विशेषांक: दलित साहित्य

11 Sep, 2020

सुशीला टाकभौरे की कहानियों में अभिव्यक्त सामाजिक चेतना

शोध निबन्ध | डॉ. प्रीती. के.

समकालीन हिन्दी दलित साहित्य क्षेत्र में सुशीला टाकभौरे का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने अपने जीवन के भोगे हुए यथार्थ को बड़ी ताज़गी के साथ रचनाओं में अंकित किया है। उन्होंने अपनी रचनाओं में दलित समाज के बच्चे, बूढ़े, युवा-युवतियों, सभी वर्ग का प्रतिनिधित्व बड़ी क्षमता के साथ किया है। उनकी कहानियाँ यथार्थ के धरातल पर समाज का प्रतिनिधित्व करने के साथ दलित चेतना के विकास में भी सक्षम है। उनकी रचनाएँ स्वानुभूतियों का जीवंत दस्तावेज़ है। उन्होंने स्वयं सामाजिक विषमता का ज़हर पिया है, परिमाणतः दलित यातना से रूबरू कराती उनकी रचनाएँ प्रबल आक्रोश के रूप में फूट पड़ती है। दबी-कुचली मानवीय संवेदना को आंदोलित करती है और उन्हें क्रान्ति की पहल द्वारा अपनी समस्याओं का समाधान तलाशने में प्रेरित करती है।
उनकी प्रमुख रचानाएँ हैं :-

कहानी संग्रह – ‘संघर्ष’ (2006), ‘अनुभूति के घेरे’ (2011), ‘टूटता वहम’ (2012)
काव्य संग्रह – ‘स्वाति बून्द और खारे मोती’, ‘यह तुम भी जानो’, ‘तुमने उसे कब पहचाना’, ‘अपने हिस्से का सूरज’।

सुशीला टाकभौरे एक मंजी हुई कवयित्री और नाटककार के साथ एक सशक्त दलित कहानीकार भी हैं। सन् 2006 में प्रकाशित ‘संघर्ष’ कहानी संग्रह में कुल ग्यारह कहानियाँ संकलित हैं। इसमें विविध समस्याओं का अंकन करके सामाजिक क्रान्ति के बीज बोये गए हैं। सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक – ये तीन क्षेत्र प्रमुख रूप से मानव जीवन से जुड़े हुए हैं। दलितों की दुरवस्था, उनका शोषण, गिरता सामाजिक स्वास्थ्य तथा मानसिक टूटन आदि के कारण कहानीकार ने सामाजिक क्रान्ति की भावना से 'संघर्ष' के पात्रों को गढ़कर कथानक की बुनावट की है।

'संघर्ष' कहानी संग्रह के साथ उनके और दो कहानी संग्रह 'अनुभूति के घेरे' (2011), और 'टूटता वहम' (2012) बड़े चर्चित कहानी संग्रह रहे हैं। 'अनुभूति के घेरे' में तेरह कहानियाँ और 'टूटता वहम' में ग्यारह कहानियाँ संकलित हैं। इनमें संकलित समग्र कहानियाँ दलितों में अस्मिता का एहसास दिलाकर उनकी अस्मिता को जगाकर विद्रोह को उकसानेवाली कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ दलित जीवन के आशा-आकांक्षाओं को दर्शानेवाली रही हैं। उनमें आशावाद और भविष्य के प्रगति के संकेत दिखाई देते हैं।

