकी शायरी फ़िरक़ा-परस्त लोगों को तिलमिलाकर रख देती है। लेकिन इसमें इतनी कटु सच्चाई है कि कोई उन पर आक्रमण नहीं कर पाता। वह कबीर और नागार्जुन की परंपरा के कवि हैं। उनकी ग़ज़लों में मज़दूरों की आवाज़ है। आज़ादी के बाद की सामाजिक स्थिति का मोहभंग है। सच्चाई के प्रति आह्वान है:

“नीलोफ़र शबनम नहीं अंगार की बातें करो
वक़्त के बदले हुए मेयार की बातें करो” 

भ्रष्टाचार, शोषण, रिश्वत, धार्मिक कट्टरता के विरोध और शोषित उत्पीड़ित जनता के पक्ष में जो आवाज़ इनकी है वह ग़ज़ल ही नहीं पूरी हिंदी कविता भी दुर्लभ है:

“हिंदू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए
अपनी कुर्सी के लिए जज़्बात को मत छेड़िए

ग़लतियाँ बाबर की थीं जुम्मन का घर फिर क्यों जले 
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए” 

हिंदी ग़ज़ल को एक नया अर्थ और मुहावरा देकर सत्ता के मौन को बेचैन करने वाले अदम की मृत्यु 18 दिसंबर, 2011 को पेट की बीमारी के कारण लखनऊ में हो गई। जिस गाँव वालों ने अदम का विरोध किया था, आज वह अदम को याद कर रहे हैं। उनके नाम पर एक स्कूल है एक समाधि स्थल है। लोग वहाँ जुटते हैं, लेकिन उस भीड़ में कोई ऐसा नामचीन शख़्स नहीं होता, जिससे वह अख़बार की सुर्ख़ी बन सके। 

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