विशेषांक: दलित साहित्य

10 Sep, 2020

सभ्यताएँ मिटती नहीं
मिटाई जाती हैं।
इतिहास मिटता नहीं
मिटाता जाता है।
जनता डरती नहीं डराई
जाती है ।
गोली चलती नहीं चलाई
जाती है।
जागो! और पहचानो
वो कौन है?
जो सब कुछ जानकर
भी मौन है।
 
माँएँ अक़्सर कहा करती हैं।
पुरानी कहावतें,
परियों के क़िस्से और उनमें बसी
चुड़ैलों की कथाएँ।
माँएँ भी तो कभी बेटियाँ ही थीं।
जब मान लिया था उसने
ख़ुशी-ख़ुशी कि औरतें होती हैं
परी और चुड़ैल भी
माँएँ सवाल नहीं करती थीं।
अगर कर सकतीं ..तो पूछतीं!
ज़रूर अपनी माँ या सास
या फिर, उसकी सास से
सुलगती भट्टी की चिंगारी को
क्यो ढाँप देना चाहती हो राख से?
आख़िर! आँच पर राख कब
तक डलती रहेगी?
कभी तो टूटेगा  बाँध सब्र का
और परंपरा,समझौते की ।

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