डॉ. सुशीला टाकभौरे द्वारा रचित 'सिलिया' भंगी समाज की उस होनहार लड़की की कहानी है जो उच्च शिक्षा पाने की इच्छुक, आज्ञाकारी एवं गंभीर स्वभाव की लड़की है। वह लड़की मन ही मन अपने समाज में सुधार लाने के लिए दृढ़ संकल्प है। वह एक प्रकार से अपने सोये हुए समाज केलिए जागरूक व प्रेरणादायी पात्र है। सिलिया ने मन ही मन दृढ़ संकल्प किया है कि "मैं बहुत आगे तक पढ़ाई करूँगी, शिक्षा के साथ अपने व्यक्तित्व को भी बड़ा बनाऊँगी। उन सभी परंपराओं के कारणों का पता लगाऊँगी, जिन्होंने उन्हें अछूत बना दिया है।"1 सिलिया बड़ी कठिनाइयों से मैट्रिक पास करती है। सुदृढ़ और पक्के इरादोंवाली सिलिया ने सवर्णों से अनेक सामाजिक उत्पीड़न सहे हैं। फिर भी इन तमाम असुविधाओं के बीच भी वह सम्मान से जीना चाहती है। यही संकल्प उसे लड़ने की ताक़त देता है। ‘ दुनिया’ नामक अख़बार में एक विज्ञापन छपता है कि 'शूद्रवर्ण की बहू चाहिए’2 मध्यप्रदेश के भोपाल के जाने-माने युवनेता सेठजी अछूत कन्या से विवाह करके एक आदर्श निर्माण करना चाहते हैं। उनकी शर्त यह थी कि लड़की मैट्रिक पास हो। लोगों ने सिलिया की योग्यता देखकर उसकी माँ को सलाह दी कि "सिलिया को इस शादी से लाभ उठाने का अवसर है। तुम सिलिया का फोटो, जीवन-परिचय, पता यह सब लिखकर भेज दो। वह राज करेगी।"3 लेकिन सिलिया की माँ कहती है "नहीं भैय्या यह सब बड़े लोगों की चाल है। आज समाज को दिखाने के लिए हमारी बेटी से शादी की लेंगे और कल छोड़... दिया तो...हम गरीब लोग उनका क्या कर लेंगे। अपनी मान मर्यादा अपने समाज में रहकर भी हो सकती है। उनकी दिखावे की चार दिन की मर्यादा हमें नहीं चाहिए। हमारे परिवार और समाज में वैसा मान सम्मान नहीं पा सकेंगे, न ही हमारे घर की रह जायेंगी। हम उसको खूब पढ़ाएँगे। उसकी किस्मत में होगा तो इससे ज्यादा मान सम्मान वह खुद पा लेगी। अपनी किस्मत वह खुद बना लेगी।"4

सिलिया अपनी माँ की इच्छा सफल करने के लिए अच्छी तरह पढ़ने के कारण उसको सभी गुरुजनों से मान-सम्मान मिलता है। बचपन में जातिभेद के कारण भोगे हुए जीवन यथार्थ ही उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। वह इन सबसे मुक्त होना चाहती है। उसे छुआछूत, जातिभेद, सेठजी महाशय का ढोंग आदि अच्छा नहीं लगता है। वह आगे पढ़ लिखकर स्वयं को बहुत ऊँचा स्थापित करती है। वह अपने समाज को उन्नति की ओर ले जाने के लिए परिश्रम करती है। वह दलित मुक्ति आन्दोलन की सक्रिय कार्यकर्ता, विदुषी, समाजसेवी, कवयित्री, प्रसिद्ध लेखिका के रूप में मंत्री महोदय से सम्मान पाकर भाषण भी देती है। यहाँ शिक्षा ने सिलिया का मनोबल बढ़ा दिया है।

भारत में दलित समाज का जीवन आज भी अनेक विद्रूपताओं से भरा हुआ है। सदियों से यह वर्ग अन्याय और अत्याचार की यातना झेलता रहा है। सुशीला टाकभौरे की 'बदला' कहानी में जातिभेद, सामाजिक असमानता, छुआछूत, भेदभाव आदि बातों पर तीखा व्यंग्य कसा गया है। इस कहानी का कल्लू भंगी परिवार का लड़का है। स्कूल में वे अपने सवर्ण सहपाठी के साथ खेलते समय हमेशा जीत जाता था। खेल-खेल में उनका जीतना और सवर्ण छात्रों का हारना कल्लू के पिता उतना अच्छा कार्य नहीं समझते थे। वे अपने बेटे को यही उपदेश देता है कि "बेटा किसी से मुसीबत मोल मत लेना। अपन उनके बराबर के नहीं है, वे हमसे बड़े हैं।"5 सवर्णों के पीछे रहना ही दलित लोग पसंद करते हैं। इसी मानसिकता के कारण कल्लू पहलवान होकर भी सवर्ण बच्चों से डरता है। लेकिन सवर्ण जाति के छात्र राजन, गुड्डू और सुनील तीनों मिलकर उसे बहुत अधिक मज़ाक उठाने पर वह उसे मार देता है। मारने के बाद अपने घर लौटा है। वह घर पहुँचते ही उन सवर्ण बच्चों के परिवार के लोग कल्लू को मारने के लिए डंडे लेकर उसके घर आते हैं। कल्लू की दादी माँ और माँ उनसे हाथ जोड़कर क्षमा माँगने पर भी वे नहीं लौटते। राजन ठाकुर का बड़ा भाई और उसका दोस्त गुड्डू रघुवंशी के माँ, पिताजी, काका, काकी आदि कल्लू के परिवार से दया न करते और गालियाँ देते रहे– "भंगी की औलाद.....औलाद....अछूत, शूद्र, भिखारी....भिखमंगे....हमारी दया पर जीनेवाले.....हमारे टुकड़ों पर पलनेवाले....इनको तो गाँव में घूमने नहीं देना चाहिए.....इनके लिए पहलेवाले नियम ही ठीक थे। हमारी सरकार भी उनको बहुत बढ़ावा देती है....एक एक को मार डालेंगे...इनके घरों में आग लगा देंगे।"6 सवर्ण लोगों के साथ आये औरतें भी कल्लू के परिवारवालों को जातीयता के नाम पर अपमान करती हैं। रघुवंशी स्त्रियों की बातें सुनकर छौआ माँ हक्की-बक्की रह जाती है। उसके मन में महीनों पहले की घटना याद आती है।

