विशेषांक: दलित साहित्य

10 Sep, 2020

माँ ने बड़े मन से मँगवाई थी खुर्जा से
एक बड़ी और मज़बूत चूड़ीदार ढक्कन वाली बरनी
जिसमें डाला करती थी वो ख़ूब सारा आम का अचार
जबकि ख़ुद उसे पसन्द नहीं थीं खटास वाली चीज़ें
खट्टा चूख कहते ही उसके दाँत खटास से भर जाते थे
खट्टी छाछ तक नहीं पीती थी माँ
तो खट्टी कढ़ी तो बन ही नहीं सकती थी
क़लमी आमों की बनाती थी मीठी चटनी
और आमों की हल्की खट्टी-मीठी रसेदार सब्ज़ी
जिसमें रहता था सौंफ का सौंधियाता ज़ायका 
जिसकी मिठियाती गुठली को ख़ूब देर तक चूसती रहती थी
जैसे बूँद बूँद रस समेट लेना चाहती हो अपने भीतर।
 
आम के अचार के लिए आम आते
दाब से कटते, मींग अलग, फाँक अलग
फाँकों में लगता नमक रात भर 
चारपाई पर बिछी चादर पर दिन की उजली धूप में 
एक एक फाँक को पलट पलट कर धूप से भर दिया जाता 
जैसे सूरज से हर फाँक के लिए माँग ली जाती हो लम्बी ज़िन्दगी!
 
मुझे याद है माँ ने ख़ूब धो माँझ कर
बरनी को धूप में नहलाया जैसे नहलाती थी मुझको
फिर धूप में नहाई बरनी में 
सारे मसाले अनुभव की तराजू जैसे हाथों से
तौलकर मिला दिए हरेक फाँक के भीतर तक
और डाल दिया कोल्हू से पिराया सरसों का तेल ऊपर तक
 बन्द करके रखी बरनी को ख़ूब भरपूर धूप लगाई गई
हर सीलेपन से बचाया जाता अचार भरी बरनी को 
मगर उसकी हथेलियों में या कहूँ कि उसके नयन कोरों में
शायद यही सीलापन संचित रहता आता था सालों साल।
 
फिर धीरे धीरे माँ छीजने लगी
माँ ने अचार डालना भी बंद कर दिया
घर के तमाम बाशिन्दे नए नए रिश्तों में बँध गए
और कहीं पैर पसारने लगी थी रिश्तों में बढ़ती खटास!
घर बनता जा रहा था खटास से भरी बरनी की तरह
और बरनी थी कि होती जा रही थी लगातार ख़ाली
उसके आम अब ख़ास हो गए थे और वो पड़ गई थी पुरानी।
 
अब मॉड्यूलर किचन में बरनी रखने की कोई वज़ह नहीं बची थी
फिर भी माँ ने उसे सम्भाल के रखा था अपने सीने से लगा के
माँ लगातार उसकी धूल को झाड़ती 
जैसे उसके बहाने ख़ुद को नया करती हो।
 
एक दिन बरनी को फेंक दिया गया कूड़े के ढेर पर
बरनी अचार की फाँकों सी बिखर गई
और माँ के भीतर भी जाने क्या क्या टूट गया उस दिन!
 
उस दिन माँ अपने सिमटे से कोने में बड़बड़ाती रही
और करती भी क्या सिवाय बड़बड़ाने के
किसी बेटी को ही दे देते तोड़ क्यों दी
जैसे वो सौंपना चाहती हो अपनी कोई विरासत अपनी बेटी को 
सम्पत्ति चाहे बेटे सम्भाले पर उसको भरोसा था
कि उसकी सम्भावनाओं को बेटी ही सम्भाल सकती है,
कम से कम बची तो रहती बरनी 
जैसे बची रहती है माँ अपनी बेटी में! 

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