विशेषांक: दलित साहित्य

10 Sep, 2020

पार्वती अम्मा के न आने पर उनके लिए पूरा दिन गुज़ारना बहुत कठिन हो उठता था। पैंसठ साल की पार्वती अम्मा, नाती- पोतों वाली पार्वती अम्मा, जब तब घर में ऐसा कुछ पा जाती कि भूल ही जाती कि उनके पीछे, उनके बिना कहीं ज़िन्दगी रुक ही गई होगी। इस रुकी हुई ज़िन्दगी को हर पल धक्का देकर चलाना जो पड़ता था। यह ज़िन्दगी अपने आप में बड़ी कठिन थी, उसके लिए सब कुछ बड़ा कठिन था। कभी यह सब कुछ बहुत सहज था, बहुत आसान, ठीक वैसे ही जैसे बहता है पानी, या बहती है हवा, या कि जैसे उगता है सूरज और छिप जाने पर चाँद आ जाता है बिना किसी के आवाज़ लगाए अपने आप।

अभी पिछले लगभग एक घण्टे से सूखी ठूँठ-सी बेजान उँगलियाँ प्रयासरत थीं। एक आसान सा काम उन्हें बड़ा कठिन बना रहा था। चम्मच उँगलियों के बीच फँस ही नहीं रहा था। आँखों से झर-झर आँसू बह रहे थे। होंठ के दोनों कोने फड़फड़ा रहे थे। सामने मोबी भी बेचैन थी, उनके प्रयास के साथ-साथ वह भी कभी उठकर खड़ी हो जाती, कभी फिर बैठ जाती। कभी प्लेट की ओर देखती, कभी उनके मुँह की ओर ताकने लगती। शायद समझने का प्रयास कर रही थी कि आख़िर समस्या क्या है। उसके ख़ुद के पेट में भी भंयकर हलचल थी पर वह बेचारी अपनी जातीय सभ्यता की मारी उनकी प्लेट में मुँह न मार सकती थी। सहसा उन्होंने मोबी की ओर देखा। उनकी आँखें ठहर गईं, कुछ देर वे रुकी फिर, भरपूर ज़ोर लगा कर उन्होंने प्लेट को अपनी ठूँठ सी हथेली से धक्का दिया और प्लेट टनटनाती हुई ज़मीन पर जा गिरी। सारी खिचड़ी एक जगह धप्प से गिर गई। मोबी चौंक कर उनकी ओर देखने लगी। दोनों की निगाहें मिली और मोबी गिरी खिचड़ी को तत्परता से चाटने लगी। सुनसान से कमरे में देर तक प्लेट के गिरने की आवाज़ गूँजती रही। अब मोबी के भीतर कोई रोक नहीं थी उसे कोई मलाल नहीं था। वे बैठी ग़ौर से उसका सपड़-सपड़ कर खिचड़ी खाना देखती रहीं। एक अजीब सी राहत उन्होंने महसूस की। मोबी ज़मीन पर गिरा अन्न का एक-एक दाना खोज रही थी। खाने के बाद मोबी ने उनके पैरों को सूँघा, उन्होंने ख़ूब प्रयास से अपना ठूँठ सा हाथ उसकी पीठ पर रख दिया। मोबी ज़ोर से हिनहिनाई और वहाँ से चल दी।

