विशेषांक: दलित साहित्य

10 Sep, 2020

स्पोर्टस ट्रायल

कहानी | डॉ. रजनी दिसोदिया

“मैडम आ….प किस कॉलेज में हो?” पसीने से लथपथ उस लड़की ने हिन्दी के देहाती अंदाज़ में पूछा। मात्र 1.22 मिनट में दो सौ मीटर की रेस को पूरा कर स्पोर्टस् ट्रायल में नम्बर एक पर आई उस लड़की पर मैडम जी की नज़र भी टिकी थी। वे तभी से उसे बड़ी आत्मीयता से निहार रही थीं। लड़की का ऊँचा लंबा क़द, खिंची तराशी पिंडलियाँ उसके उज्ज्वल भविष्य की ओर इशारा कर रही थीं। उधर मेडम का बेबाक अंदाज़, सुनहरे फ़्रेम का काला चश्मा और पाँच फुट आठ इंच का लम्बा तराशा भव्य व्यक्तित्व उस सामान्य सी दिखने वाली कन्या को अपने विशेष होने की अनुभूति करा रहा था। पर मैडम थी कि उसके इस सवाल को बराबर मुस्कुराकर टाल रही थी। वे चाहती थी कि लड़की उनसे इतनी प्रभावित हो जाए कि ख़ुद ही पता करे कि वे किस कॉलेज में पढ़ाती हैं। 

यह विश्वविद्यालय का स्पोर्टस् ट्रायल है। आज उसका दूसरा दिन था। पिछले कुछ सालों से यूनिवर्सिटी के अधिकारी गणों को ऐसा लग रहा था कि अलग-अलग कॉलेज में ट्रायल के लिए जाना, न केवल विद्यार्थियों के लिए मुसीबत भरा है बल्कि यूनिवर्सिटी के अधिकारियों के लिए भी, हर एक कॉलेज में किसी भी क़िस्म की धाँधली न हो पाए ऐसा सुनिश्चित कर पाना संभव नहीं है इसलिए विश्वविद्यालय ने इस बार पूरे विश्वविद्यालय में स्पोर्टस् कोटे के एडमिशन कराने के लिए सेन्ट्रलाइज़ स्पोर्टस् ट्रायल कराने का निर्णय लिया। यह तय था कि इसमें भाग लेने वाले सभी विद्यार्थियों की उनकी खेल गतिविधि के आधार पर मेरिट लिस्ट बनाकर वेबसाइट पर डाल दी जाएगी, इससे किसी भी तरह की बैकडोर एन्ट्री को रोका जा सकेगा। ऐसा विश्वविद्यालय का मानना है।

मैडम जानती थी कि यह दुबली-पतली साँवली काया चमकता हुआ गोल्ड मेडल है। जिस भी कॉलेज में जाएगी, वहाँ सौ या दो सौ मीटर की दौड़ में तो मेडल पक्का है और क्योंकि नेशनल लेवल पर भी यही टाईम रिकार्ड है तो संभावनाएँ बहुत तलाशी जा सकती थी। यदि उस पर मेहनत की जाए तो वह कॉलेज के लिए उज्ज्वल भविष्य हो सकती है। पर फिर भी वे वहाँ सबके सामने उसे अपने कॉलेज का नाम बताने से झिझक रही थी। यह नियम के ख़िलाफ़ था। यहाँ सब विश्वविद्यालय के नुमायन्दे थे। कॉलेज की बात यहाँ नहीं हो सकती थी। इतनी ईमानदारी अभी उनमें क़ायम थी। यह स्थिति बिल्कुल ऐसी थी कि जिसमें यह पता न लगाया जा सके कि यह ईमानदारीजन्य स्थिति थी या स्थितिजन्य ईमानदारी पर मीतू मलिक ने किसी भी तरह उस लड़की को अपने कॉलेज तक खींच लाने का मन बनाया था। यूनिवर्सिटी की तरफ़ से दिए गए ठण्डे पानी की बोतल को उसने लड़की की ओर बढ़ा कर केवल इतना कहा– ‘वेल डन बच्चा।‘ और अपना पर्स उठाकर चली आई। लड़की पीछे से दूर जाती उस भव्य आत्मीय व्यक्तित्व को देखती रही फिर वह भी उठकर मैदान में खड़े दूसरे साथियों के साथ जा मिली।

उस दिन बेहद उमस भरा दिन था। मारे गर्मी और पसीने के बुरा हाल था। कलेजा मुँह को आ रहा था। ये बेदर्द बादल न जाने कब बरसेंगे? सड़क पर देश-भर के अलग-अलग राज्यों और प्रान्तों से आए बच्चों और उनके अभिभावकों का मेला सा लगा था। एक ऐसा मेला जो दिल्ली विश्वविद्यालय में हर साल इसी समय लगता है। इस मेले में आने वालों के चेहरे ख़ुशी और उत्साह की जगह, उलझन-परेशानी तनाव और आशंकाओं से भरे और तने रहते हैं। उस पर यह मौसम की यह मार। आज के ट्रायल का सारा काम निपटा कर और सारी ज़रूरी काग़ज़ी कार्यवाही पूरी करके मीतू मलिक आकर अपनी गाड़ी में बैठ गई। बाप रे गाड़ी किसी जलते तंदूर सी दहक रही थी। लगभग दस मिनट का समय लगा, इस अहसास को पाने में कि गाड़ी में ए.सी. भी है। इंसान ने प्रकृति पर इतनी तो सफलता पा ही ली है कि उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ वह अपनी जीत दर्ज कर सके। दस पन्द्रह मिनट बाद जब तन और मन को कुछ राहत मिली तो मीतू ने बड़े जतन से अपनी घड़ी की ओर निहारा फिर बुदबुदाई, “अरे ये सुनीता कहाँ रह गई?”

