विशेषांक: दलित साहित्य

10 Sep, 2020

समकालीन दलित कविता

साहित्यिक आलेख | रेखा पी. मेनोन

आजकल देश की सभी भाषाओं में दलित साहित्य लिखा जा रहा है। हिंदी में भी गंभीर दलित साहित्य लेखन हो रहा है। हिंदी में दलित साहित्य एक प्रकार का विरोध, आक्रोश और क्रोध का साहित्य है। इस में समाज से बहिष्कृत किये जाने का, समाज के द्वारा पीड़ित हो जाने का ज़िक्र है। सवर्ण समाज के द्वारा सदियों से उन्हें हाशिये पर रखे जाने के बाद दलित उस रूढ़ बंधन से निकलने की कोशिश में हैं। उस संघर्ष से हम दलित साहित्य में रूबरू होते है। उस संघर्ष में समानता, समरसता और सामाजिकता का आग्रह दिखाई देता है। कविता की विधा में भी गंभीर लेखन हो रहा है। दलित के शोषण के दो मुख्य कारण है; ग़रीबी और अशिक्षा। हीरा डोम अपनी कविता ’अछूत की शिकायत’ में भगवान से शिकायत करते हैं कि आप प्रहलाद, गजराज, विभीषण और द्रौपदी की रक्षा में तत्परता दिखाते है; हम ने ऐसा क्या अपराध किया है कि हमारी विनती तनिक नहीं सुनते हो?

"हम ने के राति दिन दुखवा भोगत बानी
हमनी के सहेब से मिली सुनाइबि, 
हमनी के दुख भगवनओं ने देख ताजे, 
हमनी के कबले कलेसवा उझाइबि।" (मोहनदास नैमिशराय: ब्यान, अक्तूबर 2009, पृ. 09)

हीरा डोम की इस कविता के समाजशास्त्र पर विचार करें तो हमारा हिंदी भाषी समाज नंगा हो जाता है। जिन दिनों हीरा डोम की कविता आई थी उन दिनों कोई व्यापक दलित आंदोलन नहीं था। उपनिवेशवाद और सामंतवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई चल रही थी। यह लड़ाई लड़नेवाले कुछ महत्वपूर्ण समाज सुधारक अपने-अपने स्तर पर इस बुराई से भी लड़ रहे थे लेकिन उनका विरोध करने वाले भी समाज में मौजूद थे। जिनपर गुज़रती है वही इसका दर्द पहचान सकते हैं। ज्योतिबा फुले ने दर्द के अहसास को दर्शाते हुए कहा था कि "राख ही जानती है जलने का दर्द"। जिसकी यथार्थ अभिव्यक्ति कवि नारायण सुर्वे की प्रस्तुत कविता में देख सकते है -

"जो कभी /भूखा न रहा
वह क्या जाने
ऐंठती आँतों का दर्द।" (दलित साहित्य, वार्षिकी 2004, पृष्ठ-189)

ग़ुलामी की अनुभूति में जो तनाव है उसी ने डॉ. अम्बेडकर को आंदोलित किया था। अनुभूति के इस तनाव को हीरा डोम की कविता में देख सकते है। दुख और ईश्वर के अस्वीकार की ऐसी अभिव्यक्ति हिंदी कविता में दुर्लभ है। एक दलित को लगता है कि ईश्वर भी दलित की नहीं सुनता। हीरा डोम इस कविता के माध्यम से अपना प्रतिशोध दर्ज करते है। 

अदम गोंडवी की यह पंक्तियाँ देखिए :

"आइए महसूस करिए ज़िंदगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको।"
 
कितनी मर्मस्पर्शी और प्रासंगिक पंक्तियाँ हैं! लेकिन इस ज़िंदगी का ताप वहाँ रहकर ही पता लग पाता है।