अभी कोई सुबह के ग्यारह बजे होंगे। बाहर गुनगुनी धूप दस्तक दे रही थी। किवाड़ के नीचे से धूप की लकीर सी खिंच आई थी। सुबह ऑफ़िस के लिए भागते-भागते नीलम ने उन्हें ब्रश करवा दिया था और उन्हें उनकी व्हील चेयर पर भी बैठा दिया था। आख़िर उनमें बोझ ही कितना था। जीवन ने जो रूप-रस-गंध उनमें भरी थी, उसे पिछले तीन-चार सालों के बवण्डर ने वापस सोख लिया था। सिकुड़ती-मुचुड़ती हुई वे और उनकी ज़िन्दगी व्हील चेयर में ऐसे समा जाती थीं जैसे वे उसी का हिस्सा हों। इस समय बाहर की धूप उनकी व्हील चेयर को अपनी ओर खींचने लगी थी। वे किसी तरह दरवाज़ा खोल कर बाहर आ गईं। दरवाज़े ने खुलने में कोई ज़िद न की। शायद नीलम उसे यूँ ही ओढ़ाल कर चली गई थी। कमरे और बाहर आँगन के बीच फ़र्श कुछ ऊँचा नीचा था, अन्दर से बाहर ठेलना तो उनके लिए फिर भी आसान था पर बाहर से अन्दर धकेलना अगर मुश्किल हुआ तो? हुआ तो हुआ, पर अभी तो बाहर चारों ओर ज़िन्दगी बह रही थी। जैसे कोई अदृश्य रागिनी बज रही हो। गिलहरियाँ पकड़म-पकड़ाई खेल रही थी। पेड़ पर चढ़ने-उतरने में उसका कोई सानी नहीं, जैसे किसी नैसर्गिक ताल पर नृत्य करती फिरती हों। अपनी हर चिकपिक पर वे अपनी पूँछ को नब्बे के कोण पर उठातीं और गिरातीं। पहले पूँछ उठती है और फिर आवाज़ आती है या कि पहले आवाज़ आती है और फिर पूँछ उठाई जाती है। कहीं आवाज़....!! अपने इस ख़्याल पर ही वे मुस्कुराईं। छोटे–छोटे पौधे गर्मी पाकर तन गए थे। जैसे ठण्ड का मुक़ाबला करने को तैयार हो गए हों। वे भी अपनी हथेलियों को आपस में रगड़ने लगीं। शायद उनमें भी कुछ प्राण आ जाएँ। उन्हें याद आया उनके शहर में रिक्शा स्टैण्ड के बगल में बैठा वह भिखारी जो अपने ठूँठ से हाथ उठा-उठा कर लोगों से भगवान के नाम पर भीख माँगता था। कितनी घृणा थी उन्हें उससे। वे ग़ुस्से में अपनी उँगलियों को सीधे करने का प्रयास करने लगीं। ऊँह... इन टेढ़ी-मेढ़ी, बेजान उँगलियों की ओर देखना भी उन्हें ख़ुद ही पसंद नहीं था। न जाने कैसे उनके शरीर की सारी हड्डियाँ अपने जोड़ों पर से सूज कर जाम हो गई थीं। पूरा शरीर एक बड़ी-सी हड्डी में बदल गया था। उनके जले-झुलसे से हाथ, जैसे ऊपर की खाल जल कर हड्डियों के साथ चिपक गई थी। वह उन्हें भरपूर उर्जा देना चाहती थी। शायद हड्डी के जोड़ पिघल कर कुछ खुल सकें। इसके लिए अन्दर से वह जितना प्रयास बाहर करतीं बाहर आते-आते वह ज़ीरो हो जाता। उनके अन्दर और बाहर के बीच जैसे कोई जादुई दीवार खड़ी हो गई है। अन्दर से वे कितना- कितना सोचती अपने आप को हौसला देती, हिम्मत करके हाथों और पाँवों की उँगलियों को हिलाने का प्रयास करती पर सब बेकार। हथेलियों पर कर्म और भाग्य की रेखाएँ एक दूसरे में विलीन हो गईं थीं। कौन किसको बता रही है कुछ तय कर पाना बहुत कठिन था। सारा सारा दिन वह अपने इन घृणित हाथों को साड़ी के पल्लू में छिपाए रहतीं थीं। 