“चल-चल जल्दी कर नहीं तो हमने यहीं कैंम्प की रैड लाईट में ही फँस जाणा है,” इस हालत में भी सुनीता ने जल्दी से गाड़ी में बैठते हुए कहा।

“धीरे मैडम धीरे... घण्टा... पता नहीं ख़ुद कहाँ लगा के आई और जल्दी मुझे चलने को कह रही है,” गाड़ी को पार्किंग में से निकालते हुए मीतू ने कहा।

गाड़ी जब स्टेडियम से बाहर आ चुकी थी। अचानक मीतू के दिमाग़ में कोई खटका सा हुआ और उसने पूछा– “पर तू रह कहाँ गई थी?” सवाल के जवाब में साथ वाली सीट पर लगभग अधलेटी हो चुकी सुनीता ने सिर को ज़रा हल्का-सा झटका दिया और फिर कुछ उँघने सी लगी। मतलब था कुछ ख़ास नहीं बस यूँ ही...। बेचारी चालीस साल की उम्र में सात महीने के गर्भ को उठाए दुबली-पतली प्रौढ़ा कहें या नवयौवना पता नहीं, को थककर पस्त हुए देखकर मीतू का मन आर्द्र हो उठा। उसने आगे कुछ नहीं पूछा। सुनीता को वह पिछले पन्द्रह वर्षों से जानती थी। दोनों ने लगभग आगे-पीछे ही यूनिवर्सिटी में ज्वाइन किया था। दोनों की न जात एक न घर और हैसियत। हरियाणा में वैसे भी ब्राह्मणों और जाटों का कोई मुक़ाबला नहीं। यहाँ ब्राह्मणों के पास न तो ज़मीनें हैं न ही वह रौब-दाब जो प्राय: भारत के अन्य राज्यों में उन्हें प्राप्त है। ज़मीनें जाटों, अहीरों और ठाकुरों के बीच बँटी हैं। ब्राह्मणों को ‘पंडत’ या बहुत हुआ तो ‘पंडत जी’ कह सम्मान बख़्श दिया जाता है। हरियाणवी भाषा में सम्मान अपने बाप को नहीं दिया जाता, ब्राह्मण को अलग से कहाँ से मिलेगा। छोटे-बड़े सभी के लिए ‘तू’ सम्बोधन प्रचलित है। सुनीता भारद्वाज को हरियाणवी समाज में उतना ही संघर्ष करना पड़ा जितना अन्य जातियों की स्त्रियों को करना पड़ता है। यह तो उसकी ज़िद थी या कि उसकी क़िस्मत अच्छी थी वरना दिल्ली जैसे शहर में पढ़ने और नौकरी करने का मौक़ा मिलना आसान नहीं था। परन्तु इसके साथ ही दूसरी समस्या जुड़ी थी इसका एहसास उसे पहले से नहीं था। वह यह कि वह एक के बाद एक उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ती चली जा रही थी पर उसकी शादी की कहीं कोई सुगबुगाहट ही नहीं हो रही थी। नौकरी लगते ही शुरूआती सालों में तो वह इसी खुशफ़हमी में रही कि अब तो उसके माता-पिता कोई ठोस प्रयास करेंगे, पर “इतनी पढ़ी लिखी इतना ऊँचा कमाने वाली लड़कियों के लायक़ बींद (दुल्हा) हमारी जात में कहाँ रखे हैं?” पिता को माँ से यह कहते सुनकर उसे लगा कि वह अहिल्या की तरह पत्थर के खोल में क़ैद कर दी गई है और उसके रोने-चिल्लाने की आवाज़ें तक बाहर नहीं सुनाई देतीं। वह तो यही मीतू थी जो उसके अन्दर की प्रकृति को बोनसाई बनते नहीं देख सकती थी, वह उसके भीतर  अँगड़ाई लेते अरमानों को महसूस करती थी। उसे अक़्सर समझाया करती, “यार तू किसी से भी कर ले, कोई जात-कुजात जो मिले, बस तू ब्याह कर ले।” पर सुनीता थी कि उसका पंडतपना दिल्ली में आकर निरा बाह्मनपना हो गया था। वो ब्राह्मण है उसके ऐसा करने से माँ-बाप के नाम को बट्टा लग जाएगा। “मैं कहती हूँ तू उम्र भर कमाएगी भी और भाई-भाभी की लातें भी खाएगी। बुड्ढी भी हो जाएगी तो भी भाई को यह शक बना रहेगा कि न जाने कब तू उसकी नाक कटवाकर भाग जाए।” वह उसे समझाती और यह सब बेबुनियाद भी नहीं था। धीरे-धीरे वही सब होने भी लगा था। सुनीता अक़्सर बताती कि कैसे पिता ने भाई की शादी करते ही सब ज़मीन-ज़्यादाद अपने बेटे को सौंप दिया। “तेरा तो ब्याह ही नहीं हुआ तुझे क्या करना है?” उम्र में उससे छोटा भाई जिसे नाक पौंछना तक उसने सिखाया। पिता के जाते ही घर का मुखिया बन बैठा। आख़िर तेहरवीं को पगड़ी जो उसके सिर बँधी थी। वह कहाँ जाती है? कहाँ से आ रही है? किसका फोन क्यों आया? जैसे सवाल यूँ बेझिझक पूछ लेता तो सुनीता को अपने पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकने का एहसास होता। “अब रो-रोकर मुझे मत सुना। तेरा ही क़ुसूर है तुम लड़कियाँ अपने दम पर कुछ कर भी नहीं सकती, पता नहीं किसने तुम्हें यहाँ भर्ती कर लिया।” ग़ुस्से में कई बार मीतू पैर पटकने लगती।

