विशेषांक: दलित साहित्य

10 Sep, 2020

शम्बूक अट्टहास कर रहा है

कविता | डॉ. रजनी दिसोदिया

“शम्बूक मारा गया।
उसकी हत्या हो गई।
अपने समय की सर्वोच्च सत्ता से
वो टकरा गया था।“
अख़बार वाला सड़कों पर
ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला चिल्लाकर
अख़बार बेच रहा था।
सहमी हुई आँखें,
उफनती हुई साँसें,
मुस्कुराते होंठ
और फुसफुसाती आवाज़ें
विभिन्न दिशाओं से आकर
उन अख़बारों पर टूट पड़ी थीं।
शम्बूक कब गया सर्वोच्च सत्ता को चुनौती देने?
वह तो गया था...
कार्ल सगान सा विज्ञान लेखक बनने।
प्रकृति, सागर, धरती और आकाश से
प्रेम करने,
पता नहीं कब वह सागर की गहराई
और आकाश की ऊँचाई नापता धरती पर आ पहुँचा
और...
और फिर उसे इंसानों से प्रेम हो गया।
“इंसानों से प्रेम करना कोई अपराध तो नहीं।”
उफनती हुई साँसों ने हवा में मुट्ठी हिलाते हुए कहा।
 
इंसान होकर इंसान से प्रेम करना,
यह गुनाह ही तो है।
केवल भगवान होकर ही इंसानों से प्रेम किया जा सकता है
उनपर दया की जा सकती है
उनका उद्धार किया जा सकता हैं।
उन्हें मुक्ति दी जा सकती है।
यह सब जान तो लिया था उसने भी
पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी
बाहमन का बेटा मर चुका था
ऐसी अफ़वाह फैल चुकी थी।
“यह अफ़वाह थी.,
किसी का कोई बेटा नहीं मरा था।“
सहमी हुई आँखों ने हिम्मत करके कहा।
‘तुम भी न,
कभी कोई बात तुम्हारे पल्ले ही नहीं पड़ती।
सारी बातें अभिधा में नहीं कही जातीं
कुछ की व्यंजना है अभी बाक़ी।
बाहमन का बेटा उसका भविष्य है।
उसका भविष्य ख़तरे में है,
उसका भविष्य मर रहा है
उसका भविष्य बचाओ-बचाओ की मुद्रा में
भाग रहा है।
वह गुपचुप जा पहुँचा है
राम के दरबार में
‘क्या इसी दिन के लिए
हमने रामराज्य का सपना देखा था
वह राम को ललकार रहा है।
आख़िर यही तो तय हुआ था
हम तुम्हारा मन्दिर बनवाएँगे
और तुम हमारा भविष्य बचाओगे
तो फिर उठो
काट डालो तप करते शम्बूक का सर
भूमि पर लुंठित उसका सर ही
हमारा भविष्य है।
अख़बार चिन्दी-चिन्दी होकर
सारे आकाश में फैल गया था।
उसमें छपे अक्षर
पूरे देश पर बेमौसम ओलों की तरह बरस रहे थे।
अख़बार वाला लड़का
सर्द हवाओं में तिनके सा काँपता
उन अक्षरों को बटोर रहा था।
वह घरों, दफ़्तरों और गलियों की दीवारों पर
उन अक्षरों को चिपका रहा था।
अन्दर का सच बाहर आ रहा था।
‘मेरा अपराध क्या है?’
शम्बूक ने पूछा था।
तुम दलित हो, पैदायशी दलित,
तुम प्रतिभावान हो जन्म से ही,
तुम मुखर हो, तुम वाचाल हो,
तुम तर्क करना जानते हो,
अपना काम छोड़कर
धरती और आकाश नापते फिरते हो।
कहाँ-कहाँ तक रोकूँ तुम्हें
तुम सुनते कहाँ हो?
तुम इंसानों से प्रेम करते हो,
मलेच्छ-दानव सब इंसान हैं तुम्हारे लिए
कहते-कहते राम की तलवार उठी
और शम्बूक के रक्त से नहा गई।
पर यह क्या?
शम्बूक तो रक्तबीज है।
जहाँ-जहाँ गिरता है उसका रक्त
वहाँ-वहाँ फिर एक शम्बूक पैदा हो जाता है।
हैरान परेशान है बाहमन
अपने डगमगाते डगों से
शम्बूक के रक्त से रंजित भूमि को
ढक रहा है दौड़-दौड़ कर
पर बेचारा 
आख़िर अपने दो ही पैरों से
कैसे ढक सकता है
उस धरा को 
जहाँ शम्बूक की फ़सल लहलहा रही है।
शम्बूक अट्टहास कर रहा है।

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