एक गिलहरी अचानक से झपट्टा सा मारकर उनकी मुचड़ी सफ़ेद साड़ी पर से चावल का एक पका दाना उठा कर ले गई। उसके अचानक के इस हमले से वे भीतर तक हिल गई क्योंकि बाहर से वे ज़रा भी नहीं हिल पाई थीं। वे भीतर तक डर गईं। उन्होंने बहुत ज़ोर लगाकर अपनी व्हील चेयर को थोड़ा आगे-पीछे किया। उन्हें थोड़ी तसल्ली हुई। गिलहरी उस चावल को खाकर बेपरवाह सी इधर–उधर फुदकने लगी। अब उन्हें ध्यान से देखने पर नज़र आया कि उनके कपड़ों पर कई जगह खिचड़ी के दाने पड़े हैं। उन्होंने पीछे सिर टिका लिया जहाँ से गिलहरी को उनका चेहरा न दिखाई दे। अब वे इंतज़ार करने लगी कि कब आकर वह गिलहरी बाक़ी बचे चावलों को भी उनकी धोती पर चढ़कर ले जाए। अपने शरीर से उनका दूर का रिश्ता हो चला था जिसमे वे ख़ुद और उनका शरीर जैसे दो भिन्न-भिन्न अस्तित्व थे। गिलहरियाँ भी निरीहों पर वार नहीं करतीं। उस खेल में भी क्या मज़ा जब कोई विस्मय, रोमांच और डर से "ओह" या "अरे" करता हुआ उछल न पड़े। जाओ मुझे नहीं चाहिए तुम्हारे ये चावल के दाने! उनकी आँखें मुँदी की मुँदी रह गईं। धूप ने उन्हें प्यार की झप्पी दी और उन्हें झपकी आ गई। 

शेखर ने आकर कहा, "अरे शाम हो गई, तुम अभी तक यहीं बाहर बैठी हो?" और वे ऐसे आँखें फाड़-फाड़ कर उन्हें देखने लगी कि अरे ये कहाँ से आ गए। “तुम ज़रा अपना भी ख्याल रखा करो। मुझे तो दिन-रात टोकती रहती हो कि ऐसे करो, वैसे करो, ये खाओ, ये मत खाओ...” कहते हुए उन्होंने अपने झोले में से चिकना खाखी लिफ़ाफ़ा निकाला जिसे देखते ही वे सच में शुरू हो गईं–

“कितनी बार कहा है कि ये मार्किट का तला-भुना मत खाओ, क्या बच्चों की तरह समोसे लेकर चल दिए।”

मंद-मंद मुस्कुराते शेखर इतने में अन्दर से एक छोटी टेबुल उठा लाए। पास ही दूसरी कुर्सी खींच कर वे प्लेट में समोसे चटनी ऐसे परोसने लगे जैसे इसके ख़ासे अभ्यस्त हों।

“अरे चाय तो मैं घर पर ही बना देती। ये भी थरमस में भरवा कर लाए हो।” 

“तुम्हारे चाय बनाने तक तो ये ठण्डे न हो जाते,” शेखर ने उनकी ओर प्लेट बढ़ाते हुए कहा। इनकी आँखें न जाने क्यों फिर से झर-झर बहने लगीं।

◘ ◘ ◘

मोबी अन्दर कमरे में तपिश पर चढ़ी जा रही थी। तपिश रजाई की गुमटी सी बनाए उसके भीतर कहाँ छिपी सो रही थी वह खोज ही नहीं पा रही थी। वह चारों ओर से अपने पंजों और मुँह से रजाई को ठेलने और खोलने की कोशिश कर रही थी। बार-बार थककर वह बैठ जाती और अपने ही पंजों को चाटने लगती। कुछ ही देर बाद न जाने किस प्रेरणा से तपिश को उठाने के अपने भगीरथी प्रयास में वह फिर जुट जाती। बीच-बीच में वह बाहर का चक्कर लगा आती। बूढ़ी अम्मा कहीं गहरे में जाकर सो रही हैं। चाहे नींद ही नींद में वे सुबक भी रही होती पर उनकी यह नींद उनके लिए बहुत क़ीमती है, यह समझते हुए वह चुपचाप आकर अन्दर बैठ जाती और एकबार फिर से प्रयास करती। अचानक रजाई के भीतर फोन की घण्टी बजने लगी। अब तो मोबी को यक़ीन हो गया, तपिश इसी रजाई के भीतर है। आख़िर वह उसकी रिंग टोन को बेहतर से पहचानती थी। रजाई के भीतर ही फोन उठा लिया गया।

"गुड मॉर्निंग डियर!"

"ओह मोम, इटस सो अरली!"