 बुरा समय जब बीत जाता है तो वह उतना भी बुरा नहीं रह जाता कि उसे याद भी न किया जा सके। मीतू अतीत के गलियारों में घूम रही थी। अभी दो साल पहले की ही तो बात है जब उत्तराखण्ड कुमाऊँ विश्वविद्यालय ने स्पोर्टस् मीट का आयोजन किया था जिसमें योजनाबद्ध तरीक़े से दोनों अपने अपने कॉलेज की नुमाइन्दगी कर रही थीं। वहीं मि. कौशिक से मीतू की भेंट हुई। चालीस पार का युवा जो पारिवारिक ज़िम्मेवारियों के चलते  इस पड़ाव पर आ पहुँचा था कि शादी के बारे में सोचना छोड़ ही चुका था। बस फिर क्या था मीतू की मेहनत रंग लाई और...। मीतू पूरे रास्ते हिफ़ाज़त से गाड़ी चलाती रही। अब वह सुनीता के लिए दूसरे कारण से चिंतित थी। भाई ने तो तभी सारे संबंध तोड़ लिए थे। ले देकर जो थी अब मीतू ही थी। जो उसका मायका भी थी और ससुराल भी। सात महीने तो ठीक-ठाक निकल गए, अब तो बस थोड़ा ही समय बचा है। उधर सुनीता भी विचारों की उधेड़-बुन में थी। वह जबरन आँख बन्द किए पड़ी थी। और बीच बीच में पूछ लेती थी कि कहाँ तक पहुँचे। 

◘ ◘ ◘

“डोन्ट वरी आईल कीप माई प्रामिस,” कहकर खुराना ने फोन सामने मेज़ पर पटक दिया और सपड़-सपड़ अपना खाना खाने लगा। खाना खाते वक़्त वह इतनी आवाज़ करता था कि उसके साथ बैठकर किसी और के लिए खाना संभव नहीं था।

“साले ने सारा स्वाद बिगाड़ दिया,” उसने बर्तनों को एक ओर खिसकाते हुए कहा। 

“आपने कहना था न कै अभी रोट्टी खा रहा हूँ थोड़ी देर बात फोन कर लेना,” पास बैठी पत्नी ने बर्तन उठाकर ले जाते हुए कहा। 

“सुबह से सात बार फोन कर चुका है– ‘यार ओ कुड़ी पहुँची नहीं अब तक? तू मैनु जबान दित्ती सी।’  जब मैंने एक बार कह दिया कि वो वहीं एडमिशन लेगी जहाँ मैं कहूँगा। पर इस हरामखोर नु चैन नई,” खुराना टी.वी. का रिमोट ढूँढ़ते हुए बड़बड़ाया। 

असल में आज स्पोर्टस् एडमिशन के लिए फ़स्ट काउंसिलिंग का पहला दिन था। सभी को अपने-अपने कॉलेज के लिए बेस्ट प्लेअर्स की तलाश थी। मनचन्दा के यहाँ सभी टीमें बड़ी हल्की थीं। एक दो मेडल विनर खिलाड़ी अगर उसे भी मिल जाते तो वह अपने प्रोमोशन की फ़ाइल आगे बढ़वा सकता था। सौ मीटर, दो सौ मीटर, पाँच सौ मीटर किसी मे भी अगर उसकी क़िस्मत चमक जाती। कॉलेज का प्रिंसिपल भी उससे कह चुका था, “यार मनचन्दा करो कुछ।“ मनचन्दा ने खुराना से सुना था कि उसके स्कूल में ग्यारवीं बाहरवीं में कुछ नई लड़कियाँ भर्ती हुई थीं। ‘क्या भागती हैं यार बिल्कल गोली की तरह’ वह तराश रहा है उन्हें।  उन्हीं में से एक है ज्योति सीमार, यूनिवर्सिटी ट्रायल में पहले रैंक पर रहने वाली। क्या दूसरों की नज़र नहीं होगी उस पर? कहीं कोई और खुराना को ज़्यादा बड़ा ऑफ़र न दे दे। कह तो रहा है कि लड़की वही करेगी जो उसे वह करने को कहेगा। पर... बस यही वज़ह थी कि वह हर दो घंटे में फोन की घन्टी बजा देता था।