साहित्य संवेदना का क्षेत्र है। पंतजी की पंक्तियाँ "वियोगी होगा पहला कवि, आह से निकला होगा गान" संवेदना की ओर संकेत करती हैं। कविता आह या दर्द से निकलती है। दर्द की अनुभूति जितनी गहरी और तीव्र होगी उतनी ही अच्छी या उत्कृष्ट होगी। दलित कविता के संदर्भ में यह तो बिलकुल सच लगता है। दलित कविता में दर्द की अभिव्यक्ति प्रमुख है। दलित कविता में कवि की संवेदना पाठक की संवेदना बनती है।

डॉ. वीरेंद्र सिंह यादव अपने लेख ’दलित विमर्श के अंतर्द्वंद्व एवं सामाजिक सरोकार’ में लिखते हैं कि ’इक्कीसवीं सदी की शैशवावस्था में जब साहित्य के कुलीन साधक यथार्थ की दुनिया से पलायन कर उत्तर आधुनिकता का घोंसला गढ़ रहे हैं, वहीं वर्तमान का दलित साहित्य मनुष्यता के लिए संघर्ष कर रहा है। परिवर्तन पहले समाज में आता है फिर साहित्य में। जातियों के बीच सत्ता का निरंतर संघर्ष चलता रहता है। समकालीन दलित लेखन व्यापक परिवर्तनकारी उद्देश्यों को लेकर चल रहा है। वह समाज में सकारात्मक परिवर्तन करना चाहता है।’

समकालीन दलित काव्य परंपरा के अंतर्गत अनेक कवियों ने अपनी रचना से दलित कविता साहित्य को समृद्ध किया है। इन रचनाकारों की कविताओं में युगीन सरोकारों का निरूपण मिलता है। दलित कविता जाति विशेष से उठकर अपने सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति करती नज़र आती है। विगत पैंतीस-चालीस वर्षों में दलित रचनाकारों की जो पीढ़ी तैयार हुई है वह अपने समाज के दर्द और अनुभव का इतिहास रच रही है। भारत की सभी भाषाओं में दलित जीवन का एक ही इतिहास है। पीड़ा का दंश एक सा है, वैचारिक ज़मीन एक है, परिप्रेक्ष्य एक है। बस भाषा का तेवर भिन्न है। सभी का प्रेरणा स्रोत डॉ. अम्बेडकर ही हैं। दलित कविता अपनी यातनाओं के अतीत के साथ अपने समसामयिक जीवन और परिवेश के साथ गहराई के साथ जुड़ी हुई है जिससे उसकी प्रासंगिकता बनी हुई है। हिंदी दलित कविता का आंदोलन चेतना के स्तर पर बहुत गहराई से जुड़ा है, जिसकी जड़ में सदियों का अन्याय, अत्याचार और शोषण का इतिहास है। इसलिए हिंदी की दलित कविता समय के दौर में दलित आंदोलन को स्थायित्व प्रदान करनेवाली कविता है। वह वर्ण-व्यवस्था के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक वर्चस्व के ख़िलाफ़ प्रतिरोधात्मकता का अपना नया मोर्चा निर्मित करती है। यह सदियों की यातना है जो आक्रोश एवं विद्रोह के रूप में फूट रही है। 

"मेरी पीढ़ी ने अपने सीने पर 
खोद दिया है संघर्ष 
जहाँ आँसुओं का सैलाब नहीं 
विद्रोह की चिंगारी फ़ूटेगी
जलती झोपड़ी से उठते धुएं में
तनी मुट्ठियाँ
तुम्हारे तहखानों में
नया इतिहास रचेंगी।" (सदियों का संताप -ओमप्रकाश वाल्मीकि)