"इट्स नोट बेटा। इट इज़ इलवन थर्टी नाओ।"

"सो वॉट, यू नो, एट फ़ोर ओ क्लोक आइ केम हेयर ओन बेड। देयर वर मेनी ऐसाइनमेन्ट्स ऑन माई हेड।"

"यू शुड हेव अ प्रोपर टाईम टेबल। यू नो?”

"ओह ममा, आइ डोन्ट वान्ट सच सिली सजेशन्स।"

"व्हाट डू यू मीन?" आवाज़ में कुछ तल्ख़ी घुल गई। तपिश ने भी रजाई से मुँह बाहर निकाला।

"ओके टैल मी। व्हट डू यू वॉन्ट?"

"आइ थिंक यू आर इनफ़ कपेबल टु नो व्हॉट आई वॉन्ट।"

इसके साथ ही फ़ोन डिस्कनेक्ट हो गया। मोबी तपिश के दर्शन कर कुछ इस तरह धन्य हुई कि ख़ुशी के मारे वह लगभग उसकी गोद में ही कूद पड़ी। तपिश भी कुछ देर तक रजाई की कमी मोबी को अपने आप में समेट कर पूरी करती रही। नर्म मुलायम, गुदगुदी सी मोबी भी मानवीय ऊष्मा को देर तक शान्त होकर पीती रही। अचानक तपिश को याद आया कि जाते-जाते माँ क्या कहकर गई थी। "ओह नो... पार्वती अम्मा, आइम गोइंग टू किल यू।" उसने उठकर अपने बिस्तर को एक ओर पटक दिया। मोबी उसी में जा समाई थी। वह उसे देखकर मुस्कुराई। वैसे भी तो शाम को उसे रजाई तो खोलनी ही पड़ेगी। तो अभी समेटने की ऐसी कोई ज़रूरत तो नहीं। पाँवों में अपने नए मुलायम स्लीपरों को फँसाए लगभग पैर घसीटती हुई वह ग्रैनी के कमरे की ओर आई। नानी बिस्तर में नहीं थी। हालाँकि बिस्तर ज्यों का त्यों था। जैसे अभी कोई उसमें आकर समा जाने वाला है या कोई अभी-अभी उसके आग़ोश से निकल कर बाहर गया है। बिस्तर पर कुछ दाल चावल के पीले निशान दिखाई दे रहे थे जिन पर छोटी काली चींटियाँ चिपकी उसका आनन्द ले रही थीं। इस कमरे में आते ही तपिश को न जाने कैसा-कैसा सा लगने लगता है। कोई अजीब सी गंध बसी हुई है इस कमरे में। बूढ़ी और बीमार सी गंध। यह कमरा कभी उसका अपना कमरा हुआ करता था। पर अब यह वह कमरा कहाँ रहा। सामने वाली अलमारी में अपने खिलौने वह क़रीने से संवार कर लगाती थी। अपनी मनपसंद किताबों और अलमारियों को यहाँ से बाहर निकालते उसे लगा था कि जैसे उसे देश निकाला दे दिया गया हो। अपना बिस्तर, अपने कुशन्स, अपना फ़र्नीचर सब कुछ निकाल लिया था उसने यहाँ से, पर वह अभी कहीं ठीक से जम नहीं पाया था। उसका मन भी उचटा था तभी से। न जाने क्यों हलके से धकियाने पर भी दरवाज़ा खट्ट की तेज़ आवाज़ के साथ तेज़ी से खुल कर काँपता सा रहा कुछ देर तक। क्या इसलिए कि यह एक नौजवान का प्रयास था। जवानी में तन-मन में गहरी पटती है। पर बुढ़ापे तक आते-आते तन, मन की खटपट इतनी बढ़ जाती है कि तन, मन की एक नहीं मानता। मन, मन के भीतर ही चक्कर काटता है पिंजरे में बंद किसी जानवर की तरह घुर्राता हुआ। पिंजरे के बाहर उसका कोई डर नहीं।

दरवाज़े की खट्ट के साथ ही वे हक्की-बक्की सी इधर-उधर देखने लगी। याद आने पर ख़ूब अच्छी से धुली हुई आँखों को पौंछ कर सतर्क होकर बैठ गईं। 

"उठ गई बिटिया..."

