आयु का स्वर्णिम काल
डॉ. विनीत मोहन औदिच्य
(सॉनेट)
यह आयु का स्वर्णिम काल, मुरझाए कलियों का तप्त छाल
एक है मंत्र निर्मित यज्ञशाला, अन्येक भग्न मन का भ्रमजाल
स्वतः आया था, जीवन वाटिका को किया स्पर्श, होगा अस्त
निशांत के नीरज से कर वार्तालाप, वेदना स्तूप होगा ध्वस्त
वसंत की काकली, ओढ़ आम्रमंजरी, गाती हुई आसावरी
बिखेरती ध्वनि तरंग, सप्तरंग की रागिणी लजाती विभावरी
निद्राग्रस्त नेत्र कोटर, भरते अश्रुजल, असंख्य स्वप्न से अंतर
नक्षत्रपुंज में ढूँढ़े समय का वह भाग . . . जो हुआ था निरुत्तर
आओ! देवांगना! देखो उदयाचल हो रहा रक्तिम, है मधुरिम
सूर्य की सूक्ष्म कणिकाएँ, कुहासे में होतीं लीन, दृश्य अंतिम
यह वर्तमान लिख रहा इतिहास, अतीत का निर्मम अट्टहास
काल के भँवर में, भ्रष्ट यौवन, देख रहा भविष्य का कारावास
सो गई विस्मृति की पृथ्वी, लुप्त हुई उषा, भस्म हुईं अस्थियाँ
कहाँ है आयु का स्वर्णिम काल, कहाँ हैं वे नैसर्गिक ग्रंथियाँ?
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कविता
-
- अदृश्य चक्षु
- अपरिचित
- अप्सरा
- अप्सरा
- आयु का स्वर्णिम काल
- उद्विग्न आकाश
- जीवन का उत्तरार्ध
- तुम जो हो ऐसी . . .
- देवता
- नीलांबरी
- पन्द्रह अगस्त
- पिता
- पूर्णविराम
- प्रश्न
- प्रीति का मधुमास
- प्रीति की मधु यामिनी
- भारत वर्ष
- भावना
- माँ
- माँ
- मुस्कान
- मृग मरीचिका
- मृगतृष्णा
- मैं, नदी, सागर
- वसंत
- वीर गति
- वेदना की राह में
- समय
- साँझ की बेला
- सिंदूर
- सिक्त मन का श्रावण
- सिक्त स्वरों के सॉनेट
- सुरसरि
- सृष्टि का विनाश
- स्वयं में . . .
- स्वर्णिम भारत
- हिंदी–मेरी गरिमा
- अनूदित कविता
- ग़ज़ल
- विडियो
-
- ऑडियो
-