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता "घृणा तुम्हें मार सकती है" जहाँ दलित समाज के प्रति सदियों से अपनाये गये घृणित रवैये को बेपर्दा करती है। अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के कारण अलगाव और अनजानेपन के दंश के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक शोषण और शारीरिक-मानसिक उत्पीडन की मार ने दलितों की निरंतर और इतनी कमर तोडी है कि वे मनुष्य होने का अहसास तक नहीं कर पाते हैं। आजीविका से लेकर अपनी प्रत्येक ज़रूरत के लिए उसे दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता ’ठाकुर का कुआँ’ में दलित की इस त्रासदी का चित्रण मिलता है-

"चूल्हा मिट्टी का /मिट्टी तालाब की /तालाब ठाकुर का।
भूख रोटी की /रोटी बाजरे की /बाजरा खेत का /खेत ठाकुर का।
बैल ठाकुर के / हल ठाकुर का /हल की मूठ पर हथेली अपनी।
फ़सल ठाकुर की /कुआँ ठाकुर का/ खेत-खलिहान ठाकुर के।
गली-मुहल्ले ठाकुर के/फिर अपना क्या?/गाँव /देश?..." (ओमप्रकाश वाल्मीकि, सदियों का संताप, पृष्ठ -3)

डॉ. मोहनदास नैमिशराय की कविता साम्प्रदायिकता पर चोट करती है। धर्म के नाम पर आपस में लड़नेवाले अपने देशवासियों के प्रति वे चिंतित हैं। वे कह उठते हैं कि -
"चर्च से मरघट तक/ मंदिर से गुरुद्वारों तक\ संसद से सड़क तक
खेतों से क्लब तक/ लोगों पर जुनून/ क्यों है यह सवार
दंगे क्यों होते हैं बार-बार...?"(दलित निर्वाचित कविताएँ, संपादन डॉ. कँवल भारती, इतिहास बोध प्रकाशन, इलाहाबाद, 2006, पृष्ठ 116)

इनकी कविताओं में दलित जीवन की आह-कराह के साथ-साथ उनका राष्ट्रीय एवं सामाजिक चिंतन भी स्पष्ट रूप से चित्रित हुआ है।’सच यही है’ साम्प्रदायिकता की समस्या को लेकर लिखी गयी इनकी एक महत्वपूर्ण कविता है। साम्प्रदायिकता समाज में फैले एक भयावह रोग है। दलित कवि इसको कैसे देखता है, इस संदर्भ में भी यह कविता बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह कविता बताती है कि ऐसे कामों से किसी को कुछ नहीं मिलता बल्कि वंचितों की एकता की संभावना भी ख़तम हो जाती है और मुक्ति का बृहद सपना भी खंड-खंड हो जाता है। इसलिए कविता जुड़ाव की बात करती है और साम्प्रदायिकता को नकारती है।

"बात एक ही है
पहले साम्प्रदायिक दंगे कराओ
फिर शांति मार्च के ढेर सारे आयोजन
सच यही है
कब्रों पर फूल उगाने जैसा।
सच की कल्पना 
कितनी कड़वी होती है
और बीभत्स भी
एक सच
जो पहले से ही तैयार होता है।"

सदियों से भोगा दर्द जब शब्द बनता है तो दर्द देनेवालों के लिए बहुत ख़तरनाक होता है। दलित कविता उनके लिए ख़तरनाक है जो आज भी जाति व्यवस्था की वकालत करते हैं और चाहते हैं कि उनका वर्चस्व बना रहे। ऐसे लोगों से कंवल भारती का सीधा प्रश्न है -

"यदि यह विधान लागू हो जाता कि
तुम्हारे जीवन का कोई मूल्य नहीं
कोई भी कर सकता है, तुम्हारा वध
तुम्हारी स्त्री , बहिन और पुत्री के साथ
कर सकता है बलात्कार 
जला सकता है घर-बार
तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती? (’तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती’)

