(सॉनेट)
हरे हरे पत्तों पर चमकती नारंगी किरण
जैसे वन-वन गाए कोयल व नाचे हिरण
सुमधुर स्वर लगाए कलकल बहती सरि
क्या कहते हैं ओ! धवल नवल मेघावरि।
वसंत की नई छटा मन को करे उल्लसित
कविता की गंध से आज ऋतुराज पूरित
यह जो छाया है धरा पर उत्सव प्रेम का
कह दूँ मैं भी आज मन हुआ है रसिक सा
शुभ्रा है ऊषा.. सुगंधित हुई है चहुँओर
लगे तन में प्रतिक्षण जैसे छू रही है भोर
स्वर्गिक इन भावों को जोड़ता हूँ ईश्वर से
कि नित्य नए प्राण से इस तन को भर दे
ऋतु वसंत की.. पवन भी है देखो वासंती
पर्वमुखर स्वप्न में हुई प्रस्फुटित वैजयंती।
1 टिप्पणियाँ
-
मेरी रचना को प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित करने के लिए आदरणीय संपादक महोदय का हार्दिक अभिनंदन सह आभार ????????