एक घने नीम के नीचे उसकी दुकान थी। नीम भी नाले पर बने पुल के ठीक किनारे पर उगा था और अपनी और से भरपूर प्रयास कर रहा था कि वहाँ की धूल और बदबू भरी हवा को कुछ शुद्ध कर सके। जुलाई का मौसम था सो पीली-पीली निबोरियोँ से तिरपाल की छत भरी पड़ी थी जिसे वह एक दो दिनों में झाड़ देता था। गँठाई का काम ठीक-ठाक मिल जाता था युनिवर्सिटी के पास का इलाक़ा होने के कारण लड़कियाँ सैंडिल की रिपेयर के लिए आती ही रहती थीं। इसकी दो वज़ह थीं एक तो नए फैशन के चलते ऐसी सैंडिलें ख़रीदी जाती जो एक रुपया प्रति घण्टा के हिसाब से चलती थीं। दूसरा लड़कियों के लिए एक मुश्त तीन चार हज़ार जूते पर ख़र्च करना अब भी मध्यमवर्ग़ीय परिवारों में समझदारी नहीं कही जाती थी। गँठाई के काम के अलावा वह नए जूते भी बनाता था क्योंकि अपने पीछे पुलिया की दीवार के सहारे तिरपाल पर ही उसने जूतों के कुछ नए जोड़े टाँगे हुए थे। आजकल के चलन के हिसाब से आगे से लम्बोतरे चोंचनुमा जूते, सामान्य ऑफ़िस पहनकर जाने वाले जूते, मर्दों के पहनने वाले सैंडिलों के अनेक डिज़ाइन इत्यादि। ख़ूबसूरत बँटवारा था आदमियों के लिए नए जूते और औरतों के लिए रिपेयर का काम। दुकान के सामने दो तीन प्लास्टिक की मुड्डियाँ रखी थीं जब तक वह जूतों की गँठाई करता ग्राहक वहाँ बैठकर सुस्ता लेता। यूँ वह रोज़ाना अख़बार भी साथ ही ले आता था इस बहाने कोई न कोई जान-पहचान वाला उसके पास बैठा बतियाता रहता। खुराना जब वहाँ आकर खड़ा हुआ तो उसने ‘राम-राम साहब’ वाला अपना सलाम ठोका। अपने पहले के काम में लगे-लगे ही उसने कुछ देर इंतज़ार किया कि ग्राहक ख़ुद ही बताए कि उसे क्या सुधरवाना है।

"रामकिशन सीमार तुम ही हो क्या?”

खुराना ने उससे अपने दम पूरी इज़्ज़त बख़्शते हुए पूछा। रामकिशन के हरकतशुदा हाथ एक दम रुक गए। इस महीने पुलिस का हिस्सा तो वह पहले ही दे चुका है। कोई रिश्तेदार इतना सुथरा है नहीं, बेटी का रिश्ता अभी उसे करना नहीं फिर यह कौन है?... पर चलो छोड़ो किसी ने उसे उसके पूरे नाम से पुकारा तो। यह सब सोचते सोचते उसने उस साहब को ऊपर से नीचे तक ध्यान से देखा। पैंतालीस-पचास के बीच झूलते उस आदमी के बाल अच्छे तराशे कसट काले थे जो उसकी कुछ ढीली पड़ आई चमड़ी से मेल नहीं खा रहे थे। मूछें इतनी घनी थी कि ऊपर का ओंठ पूरा ढक चुकी थीं। चेहरे से किसी राजनैतिक पार्टी का छुटभैय्या नेता लग रहा था। ‘नहीं इस आदमी को उसने पहले कभी नहीं देखा।‘ उसने मन ही मन कहा। पर इससे क्या होता है, रामकिशन सीमार तो उसी का नाम था। 

“हाँ साहब मैं ही हूँ रामकिसन सिमार, बोलो आपनै क्या काम है?” 

वह जाति से चमार और पेशे से मोची था। अपने आपको किसी से कम आँकना उसने नहीं सीखा था। ये तो बुरा हो इन जूते बनाने वाली कंपनियों का नहीं तो उसका बस चलता तो वह अपनी दुकान के सामने जूतों के लिए लोगों की लाईन लगवा देता। अब तो सिर्फ़ गाँठने का काम ही ज़्यादा मिलता था। हालाँकि अपनी दुकान पर नए बने जूतों को सजाए वह अपने आप को किसी बड़े कलाकार से कम न समझता था। 

“तुम्हारी... मेरा मतलब है... आपकी ही बेटी का नाम ज्योति सीमार है ना?” 

“के होया ज्यो..” वह एकाएक उठकर भागने को हुआ। 

“ज्योति को कुछ नहीं हुआ,” खुराना ने एक बाप की बदहवासी को समझते हुए कहा। 

“मैं तो उसके कॉलेज में एडमिशन के सिलसिले में मिलने आया था।” 

रामकिशन के चेहरे का रंग जो अभी अचानक से उड़ गया था वह वापस लौट आया उसने पास रखे अंगोछे से अपना मुँह पोंछा और अपनी त्वरित भावुकता पर वह थोड़ा सा सकुचाया फिर उसने लपककर सामने रखे मुड्डे पर पड़ी धूल को ज़ोर से झाड़ा। 

“खड़े क्यों हो साहब बैठ जाओ। रै बिरमू दो कप चा ल्या,“ वह सड़क के दूसरी ओर खड़े एक दस बारह साल के लड़के की ओर चिल्लाया। 