होली के दिन में गाँव की औरतें छौआ माँ को अपने साथ होली खेलने के लिए बुलाती है। छौआ माँ उनके साथ ही होली मनाई थी। तब से छौआ माँ के मन में वे सब औरतों के प्रति प्रेम और अपनापन का भाव था। आज उन औरतों के मुँह से इस प्रकार की गालियाँ सुनकर वह ग़ुस्सा होती है और कहती है– “मैं भी किसी को नहीं छोड़ूँगी....तुम सबका खून पी जाऊँगी। हे काली मैया, तू उसका भोग ले लेना। हे मरई माता, तू उनको सीधा लील जाना....”7 इसप्रकार छौआ माँ परंपरागत देवी-देवताओं से अपनी रक्षा की विनती करती है। कुछ देर के बाद सवर्ण लोग वहाँ से लौट जाते हैं। एक दिन कल्लू स्कूल से लौटते समय सवर्ण लोग उसे घेर कर लाठियों से मारते हैं। यह बात सुनकर कल्लू के पिता और उनके समुदाय के पूरे लोग इकट्ठा होकर लाठियाँ लेकर सवर्ण लोगों का सामने करने के लिए निकलते हैं। छौआ की माँ भी रणचंडी का रूप धारण कर बैठी थी। वह कहती है कि– “अब हम किसीसे नहीं डरेंगे। हम भी ईंट का जवाब पत्थर से देंगे। वे शेर है तो हम सवाशेर बनकर रहेंगे।”8  छौआ माँ का यह निर्णय पूरे समाज को अधिक शक्ति भी देता है। सबमें आत्मविश्वास जाग गया था। गाँव की लोगों की एकता देखकर पूरे सवर्ण लोग घबराकर वहाँ से भाग निकलते हैं। पूरे गाँव में सामाजिक क्रान्ति पैदा हुई। यदि दलित लोग एकता से रहें तो गाँव में सवर्णों द्वारा हो रहे शोषण का अंत होगा, साथ ही दलित भी सवर्णों जैसे स्वतंत्रता से बिना भय से जीवन जी सकते हैं। समाज में जातीय भेदभाव के विरुद्ध यह कहानी खुला सा विद्रोह प्रकट करती है और इससे मुक्ति की राह प्रदान करती है।