दलित साहित्य की सांस्कृतिक चेतना प्राचीन मिथकों से ही प्राण पाती है। परंपरागत मिथकों के रहस्यों को उदघाटित करके उन्हें नया अर्थ देती है और फलत: वे ही मिथक दलितों केलिए शक्ति के प्रतीक बन जाते हैं। एकलव्य, शंबूक आदि ऐसे ही मिथकों का उदाहरण है। शूद्र ऋषि शंबूक द्वारा तपस्या किये जाने को उनका धर्म विरुद्ध मानकर ही राम द्वारा शंबूक की हत्या की जाती है। दलित कविता में शंबूक दलित चेतना के एक महानायक हैं। दलित कवि शंबूक की हत्या को मात्र एक शूद्र ऋषि की हत्या नहीं अपितु दलित चेतना की हत्या के रूप में देखता है। शंबूक पर कई दलित कवियों ने कविताएँ लिखी हैं। कँवल भारती की ’शंबूक’ नामक कविता में शंबूक हत्या को दलित चेतना से जोडकर इस प्रकार अभिव्यक्त किया है -

" शंबूक.... तुम्हारी हत्या/ दलित चेतना की हत्या थी
स्वतंत्रता, समानता और न्याय-बोध की हत्या थी 
किंतु शंबूक /तुम आज भी सच हो
आज भी दे रहे हो शहादत
सामाजिक परिवर्तन के यज्ञ्य में।"( कँवल भारती, तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती, पृष्ठ-49)

जाति के दंश, दमन और उत्पीडन को दलितों ने जितना अमानवीय रूप से भोगा है उससे जाति के प्रति उनके मन घृणा से भरे हैं। जाति के प्रति दलितों की घृणा को जयप्रकाश लीलवान की कविता में देखा जा सकता है -

"वर्ण-धर्म की वैचारिकी के
सुडौल उरेजों का
ज़हरीला दूध पीकर
विखंडन के खप्पर भरनेवाली डायन है
हमारे देश की जाति-प्रथा।" (जयप्रकाश लीलवान, अब हमें ही चलना है, पृष्ठ-55)

यह जाति एवं वर्ण व्यवस्था सवर्ण समाज की सुनियोजित एवं सुखाकांक्षी तथा सुविधाप्रद सामाजिक व्यवस्था है जिसके तहत उच्च वर्गों को निम्न जातियों के उत्पीड़न के अधिकार स्वत: प्राप्त है। कवि असंग घोष ऐसी जाति व्यवस्था के प्रति आक्रोश व्यक्त करते हैं -

"जाति/ खेतों में पैदा नहीं हुई/ घर के अंदर-बाहर रखे
गमलों में नहीं खिली कभी/ किसी पेड़ के फल से भी/ पल्लवित नहीं हुई
ना ही किसी कारखाने में निर्मित हुई/ यह बनी है
तुम्हारे ही बोये बबूल के काँटों की नोंक पर बामन! (दलित निर्वाचित कविताएँ; सं.कँवल भारती; इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहबाद, 2006, पृ.127)

दलित के पास गाँव में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे वह अपना कह सके, जिस पर गर्व कर सके। सड़कें, गलियाँ, श्मशान, कहीं पर भी उनका अधिकार नहीं है। डॉ. सुखबीर सिंह ने अपनी प्रसिद्ध कविता ’बयान बाहर’ में गाँवों में दलितों की स्थिति का चित्रण किया है -

"ओ मेरे गाँव! तेरी ज़मीन पर/ घुटी-घुटी साँसों के साथ
पलना पड़ता है अलग-अलग/ लड़खड़ाते कदमों से
चलना पड़ता है अलग-अलग/ मरने के बाद भी
जलना पड़ता है अलग-अलग। (दर्द के दस्तावेज़, सं.डॉ. एन.सिंह, पृ.42)

