काग़ज़ की देहरी पर
डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफरी
अपने अस्तित्व को तलाशते लोगों की तर्जुमानी
समीक्षित पुस्तक: कागज़ की देहरी पर (नवगीत संग्रह)
लेखक: रवि खण्डेलवाल
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोएडा
संस्करण: 2024
मूल्य: ₹249.00
पृष्ठ संख्या: 128
ISBN: 978-81-970378-9-4
पुस्तक ख़रीदने का लिंक: कागज़ की देहरी पर
आधुनिक हिंदी कविता में ग़ज़ल और गीत की लोकप्रियता सबसे ऊपर है। यह भी संयोग है कि अधिकतर ग़ज़लकारों ने गीत भी लिखे हैं। इसकी जो वजह रही हो पर इतना तो साफ़ है कि यह दोनों विधाएँ तरन्नुम और तकल्लुम की माँग करती हैं। दोनों की ज़बानें सरसता माधुर्य और रफ़्तार लिए हुए हैं।
इस समय रवि खंडेलवाल एक साथ ग़ज़ल और गीत दोनों लिख रहे हैं। यों आजकल उनका दोहा संग्रह ‘गतिविधियों की रेल’ भी काफ़ी चर्चा में है। उनका ग़ज़ल संग्रह ‘तज कर चुकी हल्ला बोल’ भी पाठकों के द्वारा ख़ूब पढ़ा और सराहा गया है।
काग़ज़ की देहरी पर रवि खंडेलवाल के सत्तर से अधिक नवगीतों का संग्रह है। रवि अस्सी के दशक से लगातार नवगीत लिख रहे हैं। ये वो समय है जब पूरे हिंदी साहित्य पर छंद मुक्त कविता का प्रभाव था। सारा देश आपातकाल से जूझ रहा था। यों नवगीत अस्सी के बाद की रचना मानी जाती है। कुछ लोग इसे निराला से भी जोड़कर देखते हैं। असल में नवगीत 1960 के बाद से ही अपनी पहचान बनाने लगता है। नवगीत पारंपरिक गीत से अलग इसलिए है कि इसकी रचना नए भवबोध में नए ढंग से की गई है। गिरजा कुमार माथुर से लेकर केदारनाथ अग्रवाल, शिवमंगल सिंह सुमन, धर्मवीर भारती, कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह आदि ने इसे विभिन्न राज रागिनियों और छंदों से सजाया है। अगर सच कहें तो गीत हिंदी की सबसे पुरानी का विधा है। वैदिक काल में भी स्तुति गीत अभी चर्या गीत आदि गाये जाते थे। संस्कृत में जयदेव का गीत गोविंद और अवधि में तुलसीदास की गीतावली तो हम सबकी जानी-पहचानी कृति है।
रवि खंडेलवाल गीत की पारंपरिक विधा से अलग नवगीत को आज़माते हैं। रवि कोई नये गीतकार नहीं हैं। उन्होंने काफ़ी वक़्त गीत की ज़ुल्फ़ों को सँवारने में गुज़ारा है। उन्होंने इस किताब की भूमिका में लिखा है कि जिस संग्रह को पैंतीस-चालीस वर्ष पूर्व आ जाना चाहिए, उसे मैं अब ला पा रहा हूँ। ज़ाहिर है उनकी लंबी गीत यात्रा रही है।
इस नवगीत का नाम ‘काग़ज़ की देहरी पर’ भी कम व्यंजक नहीं है। देहरी की बात हरिवंश राय बच्चन की भी एक कविता में है:
“गीत मेरे देहरी के दीप सा बन
एक दुनिया है हृदय में मानता हूँ
वह घिरी तम से इसे भी जानता हूँ”
पर यहाँ देहरी का दीप घर के भीतर और बाहर दोनों को प्रकाश देता है। वहाँ कवि एक ऐसा दीप जलाना चाहता है जो संसार और मन दोनों को दीप्तिमान कर सके। रवि खंडेलवाल की देहरी काग़ज़ की बनी हुई है, जिसका कोई मज़बूत आधार नहीं है। यह वह काग़ज़ है जिसके बारे में तहज़ीब हाफ़ी कहते हैं:
“मैं कि काग़ज़ की एक कश्ती हूँ
पहली बारिश ही आख़िरी है मुझे”—तहज़ीब हाफ़ी
रवि खंडेलवाल की पैनी नज़र उस काग़ज़ पर जाती है जिसे लिखा तो गया पर अमल में कभी नहीं लाया गया:
“आर्थिक विकासों की
सहकारी योजना
काग़ज़ की देहरी पर
धुन-धुन सिर फोड़ रही है . . .”