अब तक वह पूरे आपे में आ चुका था। उसे इतना तो पता था कि उसकी यह बेटी ज़रूर उसका नाम रोशन करेगी। वह उसको बहुत पढ़ाएगा, जब तक वह पढ़ना चाहेगी। पर उसे तो बस दौड़ने का ही सोक है। ’अब बताओ दौड़-दौड़ कर भी कोई बड़ा आदमी बना है आजतक।’ वह अक्सर सोचा करता था। 

“सच में साहब...? म्हारे गाम के ठाकर कहा करते थारे बालकां नै तो सरकार घँरा सै बुलाये कै एडमिशन दिया करै। आज तो या बात साची हो गई,” रामकिशन ने ख़ुशी में रीझकर कहा। खुराना ने हीं-हीं करके मुँह बिचकाया और मुस्करा दिया।

“ओर नहीं तो ... मैंने ज्योति को जिस कॉलेज में एडमिशन लेने भेजा वो वहाँ पँहुची ही नहीं। ...अब बताओ सरकार कितना इंतज़ार करेगी,” खुराना को अपनी बात शुरू करने का ख़ूब मौक़ा मिल गया। 

वह खड़ा-खड़ा थक गया था सो मन मारकर सामने पड़ी मुड्डी पर बैठ ही गया। अगर उसका जूता फट गया होता तो भी तो वह यहाँ बैठता, पर पता नहीं तबके बैठने और अबके बैठने में उसे भारी अन्तर महसूस हो रहा था। बिरमू दो छोटे लरजते डिसपोसल कपों में चाय लेकर आ पहुँचा। जैसे ही उस चाय के कप को बड़ी फ़ुर्ती से पकड़कर रामकिशन ने खुराना की ओर बढ़ाया तो उसके भीतर सब कुछ डोल गया। लगा भीतर कोई सुनामी उठ खड़ी हुई पर इससे पहले कि वह सुनामी अपना असर बाहर भी दिखा पाती, खुराना को मनचन्दा का काम याद आया और मनचन्दा के ज़रिए होने वाला अपना काम; फिर उसे न वहाँ बैठना अखरा न वह चाय। 

“बहुत बढ़िया कॉलेज में भेज रहा हूँ ज्योति को उससे कहो कि कल ही जाकर एडमिशन ले ले,” उसने चाय की ख़ूब रसभरी चुस्की लेकर कहा। 

“अब आप कह रहे हो तो ठीक ही कह रये होगे साहब... पर...” उसकी नज़र उन लड़कियों पर पड़ी जिनमें से एक अपने पाँव को ज़मीन पर घसीट कर चल रही थी और रोज़ के अभ्यास से उसे पता चल चुका था कि उसकी सैंडिल टूटी है। उसने तुरन्त अपने पास सुधरवाने के लिए पड़ी एक चप्पल उठाई और उस पर काम करने लगा। वह आते गाहक को यह नहीं जताना चाहता था कि वह ख़ाली बैठकर बतिया रहा है। ज़रा देर के विराम के बात उसने अपनी छोड़ी हुए बात की पूँछ को फिर पकड़ा जैसे वह तो उसके हाथ में ही थी। कहीं खोई थोड़े ही न थी। 

“...ज्योति कह रही थी कि आपनै जो कॉलिज बताया वो भोत दूर है।... चप्पल की पुरानी फटी बची सिलाई को उधेड़ते हुए उसने कहा। “....वो आज नजदीक के कॉलिज मैं पता करण गई है। किराया के पीसे बचैगें और सुब्बेरे सुब्बेरे का भागना नी पड़ैगा।” 

खुराना का माथा ठनका।

इसी कॉलेज की मीतू मलिक भी तो ट्रायल कैंप में थी... ओह नो... अगर उसने ज्योति को फँसा लिया तो...। 

“आप एक बार ज्योति से कहो कि मुझसे आकर मिल ले।” 

वह कुछ परेशान सा हो गया था चाय ख़त्म हो चुकी थी और उसकी बात भी, इसलिए वह उठ खड़ा हुआ। चलते-चलते उसने मीतू का नम्बर डॉयल कर दिया। 

“होर भई मीतू मेडम की गल है?” ...रामकिशन कुछ दूर तक जाते खुराना को देखता रहा फिर सिर को झटका देकर अपने काम में लग गया। 

अब वे लड़कियाँ उन मुड्डियों पर बैठी अपने अपने-अपने  कॉलेज के क़िस्से सुना रही थीं। रामकिशन के कान उनकी बातों पर लग गए। क्या पता उसकी बेटी का एडमिशन इन्हीं में से किसी के कॉलेज में हो जाए।

“अरे डूटा (दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन) का क्या है वो तो हर बार यही कहती है कि उन्हें ही रखो जो पहले से काम कर रहे हैं। पर अगर आपका रोस्टर ही बदल जाए तो...” मीतू हड़बड़ी में विभाग में घुसी। फोन उसके कान पर सटा था।

“क्या हुआ कुछ पता चला?” सुरेखा त्यागी बोली। मीतू ने इशारे से कहा कि अभी बताती हूँ।

गर्दन टेढ़ी कर वह फोन पर थी जिस पर अभी भी बात चल रही थी और उसके हाथ भी। कैंटीन से मँगवाई थालियों से ट्रांसपेरेन्ट पेपर को हटा कर वह सबके सामने थाली रखती जा रही थी। और लोग भी सबकुछ भूलकर खाने पर कंसनट्रेट करने लगे थे। पर उसे लगातार फोन पर लगे देख कर नोबिता मंडल ने पूछा।

“कौन है?” 