"हूँ"

"बारह बजने को है, कुछ खाया तुमने?"

"अभी तो उठी हूँ…”

"हूँ…”

वे सोचने लगी कि अब आगे क्या बात करे! क्या कुछ पूछे? उनकी आँखें कुछ देर तक इधर-उधर कुछ कुछ ढूँढ़ती रही। तपिश नानी की ही तरह जितनी बाहर थी उससे कई गुना भीतर भी थी। उसने भी ख़ुद को भीतर से बाहर धकियाया और पूछा–

"मैं अपने लिए दूध और कार्न फ़्लैक्स बना लूँगी। क्या आपके लिए बनाऊँ?" 

"नहीं बिटिया, माँ मेरे लिए सुबह ही खिचड़ी बनाकर गई है।"

कहकर उन्होंने मोबी की ओर देखा जो बड़ी उम्मीद से तपिश की ओर देख रही थी। वे साड़ी के पल्लू के भीतर छिपे अपने हाथों और मोबी के पंजों की आपस में तुलना करने लगीं। उससे तो बेहतर मोबी ही है। उन्होंने मीट के टुकड़ों को अपने अगले दोनों पंजों में जकड़कर खाते मोबी को बहुत बार देखा है। 

"तुम मोबी के लिए भी देख लेना उसने भी कुछ नहीं खाया है। बेचारी अपने से नहीं उठा सकती कुछ…” कहकर उनकी आँखें तेज़ी से झपकने लगीं।

“ओ... माई पूअर चाइल्ड,” कहकर तपिश ने पास खड़ी मोबी को गले से लगा लिया। "मेरे बेबी ने सुबह से कुछ नहीं खाया, ओह डियर तुमने मुझे क्यों नहीं जगाया। चलो-चलो तुम्हें कुछ खाने को दें।" पूँछ हिलाती मोबी उसके साथ-साथ भीतर चली गई। 

उन्होंने अपनी व्हील चेयर को हिलाया। उसे वापस कमरे में ले जाने का प्रयास करने लगीं। वही हुआ जो होना था। चेयर को वापस कमरे में ठेलना उनके लिए ख़ासा मुश्किल था। उनका बूढ़ा प्रयास बाहर आकर फुस्स हो जाता था। पर वे लगी रहीं। मन में फिर से धक्कामुक्की हो रही थी।

◘ ◘ ◘

तपिश का फोन फिर बज उठा। 

"हेलो बेबी वटस् गोईंग ऑन?” 

"पूअर बेबी को भूख लगी है ममा। इस मोबी को भी किसी ने कुछ नहीं दिया अभी तक खाने को, यू नो।"

"व्हाए नॉट, यू कुक समथिंग फ़ोर योर्ससल्फ़।"

"व्हाए नॉट... सारी-सारी रात जागकर पढ़ो और सुबह उठो तो खाना भी ख़ुद बनाओ।"

"एक ही दिन की तो बात है, बेटा।"

"आइ डोन्ट नो व्हाए यू परमिट पार्वती अम्मा टू टेक लीव। दिस इज़ माई प्रीपेटरी टाईम। नेक्स्ट वीक आइ हैव माई सेमेस्टर एग्ज़ाम। ओह नो हाउ.…”

"ओके-ओके आइ टॉक टू हर।"

पार्वती अम्मा के छोटे से घर में भीड़ अंटी पड़ी थी। उनकी जो नातिन पिछले साल किसी लड़के के साथ भाग गई थी वह अपने साथ दो महीने का बेटा लेकर कल वापस आ गई। पार्वती का तो घर जैसे खिल गया। एक ही बेटी थी उसकी जिसका बड़े चाव से ब्याह किया पर वो तो शादी के पाँच साल बाद अपनी एक बेटी और मर्द को छोड़ किसी और के साथ भाग गई थी। कोई चौदह-पन्द्रह बरस हुए। किसी ने बताया कि वो रह दिल्ली में ही रही है। पर ख़ुश ही होगी वरना तो वापस आ ही जाती। मर्द ने भी कोई और ठिकाना ढूँढ़ लिया। रह गई थी वह बच्ची जिसके बारे में माँ-बाप किसी ने न सोचा। चार बरस की बच्ची पार्वती के लिए अपनी ही बेटी हो गई। 