दलित स्त्रियों की कोई इज़्ज़त नहीं है, उनकी अस्मिता तार-तार की जाती है। देश के विभिन्न भागों में दलित स्त्रियों के साथ आए दिन होनेवाले बलात्कार/सामूहिक बलात्कार इसका ज्वलंत प्रमाण है। गाँवों में दलितों के लिए कहीं किसी प्रकार का सुकून नहीं है। गाँव या तो गिद्ध की तरह उसके कंधे पर बैठा रहता है, जो कभी भी प्रहार कर उसे लहूलुहान बना सकता है।कवि सुखबीर सिंह के शब्दों में -

"एक गाँव है/जो मेरे कंधों पर बैठा है
पूरा पेड़ एक खूँटा है चोंचदार
जो गड़ जाता है
या फिर गाड़ दिया जाता है बलात, 
इन्सानी जिस्म के ठीक बीचों बीच सुरंग में।" (दर्द के दस्तावेज़, संपादक -डॉ. एन.सिंह, पृ.33)

इसी तरह का प्रश्न सूरजपाल चौहान ने अपनी ’मेरा गाँव’ नामक कविता में उठाया है -"मेरा गाँव कैसा गाँव, न कहीं ठौर ना कहीं ठाँव।"

जाति के कारण ही समाज में दलितों को निम्न श्रेणी का मनुष्य माना जाता है। गैर-दलितों के बीच दलित को निरंतर उपेक्षा और अपमान की आशंका बनी रहती है। वह इस आशंका से मुक्त नहीं हो पाता। जाति के कारण वह समाज में अनजान, अपरिचित और पराए की तरह जीता है। कवि एन.आर.सागर ने अपनी एक कविता में दलित जीवन के इस दर्द को इस प्रकार अभिव्यक्त किया है :

’गिनती में हम नहीं हैं तो वोट की खातिर
वरना तो जी रहे हैं सर्वनाम की तरह।’ (एन.आर.सागर, आज़ाद हैं हम, पृ.15)

दलित कविताएँ सत्ता-व्यव्स्था और उनकी विचारधारा पर धारदार प्रश्न व तर्क करती है। ये कविताएँ आशावाद से भरपूर है। ये कविताएँ नया इतिहास रचने की बात करती है। दलित साहित्य उन प्रश्नों को उठा रहा है जिन्हें पूर्व का साहित्य बहुत सोच समझकर हाशिये पर ठेलता आया है। जाति का सवाल एक सवाल रहा है जिसकी चर्चा साहित्य मीमांसा में शामिल नहीं रही है क्योंकि यह सवाल ब्राह्मणवादी सत्ता-व्यवस्था के अन्यायकारी चरित्र को उघाड़कर रख देता है। लोकतंत्र और आज़ादी मिलने के बाद जब अछूत आज भी अन्याय सह रहा है तब यह किस तरह का लोकतंत्र है जो छह दशकों से ज़्यादा समय होने के बाद भी दलित को न्याय नहीं दे पाया। 

"अछूत राष्ट्रीय धारा से उपेक्षित, साहित्य से तिरस्कृत
दफ़्तर से अनिश्चित, समाज से असंतुलित, गाँव से असुरक्षित 
विश्वविद्यालयों में अनुपस्थित, राजनीति में बिकाऊ, कस्बे में उबाऊ, 
समाचार पत्रों से विलुप्त, शहर में असंतुष्ट, 
हाँ, ये अम्बेडकर की मूर्ति थामे, ज़मीन की तलाश में
लगभग आधी सदी से खड़ा है।(अम्बेडकरीय कविता -5, प्रेमशंकर)

अपने कविता-संग्रह आक्रोश में डॉ. सी. बी.भारती जी ने सवर्णों एवं अवर्णों के अंतर को स्पष्ट कर दिया है। वे सीधे संवाद की शैली में लिखते हैं -

