गाँधी: महात्मा एवं सत्यधर्मी

गाँधी: महात्मा एवं सत्यधर्मी  (रचनाकार - दिनेश कुमार माली)

15. गाँधीजी के आध्यात्मिक शिष्य: विनोबा

 

गाँधीजी के कोचराब आश्रम में गाँधीजी अपने मित्र सीएफ एंड्रूज़ के साथ बातचीत में व्यस्त थे। उस समय उनके सामने से एक दुबला-पतला दाढ़ीधारी युवक अल्प तेज़ गति से जा रहा था। उस युवक को दिखाते हुए गाँधीजी ने सीएफ एंड्रूज़ से कहा, “जानते हो दीनबंधु, यह युवक आश्रम के सर्वोत्तम रत्नों में से एक है। वह आश्रम में आशीर्वाद पाने के लिए नहीं, बल्कि आशीर्वाद देने के लिए आए हैं।” 

यह सुनकर 20-21 साल के युवक के दिल में एक अनोखा रोमांच खेल गया और उसने धीरे से सिर झुका लिया। वह सुन्दर, तेजस्वी युवक गाँधीजी के आध्यात्मिक मानस का योग्य उत्तराधिकारी विनोबा भावे था। 

पश्चिमी भारत के कोंकण ज़िले के गापोची गाँव में 11 सितंबर, 1895 को उनका जन्म हुआ था विनायक नरहरि के रूप में। इंटरमीडिएट की परीक्षा देने मुंबई जाते समय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में महात्मा गाँधी के भाषण से मंत्रमुग्ध होकर विनायक ने अपने सारे प्रमाण-पत्र आग में फेंककर जला दिए थे। मन में दृढ़ संकल्प लिया है कि वह महात्मा गाँधी के सिद्धांतों और दिखाए गए मार्ग पर चलेगा। अदम्य साहस और उत्साह से गाँधीजी को एक पत्र लिखकर अवगत कराया था युवा विनायक ने अपने सपनों के बारे में। 

यह सपना साकार हुआ दिनांक 7 जून 1916 को और उन्हें गाँधीजी को कोचराव आश्रम में व्यक्तिगत रूप से मिलने का बहुत बड़ा सुयोग प्राप्त हुआ। दक्षिण अफ़्रीका से भारत लौटने के बाद 25 मई 1915 को गाँधीजी ने अहमदाबाद में अपने बैरिस्टर मित्र जीवनलाल देसाई के कोचराव बँगले में एक आश्रम की स्थापना की। लेकिन बाद में गाँधीजी के मन में कृषि और पशुपालन के साथ अन्य रचनात्मक कार्यक्रमों को करने की इच्छा पैदा हुई। इसलिए 17 जून, 1917 को उन्होंने उस आश्रम को साबरमती नदी के किनारे एक विस्तृत क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया। 

कोचराव बँगलें में नियत समय पर पहुँच जाते थे 20 वर्षीय विनायक। 7 जून 1916 का दिन था। उस दिन भारतीय राजनीतिक चिन्तन में अध्यात्म के अद्वितीय सामंजस्य को बनाए रखने की नवीन परंपरा की नींव रखी गई थी। गाँधीजी विनायक की गणित और संस्कृत भाषा में दक्षता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और दृढ़ संकल्प से बहुत प्रभावित थे। फलस्वरूप, विनायक को गाँधीजी के आश्रम की पूर्णकालिक सदस्यता मिल गई थी। विनायक के लिए यह किसी ईश्वरीय वरदान से कम नहीं था। 

गाँधीजी के साथ अपने दीर्घ साक्षात्कार के बाद विनोबा ने कहा, “गाँधीजी के आश्रम में क़ैदी होने का सौभाग्य प्राप्त करना मेरे लिए अतुलनीय था। अपने जीवन की शुरूआती वर्षों में, मैं हिंसा के माध्यम से भारत के लिए कुछ करने का इरादा रखता था। मगर बापू ने उस इरादे का प्रशमन किया। मेरे मन के अंदर सुलग रही क्रोध की ज्वालामुखी को बापू ने शांत कर दिया। दिन-प्रतिदिन मैं अपने जीवन में धीरे-धीरे परिवर्तन अनुभव कर रहा था।” 