"अरी निकम्मियों वो गाओ शीला की जवानी।"

"ना अम्मा, लैला मैं लैला... ऐसी हूँ लैला…”

"ओ... लैला...।" बाहर जुटी भीड़ में से समवेत आवाज़ आई। फिर क्या था ढोलक की थाप और हारमोनियम के सुर में इस गाने का लोकल वर्जन निकल पड़ा। “लैला मैं लैला... ऐसी हूँ लैला... हर कोई चाहे मुझसे मिलना अकेला...” और हिजड़ों का साथ देने को आस-पास के मनचले मैदान में कूद पड़े। 

"अरी अम्मा रात में डीजे लगवा दीजो। फिर देखियो," मनचले मचल-मचल कर गुहार करने लगे।

"सई है अम्मा। अभी तो सब की सब लुगाइयाँ अपने-अपने काम पै गईंयै हैं। पार्टी तो रात ही मैं जमिहै।"

बुढ़िया ने पाँच सौ का नोट अपने पड़नाती पर वारा ओर बाहर निकल आई। 

“लल्ला की नानी बड़ी ही कंजूस है.... हाँ....।” 

“लल्ला की नानी बड़ी मक्खी चूस है....।”

"अरी रोला नाए करो। चुपचाप जे रखो। गरीब आदमीन पै इतनो ही बनै है।"

"ये ल्लो... इतनी.... बड़ी कोठी की मालकिन ओर जे पाँच सो रुपै मैं टरकावै।"

"अरी सुल्ताना वा कोठी तो जिसकी है उसकी है। तुम कायको ज़िद करौ। अरी लै जाओ जो दै रई हूँ।" पार्वती ने उसकी हथेली में पाँच सो के नोट को देकर मुट्ठी बंद करते हुए कहा। 

"अरी हाँ म्हारे नसीब में कहाँ की कोठी। अच्छा चल सौ रुपये और दे दे। ज्यादा न माँग रई।"

पार्वती ने अंटी से सौ रुपये और निकाले और उस शोर को वहाँ से बिदा किया।

कोई सात बाई आठ की कच्ची कोठरी थी। बगल में इतनी ही बड़ी एक और कोठरी दबा ली गई थी और आगे तीन साढ़े तीन फ़ीट का छोटा सा आँगन था जिसमें अँगीठी रखी थी। बाहर कोई दस बारह फ़ीट की खुली जगह ज़रूर थी जिसके कारण घर, घर के बाहर तक फैला रहता था। अभी जो हिजड़ों का मजमा लगा था वह यहीं था। हिजड़े तो चले गए पर उनके गाए गीत अभी भी वहाँ गूँज रहे थे।

“अरी अम्मा रात मैं डीजे ज़रूर लगवा दीजो।” 

हनीसिंह के एक भक्त ने अपने भीतर तड़पती हुई नृत्य भावना को दबाते हुए मनुहार करते हुए कहा।

“तू जा अपना काम देख,” पार्वती ने उसे झिड़का। “दो घड़ी अपणी माँ गैल भी बैठ जाया कर।” 

पार्वती फ़ालतू घूमते इन लड़कों से खफ़ा रहती थी। माँ-बाप दिन भर मेहनत मज़दूरी के कारण बाहर रहते और उनके पीछे ये जवान लड़के-लड़कियाँ एकता कपूर के धारावाहिकों को साक्षात् जीने लगते। सैक्स, प्रेम और धोखा। दुनिया जैसे इसी में सिमट गई थी। लड़के की माँ की इस मुहल्ले के मुहाने पर ही सब्ज़ी की एक छोटी सी दुकान थी जिसके ख़रीदार भी अधिकतर बस्ती के ही लोग थे। पर नौ बजे से पहले आते-जाते राहगीर भी कुछ ख़रीद ही लेते थे। लड़का बिल्कुल निकम्मा था। टी.वी. के "डांस इंडिया डांस" जैसे रीयलिटी शो उसे सच में रीयल लगने लगे थे और वह भी सपने सजा रहा था कि कैसे वहाँ पँहुचा जाए। सपने इतने हसीन थे कि उनसे बाहर निकलना उसके लिए संभव ही नहीं था।

