बदलाव
नीरजा हेमेन्द्र
अश्रुओं ने निकलना छोड़
शब्दों को गढ़ना सीख लिया है
आँखों ने विवशता के भावों को त्याग
बदलाव को पढ़ना सीख लिया
अब भी . . .
शब्दों को छीन लिए जाने का
कुचक्र रचा जा रहा है
गन्ने की पौड़ियाँ काटते-काटते
कठोर हो चुके हाथों को
मुट्ठियाँ बनाना सीखने में
युग बीत गये/अब भी
हाशिए पर लिखी जा रही है
मुख्य पृष्ठ की इबारत
अब भी बह रही है
चाँदनी में स्याह रातों की कालिमा।
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