दर्द की टकराहट

राहुलदेव गौतम

कितनी गहरी है आज की रात,
जैसे कहीं दूर,
तुम्हारे आँखों का काजल धूल गया हो!
लोग कहते हैं,
वक़्त के साथ सब कुछ बदल जाता है,
लेकिन ये दिन और रात नहीं बदले,
बदला है तो सिर्फ़,
तुम्हारे और मेरे दिल की धड़कनें!
जो लम्हा-लम्हा मुझे बदल देता है!
कितनी ठंडी है आज की छाँव,
जैसे सुबह में गीले तुम्हारे बाल!
अब वो सुबह और शाम वाला दर्द,
ना जाने कहाँ ग़ायब हो गया!
न तेरी मुस्कुराहट का कुछ पता है,
शायद मैं तुम्हारे घर की वो दीवार था,
जिसमें तुमनें मुँह भींच कर,
एक कील चुभा दी थी!
और उसी सुराख से,
ना जाने कितने दर्द की झोंके निकल जाते हैं!
हम फिर नहीं आये,
अपनी-अपनी राहों पर!
एक पर तुम जीते रहे,
और एक पर हम मरते रहे!

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