"अम्मा शाम कू डीजे लगवा दीजो न।"

"ये सब तो फालतू हो रहे हैं, अपने घर मैं"

"तू अब भी नाराज है। खुस ना है। गर तू खुस ना है तो मैं आज ही चली जाऊँगी।” 

लड़की सच में परेशान थी। जानती थी कि जिसके माँ-बाप न हुए उसे उस बुढ़िया ने पाला। बिल्कुल अपना बनाकर। कित्ता चाहती थी अम्मा कि वह पढ़ जाए। पर वह कैसे बताए "अम्मा मैंने तो पूरी कोसीस करी थी पर पढ़ाई छोड़ बाकी सारे काम सिखावै थी यह दुनिया। ओ मेरी प्यारी अम्मा तेरे पीछे सै ये दुनिया तो मुझै ही सँभालनी थी। बहुत सोच-समझकर भागी थी मैं।" जब नेहा बहुत देर तक नहीं बोली और अपने आप में ही डूबी रही तो पार्वती भी थोड़ी नरम पड़ी। जवान बच्ची अगर फिर से चली गई तो। ना जाने वो मुस्टंडा उसका क्या करे? अभी तो सब ठीक है.. पर बाद में... और फिर उसे भी तो अपने बुढ़ापे में कोई तो चाहिए। वह बच्चे को उठाकर बाहर आ गई। ठीक-ठाक धूप खिली हुई थी। बच्चा मस्त होकर सो रहा था। माँ को दूध भरपूर था, सो उसका पेट भरा था। टूटी सी चारपाई पर गुदड़ी फैला कर उसने बच्चे के ऊपर के कुछ कपड़े हटा दिए। सुबह से काम में लगी उसने कुछ खाया भी न था। अगर वह काम पर होती तो अब तक तो उसका भरपूर नाश्ता हो चुका होता। अम्मा उसका कितना ख़्याल रखती हैं जो भी उनके लिए बनता है या वे उससे बनवाती हैं उसमें से आधा उसे ही खिला देती हैं। उनकी भूख ही कम थी या वे उससे बनवाती ही ज़्यादा थी कि वह भी भरपेट खा पाए। वे बैठी- बैठी बच्चे के गीले कपड़े इधर-उधर सुखाने लगी। जहाँ जगह मिलती, वहाँ डाल देती। आकर फिर से खाट पर बैठी तो ख़ुद ही ख़ुद नींद में मुस्कुराते बच्चे को देखकर मुस्कुराने लगी। 

"अरी अम्मा टोक लगाओगी क्या?”

नेहा चाय बनाकर ले आई थी। साथ में दो ब्रैड के पीस भी थे। वह भी वहीं पालथी मार कर बैठ गई और चाय पीने लगी। 

“तू अपने लिए आधा किलो दूध लियाया कर। कम से कम दो तीन महीने तो पी ले। ...कल तेरे लिये दलिया भी ला दूँगी। ...और कुछ लाणा हो तो बता दे,” पार्वती जी ने चाय के एक दो घूँट लेकर कहा। अचानक से उनका फोन बज उठा। "अरे जेब में तो ना है कहाँ बज रहा है?" उसने सारे कपड़े उलट-पलट दिए। 

"ओ अम्मा ये रह्या इसके नीच्चै घुस गया।"

नेहा ने बच्चे के नीचे से फोन निकाल कर उसे पकड़ाया।

"हेलो पार्वती जी।"

"हाँ मेडम जी मैंने बताई तो थी आपको,” पार्वती छूटते ही बोली।

"हाँ पार्वती जी, आपने बताया तो था, पर बात ऐसी है न कि अम्मा का आपके बिना चल नहीं पाएगा।"

"एक्कै दिन की तो बात है। कल.. आ जाऊँगी।"