"तुम जब खेलते थे खिलौने से / मैं भटकता था ढोर-डंगरों के पीछे तब
तुम जब जाते थे पढ़ने स्कूल / मैं अपने भाई बहनों को छाती पर लादे
अपनी झोंपड़ी में भूखा-प्यासा आँसू बहाता था तब
तुम्हारी माँ जब तुम्हें जगाकर / प्यार करती थी, स्कूल भेजती थी
मेरी माँ उस समय तुम्हारे ही खेतों पर ठिठुरती
काँपती मशक्कत करती रहती थी / तुम अपनी माँ की लोरियाँ सुनकर ही सो
पाते थे, उस समय मैं भूखा पेट रहकर / भी खाता था केवल झिड़कियाँ।" (दलित साहित्य, 1999; संपादक: जयप्रकाश कर्दम, पृष्ठ-279)

डॉ. सी.बी भारती की कविता दलित-वर्ग के भीतर समायी कुंठा तथा हीन भावना को समाप्त कर देना चाहती है। उच्च वर्ग के भीतर छिपी असंवेदनशीलता से कवि भली-भाँति अवगत दिखाई पड़ता है, इसी कारण वह यह घोषणा करने पर बाध्य है कि यह परिवर्तन की लहर बहुत शीघ्र ही मठाधीशों के धर्म-मठों को धराशयी कर देगी जो सदियों से उनका शोषण करते रहे हैं -

"घबराओ नहीं/ समय आ रहा है
जब हम भी बढ़ेंगे तुम से
दौड़ने की शर्त/ जीतेंगे बाज़ी
तोड़ेंगे तुम्हारा दर्प
सुनो परिवर्तन की सुगबुगाहट
बदलती हवा का रुख
पहचानो, पहचानो, पहचानो!"

क्योंकि दलित साहित्य की यह अवधारणा सर्वमान्य है कि यह प्रतिरोध का साहित्य है, इसलिए वह सभी पौराणिक परंपराओं और मान्यताओं पर आघात करने से नहीं चूकता। दलित कविता का विद्रोह व्यक्ति स्वाधीनता की प्रखर चेतना को मुखरित करता है।

शिक्षा का अभाव दलितों की स्थिति और दयनीय बना देती हैं। डॉ. भीमराव अम्बेडकर का बयान ’शिक्षा शेरनी का दूध होती है’ दलितों को शिक्षा की ओर आकर्षित करने के लिए हुआ है। लेकिन जातिवादी वातावरण उनको शिक्षा हासिल करने में रोड़ा बनते है। जयप्रकाश कर्दम अपनी कविता ’गूँगा नहीं था मैं’ में लिखते हैं -

"आपसी मतभेदों को भुलाकर / तुरत-फुरत स्कूल के
सारे सवर्ण छात्र /गोलबंद हो जाते, और
खेल-गुरुजी से हाकियाँ ले-लेकर
दलित छात्रों पर हमला बोल देते।"(गूँगा नहीं था मैं, अतिश प्रकाशन, दिल्ली, 1997, पृ.37)

दलित छात्रों पर सवर्ण छात्रों द्वारा केवल हमले ही नहीं होता, सवर्ण अध्यापकों द्वारा उन्हें प्रताड़ित भी किया जाता है। अपनी दूसरी कविता "वर्णवाद का पहाड़" में वे शिकायत करते हैं -

"मास्टरजी!/ हम शुक्रगुज़ार हैं कि तुमने/ हमें पढ़ाया/ प्रगति का रास्ता दिखाया
लेकिन समता के मार्ग पर तुम/ खुद नहीं चल पाये/ हमने रखा तुम्हें वर्ण और जाति से ऊपर 
पर नहीं उठ पाये तुम अपनी/ जातीय अहमन्यता की संकीर्णता से। (गूँगा नहीं था मैं, अतिश प्रकाशन, दिल्ली, 1997, पृ.21)

सुशीला टाकभौरे लिखती हैं –

"भक्ति से बड़ा ज्ञान है
अंधी भक्ति से बड़ी जागृति
मंदिर नहीं चाहिए, 
विद्यालयों के खटखटाये।"(दलित साहित्य-समस्त परिदृश्य, सं.डॉ. मनोहर भंडारे, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, 2013, पृ.105) 