“सुनीता...” मीतू ने आवाज़ नीची कर आँख के इशारे से नोबिता का कुछ समझाया।

नोबिता जानती है कि सुनीता का हसबैंड पिछले कई बार से यहाँ इंटरव्यू के लिए आ रहा है। मीतू हर बार कोशिश करती है कि किसी तरह उसे रख लिया जाए। यूनिवर्सिटी ने परमानेन्ट अपाइंटमेन्ट पर तो रोक लगाई ही हुई है कम से कम उसे एड-हॉक ही मिल जाए। बेचारा सुनीता के लिए स्टेट गोरमेन्ट की अपनी पक्की नौकरी छोड़ कर आया है। पर दिक़्क़त यह है कि हर बार उसके विभाग की पोस्ट किसी न किसी रिज़र्व कैटेगरी को चली जाती है। सुनीता को भी मीतू से बहुत आशा है। आख़िर और उसका है भी कौन। लगता भी है आज काम बन जाएगा। इस बार सीट यू. आर. थी।

“यार जल्दी करो, घर भी जाना है, साला साल में दो-दो बार इंटरव्यू कराओ, खामख़्वाह की मशक़्क़त... कोई बात है,” उनमें से कोई तिलमिलाया। 

खाना ख़त्म हो चुका था। एक बार फिर लोग सक्रिय हुए। जुलाई की गर्मी में भले ही ठण्डे ए.सी. रूम में बैठे सबकी आत्मा परितृप्त सी दिखाई दे रही थी। पर निकलना तो सभी को उसी चिकट गर्मी में था जिसके बारे में सोच-सोच कर सभी को पसीने छूट रहे थे। 

“हाँ- हाँ पैनल बना लेते हैं,“ मीतू ने फोन रख दिया। इससे पहले की कोई इधर-उधर हो जाए। वह सबके साईन करवा ले। इस बार मि. कौशिक का काम होना ही चाहिए।

“फर्स्ट मि. कौशिक को रख लें इस बार...,” कहकर उसने चारों की ओर देखा।

“सच अ नाइस गाए, वी केन ट्राई हिम दिस टाईम.. ,“ कहकर मिसेज त्यागी ने रास्ता साफ़ किया। 

उन्हें बहुत दूर जाना था। पहले ही ढाई बज चुके थे। उसे ज़्यादा चिकचिक पसंद नहीं। मीतू की उससे पहले ही बात हो चुकी थी।

“पोस्ट अगर यू.आर. है तो रख सकते हैं...” 

कहकर नोबिता ने भी अपनी सहमति दे दी। 

उसकी सहमति काफ़ी मायने रखती थी। आख़िर वही तो रिज़र्व ओबज़र्वर थी। वह जानती थी कि किसी यू.आर. सीट पर किसी रिज़र्व के बंदे को रखना तो यहाँ संभव नहीं इसलिए उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कोई कौशिक आए या गुप्ता। 

“बट देयर इज़ इमैंस प्रैशर फ़्रॉम डूटा यू नो,“ ये मिसेज रंगराजन थी जो प्रिंसिपल नोमिनी थीं। 

“प्लीस कंसीडर योर प्रिवियस एड-हॉक। इट इस अ मेटर ऑफ़ देयर समर सेलेरी आल्सो।”

इस समय कॉलेज की ही स्वाति मजूमदार डूटा प्रेसिडेन्ट थी। कम से कम उनके कॉलेज में तो डूटा की अपील अप्लाई होनी चाहिए। बाहर कौन सुनता है कि जी रोस्टर बदल गया था और फिर... 

“पर हमारे पास जो पढ़ा रहा है वो तो रिज़र्व कैटेगरी से है। उसे कैसे यू.आर. पोस्ट पर रख सकते हैं।“

मीतू ने दोनों हाथ मेज़ पर रखते हुए कहा। उसके न चाहते हुए भी हाथों और मेज़ के बीच से हल्की आवाज़ पैदा हुई। पेन हाथ से छूटकर नीचे जा गिरा। उसने झुक कर पेन को उठा लिया, चला कर देखा चल रहा था। यह पेन उसे सुनीता ने दिया था।

“डूटा प्रेज़िडेन्ट हमारे ही कॉलेज से हैं तो..क्या... जेनरल सीट पर तो जेनरल कैन्डीडेट ही आएगा,“ मिसेज़ त्यागी बोलीं। 

रंगराजन ने एक बार फिर से कुछ कहने को मुँह खोला ही था कि बाहर कुछ तेज़-तेज़ आवाज़ों ने सबका ध्यान खींचा। कॉलेज चपरासी किसी से कह रहा था, "पहले मीतू मेडम से पूछ लो मैं कुछ नहीं कर सकता" मीतू ने सोचा कोई केण्डिडेट तो नहीं जो लेट हो गया है, वही चपरासी से बहस कर रहा है। पर अब कोई टाईम थोड़े ही बचा है। बाहर हलचल बनी रही, लगता है कोई ढीठ ही है। मीतू को उठकर बाहर की ओर जाना ही पड़ा। साथ में नोबिता भी उठी। देखे तो क्या माज़रा है।