विचारों और चेतना की शुद्धता गाँधीजी के जीवन-दर्शन का एक प्रमुख हिस्सा था। इसीलिए उन्होंने आश्रम की स्थापना कर व्यावहारिक जीवन में नैतिकता के व्यापक प्रयोग पर विशेष बल दिया। पहले कोचराव बँगले में एक आश्रम की स्थापना की, फिर कृषि और पशुपालन की अपनी इच्छा को पूरा करने के लिए उन्होंने आश्रम को अहमदाबाद में साबरमती नदी के तट पर स्थानांतरित कर दिया। वहाँ गाँधीजी के आवास ‘हृदय कुंज’ के बग़ल में दो कमरे वाला एक छोटा खपरीला घर था, ‘विनोबा कुटीर’ के नाम से विख्यात। इस कुटीर में रहते थे सत्याग्रही विनोबा भावे। 

साबरमती आश्रम में विनोबा के दिनचर्या की शुरूआत गीतापाठ से होती थी। उसके बाद मज्जी चले जाते थे आश्रम के विभिन्न कार्यों के लिए। कई बार वे गाँधी जी के साथ गेहूँ बीनने, गेहूँ पीसने, पाखाना साफ़ करने आदि का काम करते थे। फिर समय देखकर नियमित रूप से गीता और उपनिषदों के दार्शनिक चिंतन पर वे गाँधीजी के साथ तात्विक विचार-विमर्श करते थे। 

वे आत्मनिर्भर समाज और राष्ट्र निर्माण की दिशा में गाँधीजी की ‘नई शिक्षा’ (नई तालीम) को सुचारु रूप से लागू करने के गुरुदायित्व का निर्वहन कर रहे थे। गाँधीजी के योग्य शिष्य के रूप में अपने आप को स्थापित किया था। इस वजह से गाँधी जी ने उन्हें 1925 में केरल के भौकमरे मंदिर में समाज के सबसे निचले स्तर के लोगों को प्रवेश देने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। विनोबा की सीधी देख रेख में हो रहे इस प्रगतिशील कार्यक्रम ने पूरे देश में हलचल मचा दी थी। 

सन्‌‌ 1940 में ब्रिटिश साम्राज्य के ख़िलाफ़ गाँधीजी द्वारा शुरू किए गए पहले सत्याग्रह आंदोलन में सबसे पहले सत्याग्रही के रूप में विनोबा को चुना गया था। गाँधीजी के आध्यात्मिक मानस के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में उनका गरिमामय परिचय स्थापित हो गया था। राजनीति और अध्यात्म को एक साथ लाने का श्रेय महात्मा गाँधी को जाता है। महात्मा गाँधी ने आध्यात्मिकता और नैतिकता के बीच की खाई को पाट दिया। विनोबा उस अनूठी शैली के अग्रणी योद्धा थे। विनोबा के मन में गीता ग्रंथ के प्रति मातृत्व का भाव था। विनोबा के शब्दों में, “गीता मेरे जीवन की जीवन रेखा है।”

विनोबा संस्कृत के महान विद्वान थे, शुरू से ही संस्कृत में उपनिषदों की भाष्य-चर्चा के साथ-साथ टीका-टिप्पणी करते थे। उस समय वे बन जाते थे आचार्य विनोबा। परन्तु परवर्ती समय में वे गीता और उपनिषदों के बुनियादी ज्ञान को आम लोगों की भाषा में समझाते थे। इसलिए वे आचार्य विनोबा से बदल जाते थे संत विनोबा में। 

