विशेषांक: दलित साहित्य

10 Sep, 2020

बुद्ध अगर तुम औरत होते

कविता | डॉ. रजनी अनुरागी 

1.
बुद्ध अगर तुम औरत होते
तो इतना आसान नहीं होता गृहत्याग
शाम के ढलते ही तुम्हें हो जाना पड़ता
नज़रबंद अपने ही घर और अपने ही भीतर
हज़ारों की अवांछित नज़रों से बचने के लिए,
और वैसे भी माँ होते अगर तुम  
राहुल का मासूम चेहरा तुम्हें रोक लेता
तुम्हारे स्तनों से चुआने लगता दूध
फिर कैसे कर पाते तुम  
पार कोई भी वीथी समाज की।

2.
घने जंगलों में प्रवेश करने
और तपस्या में तुम्हारे बैठने से पहले ही
शीलवान तुम्हें देखते ही स्खलित होने लगते
जंगली पशुओं से ज़्यादा सभ्यों से भय खाते तुम
ब्राह्मण तुम्हारी ही योनि में करते अनुष्ठान
और क्षत्रिय शस्त्रास्त्र को भी वहीं मिलता स्थान
वैश्यों ने पण्य की तरह बेच कर बना दिया होता वेश्या तुम्हें
और और ये कहने में कोई गुरेज़ नहीं है मुझे
कि शूद्रों का भी होते तुम आसान शिकार
औरत के मामले में होते हैं सब पुरुष
अभिशप्त जीवन जीने को जब होते मजबूर 
तब बताओ कैसे मिलता बुद्धत्व तुम्हें
और तुम कैसे कहलाते बुद्ध?  


3.
अगर रह जाते तुम अछूते
तो तुम्हारी चमड़ी के सूत-सूत को देना होता हिसाब
तब भी क्या तुम्हें सम्मान देता तुम्हार परिवार
तुम्हारे स्वागत के लिए आता क्या सिद्धार्थ
क्या दौड़ी-दौड़ी आतीं महामाया तुम्हें गले लगाने
शुद्धोधन मान लेते क्या तुम्हें परम ज्ञानी बिटिया
राहुल कर पाता गर्व तुम्हारा पुत्र होने पर
न जाने कितनी ही बार चीर दी जाती  
तुम्हारी देह लाँछनों की थ्रेशर मशीन से
सारी जनता करती तुम्हारा बहिष्कार
तुम्हें मिलती नसीहतें हज़ार
नहीं उठता तुम्हारे समर्थन में एक हाथ
करुणा घृणा में बदल जाती
बोलो! कैसे बन पाते बुद्ध, 
कैसे कह पाते - अप्प दीपो भव? 
जब तुम्हारे आत्मसम्मान को कर दिया जाता राख!

4. 
चौहद्दियों से परे जाने पर
क्या तुम्हें निरपराध होने की गवाहियाँ मिल जातीं
कितने ही ऋषि मुनियों की तपस्या भंग करने का लगता अभियोग
बाँध कर उसी बोधिवृक्ष के साथ  कर दिया जाता जीते जी दाह संस्कार
एक गाली बन कर रह जाता तुम्हारा नाम
भयावह क्रूरता के आगे ठगा सा रह जाता सम्यक ज्ञान
हवा हो गया होता बोधिवृक्ष और बुद्ध का नाम 
और न कहीं होता ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’
 
बोलो बुद्ध अगर तुम औरत होते 
तो क्या इतनी आसानी से मिल जाता
तुम्हें निर्वाण का अधिकार?

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