“सर मेरा फ़ार्म वापस कर दो। मुझे यहाँ एडमिशन नहीं लेना।“ 

एक लंबी पतली लड़की पसीने से लथपथ ज़िद पर अड़ी हुई थी। कहाँ तो बच्चों को इतने बड़े नामी कॉलेज में एडमिशन नहीं मिलता और यह बेवकूफ़ लड़की। कर्मचारी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। मेडम से पूछे बिना वह एडमिशन फ़ार्म वापस नहीं कर सकता था।

“पहले मीतू मलिक से बात कर लो तभी पेपर वापस मिलेंगे,“ कर्मचारी का रटा-रटाया सा जवाब दिये जा रहा था। अपना नाम सुनकर ही मीतू उठकर बाहर आई थी।

“अरे तुम अभी तक यहीं हो.. एडमिशन नहीं लिया अब तक..” मीतू ने देखा यह तो ज्योति ही थी।

“मैडम मुझे यहाँ एडमिशन नहीं लेना,“ ...उसने झिझकते हुए कहा।

इससे पहले की लड़की कुछ कह पाती मीतू ने उसकी बात काटते हुए कहा। 

“देखो ज्योति क़िस्मत सबको एक बार मौक़ा ज़रूर देती है। ...कॉलेज में तो तुम्हें नया कोच मिल ही जाएगा। उसके चक्कर में अपना फ़्यूचर मत बिगाड़ो। जाओ पहले एडमिशन ले लो फिर मुझसे मिलना।“ 

मीतू को मनचन्दा पर बड़ा ग़ुस्सा आ रहा था। यहाँ इतने लोग न बैठे होते तो वह अभी एक भारी भरकम गाली उसके नाम कर देती।

“मेडम सही कह रही हैं बच्चा... इस कॉलेज से तुम्हारी क़िस्मत बदल जाएगी,“ नोबिता ने भी लड़की को समझाने की कोशिश की। 

“रहती कहाँ हो?” उसने पूछा।

“अरे यहीं पड़ौस में ही तो रहती है। आने जाने का कोई ख़र्चा नहीं।“

मीतू ने लड़की की पूरी हिस्ट्री पता कर रखी थी। लड़की अभी भी असमंजस सी में खड़ी थी। जैसे उसके दिमाग़ में कुछ नहीं जा रहा था। वह किसी तरह यहाँ से पीछा छुड़ाना चाहती थी। जैसे उसे मना किया गया था कि वहाँ किसी की मत सुनना बस अपने फ़ार्म वापस लेना और चली आना। मीतू उसके ढीठपने पर खीजने लगी थी। 

“क्या सोच रही हो? फ़ीस-वीस की दिक़्क़त तो नहीं?” नोबिता उसके कुछ ओर क़रीब आई और धीमी आवाज़ में पूछा। 

“फ़ीस तो वहाँ भी माफ़ हो रही है। वहाँ की मैडम ने कहा है कि यहाँ मैं नहीं चल पाऊँगी। यहाँ सारे पेपर अंग्रेज़ी मीडियम में देने पड़ेंगे,“ आख़िरकार लड़की बोली। जैसे बहुत देर से दिल पर कोई बोझ लिए खड़ी थी। जैसे यह बहुत शर्म की बात थी जिसे बताना उसके लिए बहुत मुश्किल हुआ जा रहा था।

“किस मैडम ने तुझे ये सब समझाया है ज़रा बता तो...“ सुन्दरी बाई कॉलेज में तो मनचन्दा ही सारा काम देखता है। किसने इस बेचारी लड़की को बहकाया है।

“वो एस.पी.एम कॉलेज की मेडम हैं... नाम बताने को मना किया है,“ कहकर मासूम लड़की दूसरी ओर देखने लगी जैसे उसके आँखों में से मीतू उस मेडम का नाम पढ़ लेगी। उसे क्या पता मीतू के लिए कॉलेज के नाम से ही सब साफ़ हो जाता है। 

“हँ..हँ..हँ...” मीतू के गले से घुटी हुई आवाज़ निकली। 

उसने झटके से चपरासी के सामने पड़ी फ़ाईल उठाई। हड़बड़ी में उसके हाथ का पेन एक बार फिर से नीचे गिर पड़ा जिसे उसने पड़ा ही रहने दिया। चपरासी ने मैडम का पेन उठाकर स्टूल पर रख दिया। मीतू ने ज्योति का फ़ार्म निकाला और उसके हाथ में थमा दिया। वह वापस मुड़ कर कमरे में दाख़िल हो गई। नोबिता अभी बाहर ही खड़ी थी। वह मीतू के लिए बहुत दुखी थी। वह जानती थी कि ज्योति को अपने यहाँ लाने की मीतू ने बहुत कोशिश की थी। वह उसकी फ़ीस भरने को भी तैयार थी। इससे पहले कि अपना पालिथीन सँभालती ज्योति उसकी नज़रों से ओझल हो जाए, “एक बार मैं समझाऊँ इसे..” नोबिता ने मीतू से पूछा।

“नहीं छोड़ उसे, सुनीता के पास ही तो जा रही है,“ मीतू ने जवाब दिया। 

अब नोबिता क्या कहती वह भी वापस कमरे में आ गई। 

“पर तुम तो कह रही थी कि इस लड़की के पीछे मनचन्दा पड़ा हुआ है?”