विनोबा का राजनीतिक दर्शन गाँधीवाद पर आधारित होने के बाद भी उनकी अपनी विचारधाराओं से समृद्ध था। सन्‌‌ 1940 में सत्याग्रह के बाद विनोबा तीन बार जेल गए। अपने कारावास अवधि के दौरान, विनोबा ने ‘स्वराज शास्त्र’ की रचना की, जिसमें उनके मौलिक राजनीतिक विचार संगृहीत है। सन्‌‌ 1955 विनोबा ने वर्धा के पास पवनार में ब्रह्मविद्या आश्रम की स्थापना कर महिला सशक्तिकरण का दृढ़ संकल्प लिया। 

एक निष्ठावान गाँधीवादी के रूप में स्वतंत्र भारत को एक समतावादी राष्ट्र के रूप में निर्मित करने के लिए विनोबा ने भूदान जैसा एक सुविचारित कार्यक्रम शुरू किया। 17 साल तक भारत के गाँव से गाँव पैदल चलकर विनोबा ने भूदान कार्यक्रम के तहत 40.4 लाख एकड़ भूमि का वितरण किया। विनोबा लगभग 76, 500 मील पैदल चले। शरीर में न कोई थकान थी और न कोई सुस्ती; मन में छाया हुआ था केवल गाँधी जी के भारत निर्माण का सपना और अदम्य मनोबल। 

विनोबा आध्यात्मिक चेतना की पीठस्थली ओड़िशा पहुँचे। ओड़िशा और बिहार से विनोबा को मिले थे 1.61 लाख गाँव। बालेश्वर के देऊल गाँव से होते हुए तत्कालीन सम्बलपुर, बरपाली और पदमपुर पहुँचने के बाद विनोबा ने कृतज्ञतापूर्वक ओड़ियावासियों के अदम्य साहस बहादुरी और नैतिक जीवन का स्मरण किया। विनोबा की ओड़िया शिक्षा में एक प्रमुख सहायक बने समाजवादी और सर्वोदय कार्यकर्ता अलेख पात्र। विनोबा ने बरपाली की पुण्य धरती पर पहुँचने के बाद, स्वभाव कवि गंगाधर मेहर के स्मृतिपीठ पर श्रद्धांजलि अर्पित की थी। पदमपुर में राजबोडासंबर हाई स्कूल के एक कक्ष में रहते समय उन्होंने गीता पर हिंदी में एक पुस्तक “नित्य-पठनीय” लिखकर उपस्थित लोगों को उपहार देते हुए ओड़िशा की मिट्टी को गौरवान्वित किया था। विनोबा का राजनीतिक चिंतन, गाँधीवादी चेतना, आध्यात्मिक अनुरक्ति और सामाजिक प्रगति के लिए उनका रचनात्मक कार्यक्रम का उद्देश्य था स्वतंत्र भारत में गाँधीजी के स्वर और स्वाक्षर। 

महान दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल ने विनोबा को पैदल संत और मसीहा की उपाधि देते हुए सन्‌‌ 1962 में लंदन में आयोजित परमाणु-विरोधी पदयात्रा में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया था। संत विनोबा की उस पदयात्रा में कुछ दिनों के लिए शामिल हुए थे अंग्रेज़ी कवि टेनीसन के पुत्र हलाम टेनीसन। उनके शब्दों में, “आधुनिक समाज प्रगति से भले ही परिपूर्ण है, परन्तु दिव्य चेतना से समृद्ध संतों के अभाव में बहुत ग़रीब। विनोबा ऐसे ही एक संत हैं, जो हमें सही रास्ते पर ले जाने वाले सच्चे पथ-प्रदर्शक हैं।” 

गाँधी जी के आध्यात्मिक मानस के सुयोग्य उत्तराधिकारी विनोबा भावे आधुनिक समाज को रोशनी दिखाने वाले एक विद्वान संत थे। 

प्रगतिवादी
11, सितंबर 2020

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