भारतीय समाज में दलित नारी को नारी और दलित होने का जो दोहरा अभिशाप प्राप्त हुआ है, इसी कारण वह अधिक कमज़ोर, अविकसित, शोषित, अपमानित जीवन जीती हुई दिखाई देती है। सुशीला जी की 'छौआ माँ' नामक कहानी में एक आदर्श चरित्रवाली नारी के रूप में एक दाई का चित्रण किया गया है। छौआ माँ साठ उम्र की स्त्री है। वह अपने गाँव में जचकी का काम सँभालती है। वह अपना काम अधिक लगन, त्याग, ममता, प्यार आदि के साथ करती है। उसकी बेटी तो यह काम पर जाने में सहमत नहीं है। वह अपनी बेटी तुलसा को समझाती है कि – “काम पड़े तो करना पड़ते हैं, मैं नहीं करत तो कौन करेंगे उनका काम? बेचारी बहु-बेटियाँ मेरी रास्ता देखते हैं।”9 छौआ माँ को यह काम करने के लिए डॉक्टरों ने दाई के सर्टिफिकेट भी दिया है। वह तो अपने इस काम करने में हमेशा गर्व भी महसूस करती है। यह काम के साथ वह सारे घर की सफ़ाई और अन्य काम भी करती है। यह काम के लिए सवर्ण जातिवालों के घर के अंदर भी वह जा सकती। लेकिन काम हो जाने के बाद उसका स्थान तो घर से बाहर था। ये काम के लिए उसे रुपये भी मिलते हैं। लड़की होने पर कम, लड़का होने पर ज़्यादा रुपये मिलते हैं। एक दिन वह सौदा ख़रीदने के लिए तहसील जाने पर गाँव के कुछ लोग जचकी के लिए छौआ माँ को बुलाने आते हैं। घर में दाई के अभाव में वे तो यह काम उसकी बेटी तुलसा से करवाना चाहते हैं। तुलसा इस काम से नफ़रत करने के कारण इस काम में जाने के लिए मना करती है। सवर्णों द्वारा ज़िद करने पर वह तो इस काम करने के लिए विवश हो जाती है। दूसरे दिन छौआ माँ लौट आती है। यह ख़बर सुनकर वह नाराज़ होती है। क्योंकि वह तो कभी अपनी बेटी से इस काम करवाना नहीं चाहती थी। इसकी प्रतिक्रया के रूप में वह इस काम छोड़ने का निर्णय करती है। कुछ महीनों बाद गाँव के पटेल के घर से कुछ लोग यह काम के लिए उसे बुलाने आते हैं। पहले वह तो मना करती है, पर बाद में जाने के लिए तैयार होती है। इससे व्यक्त है कि उनके मन में यह काम के लिए लगाव है, त्याग है। इस कहानी से स्पष्ट है कि दलित नारी अपने पारंपरिक काम से अपने बच्चों को मुक्त कराना चाहती है। उसके लिए वह जीवन भर संघर्ष करने के लिए भी तैयार है।

डॉ. सुशीला टाकभौरे की कहानियों में दलितों की तमाम यातनाओं, पीड़ाओं और उपेक्षाओं को भोगे हुए यथार्थ के आधार पर प्रामाणिक एवं मार्मिक अभिव्यक्ति मिली है। दलित शोषण में दलित महिलाओं के साथ भयावह अन्याय और अत्याचार हुए हैं। जातीयता के नाम पर दलित नारियों को अपमानित करके गाँव में नंगा घुमाना, उनके साथ बलात्कार करना आदि अमानवीय व्यवहार दलित नारियों के साथ हो रहे हैं। डॉ. सुशीला जी की ‘दमदार’ कहानी में नारी शोषण का खुला-सा विरोध देख सकते हैं। गाँव में भग्गू ठाकुर एक पहलवान है। वह तो सच्चरित्र व्यक्ति है। जग्गू उसका छोटा भाई है, पर वह तो दुबला-पतला चरित्रहीन और गुंडा बदमाश है। भग्गू को इज़्ज़त देने के लिए लोग तो जग्गू को भी पहलवान मानकर मान देते हैं। जो व्यक्ति जग्गू को नहीं मानते उनके साथ वह अनैतिक व्यवहार और अनाचार करते हैं। इस कारण गाँव के सभी लोग उससे डरते हैं। दलित स्त्रियाँ अपनी इज़्ज़त के लिए उसे डरने लगती हैं। जग्गू ने अपने को न मानने के कारण गाँव के एक पागल औरत और बेचारी प्रेमलता की इज़्ज़त लूट लेता है। इस समय सुमन नामक एक औरत गाँव में किराए के घर में रहने के लिए आती है। उसका पति जेल में है। गाँव में वह स्वतन्त्र रूप से घूमती-फिरती है। प्रेमलता के साथ हुई इस अमानवीय व्यवहार सुनकर वह क्रोध से जल उठकर जग्गू से प्रतिकार करने का निश्चय करती है।

