हिंदी–मेरी गरिमा

01-10-2025

हिंदी–मेरी गरिमा

डॉ. विनीत मोहन औदिच्य (अंक: 285, अक्टूबर प्रथम, 2025 में प्रकाशित)

 

(सॉनेट) 
 
जहाँ से होता है आरंभ, शब्दों का सागर 
पुस्तकों में गीत, कथा का उदित भास्कर, 
मेरी संस्कृति, परंपरा में घोलती सुगंध, 
विश्वभर की मिठास से लिखता अनुबंध, 
 
वह एक है भाषा, मेरे श्वास की परिभाषा। 
उत्तर से दक्षिण पर्यंत बहती अभिलाषा, 
पूर्व दिशा के झरनों में बहते कई अक्षर, 
करते अंकुरित राष्ट्र प्रेम के विराट तरुवर, 
 
वह है एक भाषा जो नित्य चरण पखारे, 
भारत माता के सपनों को नित्य सँवारे। 
माथे पर चमकते सिंदूर सी है गरिमा 
हिंदी, मेरी आत्म शक्ति की शेष महिमा। 
 
आओ करें हिंदी की ध्वजा का आरोहण, 
रहे स्वतंत्र प्रत्येक युग में, हो धरावतरण। 

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