“हैं..हँ... हैंहँ..“ करती हुई अजीब सी हँसी मीतू के गले से फिर निकली पर उसने पलटकर नोबिता की ओर नहीं देखा। 

“और कितनी देर बैठा कर रखना है यार,” त्यागी जो इस बीच किसी फोन पर लगी थी ने मीतू के बैठने के बाद कहा। 

“येस-येस आई डू,” मीतू ने अपनी फ़ाईल उठाई। 

वह पेन तलाशने लगी। उसने अपना पर्स खंगाल डाला पर कोई पेन न मिला। नोबिता ने उसके पीछे से अपना पेन आगे बढ़ा दिया। मीतू ने पेन पकड़ लिया और एक बार मिसेज़ रंगराजन की ओर देखा। नोबिता ने देखा कि लिस्ट में पहला नाम संदीप रांगेय का ही उभर रहा है। यही तो डिपार्टमेन्ट में पहले से एड-हॉक पढ़ा रहा था। मि. कौशिक का नाम दूसरे नं पर आया। बाक़ी के नामों में किसी का कोई इन्टेरेस्ट नहीं था। सबको जाने की जल्दी थी। यथास्थान अपने-अपने साईन कर सब निकल पड़े। नोबिता ने भी अपना बैग उठाया।

“तुम अभी रुकोगी?” 

“हुँ... थोड़ा थक गई हूँ कुछ देर में निकलती हूँ, थैंक्स यार,” कहकर मीतू नोबिता को छोड़ने कमरे के बाहर तक आई। 

स्टूल पर उसका पेन पड़ा था। जाते-जाते नोबिता ने कहा ‘तुम्हारा पेन।‘ मीतू ने पेन की ओर देखा और वापस कमरे में आकर बंद हो गई। थोड़ी देर के लिए सबकुछ शान्त हो गया। सबकुछ...। मीतू आँख मूँदे बैठी रही। वक़्त ठहर सा गया था। इस ठहरे हुए समय के बीच मीतू भी ठहर गई। चार बज रहे थे। बाहर भी लोगों की सारी हलचल ख़त्म हो चुकी थी। कमरे में ए.सी. के बावजूद दूर गाड़ियों की आवाज़ें आ रही थी। बीच-बीच में खसर-खसर किसी के पैर घसीट कर चलने की आवाज़ भी आ जाती थी। बाहर हवा में नमी इतनी बढ़ गई थी कि उसके बोझ से वह भारी हो गई थी। उससे टस से मस न हुआ जाता था। मीतू भीतर बैठी-बैठी बाहर की हवा का यह हाल जानती थी जैसे बाहर की यह हवा उसके भीतर भी उतर गई थी और हिलने का नाम नहीं ले रही थी। उसकी उठकर चलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। उसके पर्स में फोन वाइब्रेट होने लगा। देखा सुनीता का फोन था उसने फोन नहीं उठाया। वह देर तक रुक-रुक कर वाईब्रेट होता रहा। उसकी वाईब्रेशन मीतू के पूरे शरीर को झनझनाती रही पर मीतू ने फोन नहीं ही उठाया। फोन अब शान्त पड़ गया और एक बार फिर कमरे में शान्ति पसर गई। आख़िर वह कब तक बैठती। साढ़े पाँच बजने को थे। केयरटेकर दूर से सारे रूम लॉक करता आ रहा था। पहले खिड़कियाँ बंद होतीं फिर दरवाज़ा बंद करने की आवाज़ आती और अन्त में ताला लगाने की आवाज़। इन आवाज़ों को मीतू बख़ूबी पहचानती है। आवाज़ें क्रमश: तेज़ हो रही थीं। बस अब उसके कमरे की बारी आने ही वाली है। वह किसी तरह उठी पेपर सँभाले, फ़ाईलें उठाकर दराज में डालीं। अपने दोनों बैग उठाए। निकलने से पहले फोन को वाईब्रेशन से हटाने के लिए निकाला। सुनीता के पाँच मिस्ड काल थे। पर एक मेसेज मि. कौशिक का भी था जो शायद अभी डिलिवर हुआ था।

‘वी आर इन हॉस्पिटल, शी इज़ इन ओ. टी. देयर इस प्रिमेच्योर डिलिवरी एज़ डॉक्टर्स सेड’ इतने में केयरटेकर मीतू के कमरे के बाहर तक आ पँहुचा था। उसके हाथ में बहुत सारी चाबियाँ बज रही थीं।

“मैडम जी अबई बैठेंगी क्या?” उसने दरवाज़ा खोलकर भीतर गर्दन घुसाई। 

मीतू को जैसे होश आया। ‘अरे नहीं भाई’ उसने झपटकर अपना सामान उठाया और तेज़ क़दमों से बाहर निकल पड़ी। मौसम कुछ नरम पड़ गया था। उसे जल्द से जल्द हॉस्पिटल पहुँचना होगा। अचानक कुछ याद आया भागती हुई सी पीछे मुड़ी और स्टूल पर रखे पेन को झटके से उठाकर अपने बैग में डाल लिया।

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