वह पहले जग्गू को अपने वश में करके उनकी कमज़ोरियों को पहचानकर ही उससे बदला लेती है। “कई महीनों का आक्रोश और दबी हुई प्रतिशोध की भावना उसके चेहरे पर चमकने लगी। उसकी आँखों में गुस्से का लावा है। पर होठों पर सफलता की खुशी झूम रही है।”10  इस प्रकार यह कहानी सुमन नामक दलित औरत का विद्रोह मात्र नहीं, पूरे दलित स्त्रियों का विद्रोह और आक्रोश है। इससे व्यक्त है कि समाज के अन्याय और अनैतिक व्यवहार के विरुद्ध लड़ने में दलित स्त्रियों में भी ताक़त है ऊर्जा है और धैर्य है।

‘झरोखे’ नामक कहानी लेखिका की अपनी कहानी है। इसके माध्यम से वह हर एक दलितों की जीवन-यात्रा बताती है। इसमें स्कूल से लेकर आज तक की उनकी स्मृतियाँ बताती है। दलित लोग हमेशा अपने बच्चों से बताते हैं कि हम दलित हैं, दूसरों से नीच जाति वाले हैं। बच्चों के मन बचपन से ही यह भावना भरें तो उनके मन में हीनताबोध पैदा होता है। इस कारण उसका व्यक्तित्व विकसित नहीं होता, होशियार होने के बावजूद भी उनमें आत्मविश्वास का अभाव होता है। दलित लोगों को सोचना चाहिए कि “हम दूसरों को दोष देने से पहले अपनी गलती देखें और सिर्फ अपनी गलती देखते रहें, तब हमें दूसरों का दुर्व्यवहार नज़र आता है। उनकी सिर्फ अच्छाई नज़र आती है, ऐसा नहीं होता है तो अपनी ही गलती मानकर चुप रहना चाहिए।”11  लेखिका की माँ उन्हें पढ़कर आगे बढ़ने का हौंसला देती है। अपने स्कूल में भी लेखिका को गुरुजनों से अच्छे संस्कार ही मिले हैं, इस कारण उनके मन में आत्मविश्वास बढ़ गया। यह कहानी हर एक दलित बच्चे को आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। निम्न जाति में पैदा होने के कारण मन में कोई हीनताबोध की आवश्यकता नहीं, हम भी सवर्णों के जैसे मनुष्य हैं। ऐसे आत्मविश्वास के साथ पढ़कर ऊँचे पद हासिल करके देश के लिए अच्छा नागरिक बनना चाहिए।

संक्षेप में सुशीला टाकभौरे का दलित कहानी साहित्य दलितों के लिए आत्मसम्मान खोजने और तत्कालीन जाति-व्यवस्था के ख़िलाफ़ क्रांति करने की प्रेरणा देते हैं। आज के वर्चस्ववादी समाजशास्त्र में एक दलित का स्थान हीन, निकृष्ट, घृणित और दुत्कारे हुए व्यक्ति का है। जन्म से ही घृणित, नीच माने जानेवाले दलित वर्ग में आज धीरे-धीरे प्रतिशोध की चेतना जागृत हो रही है, जिसकी अभिव्यक्ति सुशीला जी की कहानियों में हो रही है। निश्चय ही ये कहानियाँ दलितों को अपमान और तिरस्कार से मुक्ति, दिलाने के लिए प्रतिरोध के समाजशास्त्र को गढ़ने के लिए लिखी जा रही है और अपने उद्देश्य में सफल भी हो रही हैं। उनका कथा साहित्य हमें मानवीय मूल्यों के प्रति सजग बनाता है। सामाजिक चेतना एवं परिवर्तन को दिशा दिखानेवाली ये कहानियाँ दलितों के लिए नए समाज की स्थापना करने का प्रयास कर रही हैं।

संदर्भ सूची

1. डॉ. कुसुम वियोगी, दलित महिला कथाकारों की चर्चित कहानियाँ, पृ. 22
2. वही, पृ. 23
3. वही, पृ. 24
4. वही, पृ. 25
5. सुशीला टाकभौरे – संघर्ष, पृ. 59
6. वही, पृ. 62
7. वही, पृ. 62
8. वही, पृ. 63
9. वही, पृ. 44
10. वही, पृ. 46
11. वही, पृ. 47


डॉ. प्रीती. के
सहायक आचार्य एवं हिन्दी विभाग अध्यक्षा
हिन्दी विभाग
पय्यनूर कॉलेज , कन्नूर विश्वविद्यालय 
कन्नूर, केरला
मोबाइल नंबर.828918100
 Email: preethamandeep@gmail.com

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