विशेषांक: दलित साहित्य

10 Sep, 2020

क्योंकि मैं अनुसूचित ठहरा!

कविता | हेमंत कुमार मेहरा

सदियों सदियों यही हुआ है
मौन मुखर सबकुछ सहता हूँ
आज भी प्रचलित यही प्रथा है
दफ़्तर में दब कर रहता हूँ।
 
मुझसे ऊपर बैठा अफ़सर
यत्न-प्रयत्न ही बाधा डालें
आगे बढ़ने के अवसर पर
मुझको सब के बाद पुकारें।
 
मेरे आगे बढ़ जाने से
तुम कैसे पीछे हो जाओ
बात समझ से परे है मेरी
मुझको थोड़ा तुम बतलाओ।
 
जो भी लाभ हमें मिलता है
आधा तो तुम खा जाते हो
बचा कुछा जो मिलता है तो
ताने देने लग जाते हो।
 
इंटरनेट की इस दुनिया में
हमसे अब भी हेय धरे हो
फ़ेसबुक और व्हाट्सप्प पर भी
उलटे सीधे व्यंग्य कसे हो।
 
माना अब वो दौर नहीं हैं
लेकिन फिर भी सत्य यही है
बुद्धि अब भी विकृत कुंठित
दिल में अब भी द्वेष वही है।
 
क्योंकि मैं अनुसूचित ठहरा!

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