शिक्षा केवल दलित पुरुषों में ही आत्मविश्वास नहीं जगाती, इससे दलित स्त्री भी एक नया आत्मविश्वास प्राप्त करती हैं। श्यौराज सिंह ’बेचैन’ की’लड़की ने डरना छोड़ दिया’ कविता में इसी आत्मविश्वास की झलक दिखाई देती है -

"अक्षर के जादू ने /उस पर असर बड़ा बेजोड़ किया
चुप्प रहना छोड़/ दिया, लड़की ने डरना छोड़ दिया
हँसकर पाना सीख/ लिया, रोना-पछताना छोड़ दिया/.....
घुट-घुटकर/ अब नहीं मरेगी, मंच पै चढ़कर बोलेगी
समय और शिक्षा/ ने उसके चिंतन का रुख/मोड़ दिया।" (क्रौंच हूँ मैं, श्यौराज सिंह ’बेचैन’, सहयोग प्रकाशन, दिल्ली.1995, पृ’48)

हिंदी दलित कविता शिक्षा को दलित समाज के अस्तित्व की बेहतरी केलिए सबसे बड़ा हथियार बताती है।
नारी विमर्श को दलित चेतना के परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश समकालीन दलित कविता में है। प्रतिभा अहिरे की कविता’हे दोस्त’इसका पक्का प्रमाण है -

"मैं नहीं मानती खुद को अर्द्धांगिनी
मैं सिर्फ़ एक शरीर नहीं हूँ
तुम मुझे अर्द्धांगिनी कहकर मेरा अपमान मत करो ।
मै हूँ एक संपूर्ण शरीर, स्वतंत्र मस्तिष्क
मेरे कंधों पर और मस्तिष्क का सदुपयोग जाननेवाली एक व्यक्ति हूँ
एक इंडिविजुअल। (सं.सर्वेश कुमार मौर्य, यथार्थवाद और हिंदी दलित साहित्य पृष्ठ 108) 

दलित कविता का मूल चेतना मनुष्यता है। भारतीय समाज में खास तौर से सवर्णों के बीच में कहीं न कहीं इसका सर्वथा अभाव दिखाई देता है। जब तक वर्ण-व्यवस्था रहेगी तब तक अस्पृश्यता भी बनी रहेगी। मनुवाद के रहते मनुष्यता नहीं पनप सकती। कवि लक्ष्मीनारायण ’सुधाकर’ ने इस तथ्य को कविता में अभिव्यक्त किया है-

"पूँजीवाद मिटा दो, समता तभी विश्व में होगी
मनुवाद मिटा दो, दुनिया से तो मानवता पनपेगी।“ (लक्ष्मीनारायण ’सुधाकर’, उत्पीड़न की यात्रा, पृ-61)

दलित कवि आज भी यह अनुभव करता है :

“तुम कहते आज़ादी आई
हम को न अभी तक पता चला।
आज़ाद हुआ बस लाल किला।“ (लक्ष्मीनारायण ’सुधाकर’, उत्पीड़न की यात्रा, पृ.23)

इस दौर में लिखी जा रही दलित कविताएँ सहानुभूति का कम, भोगे हुए यथार्थ का भावनात्मक दस्तावेज़ीकरण अधिक है। इसका स्वर आक्रोश से भरा हुआ है, मगर सच्ची संवेदना और गहरे दर्द का है। हम यह कह सकते हैं कि हिंदी की दलित कविता भारतीय समाज की विसंगतियों, दलितों के साथ हो रहे जातिवादी भेदभावों व अमानवीय अत्याचारों के प्रति विरोध की कविता है। यह इस समाज और व्यवस्था को बदलकर समतामूलक बनाने की चाह और संघर्ष की कविता भी है। समकालीन दलित कविता केवल मानवता की पक्षधर है।

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