कल की शाम

01-10-2019

कल की शाम

राहुलदेव गौतम

एक चौखठ को देखा मैंने,
उस पर एक शाम आराम कर रही थी।
भावनाएँ कुछ ठहरी हुईं थीं,
किसी को समर्पण करने के लिए।
वो घर तुम्हारा था करुणा।
वो परचित समर्पण तुम्हारा था,
और बेहिसाब इंतज़ार मेरा था।
कितनी फ़ुरसत में थी वो शाम,
जो तुम्हारे लिए मद्धम थी,
मेरा एहसास कराने के लिए।
जो थकी थीं तुम्हारी,
संवेदनाएँ किसी दीवार की ओट में,
कुछ गरदन झुकाए।
मेरे शून्य हृदय की धड़कन का,
रास्ता देखते-देखते।
हाँ वो घर तुम्हारा था,
वो रात भी तुम्हारी थी।
जिसमें कहीं मैं,
अपने आप को ढूँढ़ रहा था।
जैसे वो श्यामल शाम रुकी थी,
या पलभर के लिए एक दुनिया।
सारे दु:ख-दर्द थम गये थे,
कुछ साँसे भी थीं मद्धम।
कुछ जीवन की इच्छाएँ भी ख़ामोश थीं,
लगता था सदियों के जन्मों का,
कोई कारवां मिल गया था।
वे तुम थे,
वो तुम थे।

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