यह वह दृश्य है जिसके बारे में अदम गोंडवी कहते हैं:
“तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगरिया आँकड़े में झूठे हैं ये दवा किताबी है”—अदम गोंडवी
काग़ज़ की देहरी पर के अधिकतर गीत आज के शासन तंत्र के चरित्र का उद्घाटन करते हुए नज़र आते हैं:
“भ्रष्टाचारी हुए आज लो
कुर्सी के पाए
अँधियारों में डूबे हैं अब
चहुँ दिशा चौराहे”
उनके गीतों में एक चाशनी है। एक प्रवाह है। एक तरन्नुम है, जो हमें गुदगुदाते हुए आगे बढ़ता है, जैसे यह गीत:
“लौट गया मौसम भी
देकर संकेत
उग आये सिरहाने
तिनकों के खेत॥”
ज़ाहिर है उनके गीतों में सादगी है और यह गीत हम सबके जीवन के केंद्र में घूमते हुए नज़र आते हैं। ऐसा लगता है गीतकार हमें बार-बार आज की दुनिया से आगाह कर रहा है:
“कट गए हमसे
हमारे इस शहर से
अब भला कैसे मिलें हम
दर्द दूरी का भला
कैसे सहें हम”
नवगीत के बारे में प्रायः यह कहा जाता है कि नवगीत की मूल प्रवृत्ति में नयापन है। अगर गीत में नीरवता और ताज़गी नहीं है तो उसे नवगीत नहीं कहा जा सकता। रवि खंडेलवाल हमेशा अछूते बिंब और प्रतीकों को उठाते हैं:
“फटी हुई जेबों में
ख़ाली दो हाथ दिये
सड़कों पर घूम रहे
मुट्ठी को बंद किये”
रवि खंडेलवाल गीतों को एक नई भाव भंगिमा और नई ज़मीन देते हैं। अज्ञेय ने कभी कहा था जिन्होंने कविता को कुछ नया नहीं दिया वह बस लीक पीटने वाले हैं। रवि खंडेलवाल के नए चित्र हमें हमेशा मुतासिर करते हैं:
“बिखरे सौंदर्यों का
एक नया क्रम
काग़ज़ के सिरहाने
झूल रहा भ्रम॥”
ठीक इसी प्रकार उनके गीत जाड़े की धूप, सुबह हो गई, एक शहर आदि भी हमें आंदोलित करते हैं। जाड़े की धूप एक ऐसा नवगीत है, जिसमें अलगनी पर पड़े गीले कपड़े नहीं सूख रहे हैं, क्योंकि वह आदमी की तरह धूप नहीं सेंक सकता:
“सेंक रहे हाथ-पाँव
ठंड में खड़े
लगे सूखने गीले कपड़े
अलगनी पर पड़े”
रवि के नवगीत में भाषा का प्रवाह और टटकापन दिखलाई देता है। साथ ही नए बिंब और नए उपमान के साथ कथन की भंगिमा भी अकस्मात् हमारा ध्यान खींच लेती है:
“खिड़की के बाहर चौतरफ़ा
फैला गीलापन
घर के अंदर भी कमरे में
घुस आई सीलन”
कवि का एक गीत है ‘एक और साल’ जहाँ नए साल में ख़ुशी और मस्ती बनाई जाती है वहीं रवि खंडेलवाल सिर्फ़ गीत की दो पंक्तियाँ में नए साल की नई हक़ीक़त पेश कर देते हैं:
“तार-तार हो गया
ये रेशमी रुमाल”
रवि खंडेलवाल के गीत की ख़ूबी है कि यह गीत किसी दूसरे मुल्क से नहीं आते। वह अपने आसपास की स्थितियों को देखते हैं और इसी परिवार परिवेश और दृश्य को अपने गीतों में पिरोते हैं देखें कुछ मुखड़े:
“झुग्गी वाले गाँव हमारे
शहर हो गए”
“बहुत सवेरे आकर महरी
बरतन माँज गई
दिन भर फेरी देते बीता
यों ही साँझ गई॥”
कहना ना होगा कि गीत जब अपने नए लिबास नवगीत में विकसित हुआ तो उसने शिल्प के स्तर पर पर्याप्त विकास तो किया ही उसमें वह लोक धुन भी आए जिससे अपनी संस्कृति और पर्यावरण महसूस किया जा रहा था।
नवगीत की परम्परा में कुछ गीत ग़ज़ल की तरह भी लिखे गए। स्वयं जानकीवल्लभ शास्त्री ने भी लिखा है कि वह गीत समझ कर ग़ज़ल लिखते रहे। कुछ गीत छोटे तो कुछ बड़े हो गए। नवगीत में छंद के प्रयोग के साथ भी नयापन सामने आया। नए प्रतीक और नई भंगिमायें भी दिखने लगीं। गीत में अपने अनुभव पेश किए गए, सुःख–दुःख प्रेम और विरह को भी पूरी गहराई से अंकित किया गया। सबसे बड़ी बात यह कि यह गीत भारत की ज़मीन से उपजे थे, इसलिए यहाँ लोक गंध की सुगंध मौजूद थी। यहाँ गाँव के रस्मों रिवाज़, त्योहार और तहज़ीब का टटकापन था। यह सारी ख़ूबियाँ रवि खंडेलवाल के गीतों में भी दिखाई देती हैं:
“हाथों में भरकर गुलाल
फेंक दिया
गोरी के गाल
. . . . . .
आँख न लगती
नींद न आती
तबियत घबराती”
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि काग़ज़ की देहरी पर गीत संग्रह सहसा अपनी गेयता और गहराई के कारण पाठकों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। इन गीतों में कवि के हृदय की रूमानियत तो है ही जीवन के अनुभव की विशाल संपदा भी मौजूद है।
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