मुस्कान 

01-05-2026

मुस्कान 

डॉ. विनीत मोहन औदिच्य (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

(सॉनेट) 
 
करो युद्ध यदि आए समाज में परिवर्तन, 
उठाओ अस्त्र यदि हो जाए शत्रु का दमन। 
ध्वस्त कर दो यदि सृष्ट हो जाए पारिजात, 
मिटा दो तम यदि ले आओ नव प्रभात। 
 
​युद्ध है केवल विनाश का . . . अंतहीन पथ, 
जीवन-मरण के मध्य एक मिथ्या ही रथ। 
मुस्कुराती यह धरा क्षण में होती धूल, 
स्वार्थ में मनुष्य निज स्नेह जाता भूल। 
 
​व्यर्थ है माया, निरर्थक यह पतित काया, 
कैसी यह रक्त-क्रीड़ा, कैसा यह साया? 
ग्रस्त है संपूर्ण विश्व, युद्ध बना मुख्य धर्म, 
त्याग दानव-वृत्ति, अब करो मानवीय कर्म। 
 
​अति कठिन अधर पर रचना सुंदर मुस्कान, 
सहज है रचना, विध्वंस का जलता मसान। 

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