"वो ऐसा है न पार्वती जी। मुझे तो आज छुट्टी नहीं मिल पाई, और आपको तो पता है अम्मा को और कोई कहाँ सँभाल पाता है।"

"अब तो एक बजरा है, अम्मा नै रोटी खाई कि नईं," पार्वती थोड़ा परेशान हुई। 

"वही तो.. अगर आप एक बार घर हो आती तो... शाम का मैं आकर देख लूँगी। वो क्या है न अम्मा आपको बहुत मानती हैं।” 

 मेडम की लरजती सी आवाज़ को पार्वती ख़ूब पहचानती थी। उनके मुँह से अनमना सा ‘हुँ’ ही निकला। मेडम ने आश्वस्त हो फोन रख दिया। पार्वती अपनी बची हुई चाय और ब्रैड खाने लगी। 

"चाय बढ़िया बनाई।"

"जे तो ठण्डी हो गई अम्मा। और बना दूँ।"

"न राजो” 

कहकर पार्वती अम्मा ने नेहा का हाथ पकड़ लिया और उसे अपने माथे से लगा लिया। नेहा ने भी अपना हाथ नहीं खींचा। वह नानी के पास सरक आई। दोनों नि:शब्द थीं। दोनों अपनी-अपनी दुनिया में अलग-अलग विचरण कर रही थीं। आसपास छोटे बच्चों की चिल्लपौं मच गई थी। स्कूलों में मस्ती मारकर बच्चे घर लौट आए थे। वहाँ से गुज़रते हुए स्टेचू बनी माँ बेटी को अचम्भे से देख-देख कर फुसफुसाते हुए वहाँ से गुज़रने लगे थे। बच्चे ने बहुत देर से उन्हें जो ब्रेक दे रखा था उसे ख़त्म करने की घोषणा, उसने तेज़ चित्कार के साथ की। दोनों जैसे सोते से जागी। दोनों की पलकें भारी थीं, दोनों की पलकें गीली थीं।

"तुम जाओ अम्मा। मैं सँभाल लूँगी। फिर रोज भी तो अकेले ही करना है। पड़ौस में भतेरी चाची भी तो है।"

पार्वती ने भीतर जाकर अपना थैला उठाया। तेज़ क़दम के साथ बाहर को निकली। भरी नालियों के बाहर बिखरे पानी से बचते-बचाते आगे बढ़ती पार्वती की घरघराती आवाज़ पीछे की ओर लपकी। 

"डीजे के आधे पैसे मैं दे दूँगी।"

नेहा ख़ुशी-ख़ुशी बेटे को दूध पिलाने लगी। उसका बस चलता तो सारा दूध एक ही बार में उसके मुँह में उड़ेल देती पर दो महीने के बच्चे का मुँह चूजे जितना तो था ही। सामने से हन्नीसिंह मुस्कुराता हुआ आता दिखाई दिया।

"दो सौ रुपये मेरी तरफ़ से। तुझे पता ही है, प्रीति आँटी की छत सबसे बड़ी है।"

"मुझे पता है," कहकर नेहा ने बेटे के सिर पर प्यार से हाथ फेरा।

आसमान में हल्के सफ़ेद-सफ़ेद रूई की तरह के बादल आ गए थे। जैसे धुनी हुई रूई रजाई में न जाकर आसमान में बिखर गई है। या कि सूरज ने भी पतली जयपुरी रजाई बनवाने की सोची है और अभी वह इस रूई के साथ आँख-मिचौली खेल रहा था। पल में धूप, पल में छाँव। पल में शाल कन्धों पर और पल में घुटनों पर आ रहा था। अभी ठिठुरती सर्दियों के वे दिन नहीं आए थे। जब कड़ाके की ठण्ड में सूरज भी छुट्टी मार जाता है। या बड़े बेमन से एक बार झाँक कर पूरे दिन की हाज़िरी लगा जाता है। आसमान में उड़ने वाले रंग-बिरंगे पक्षी ज़मीन पर उतर आने लगे थे। वे बैठी उन्हें ही निहार रही थीं। सर पर लाल टोपी पहने पीले कोट वाला वुडपिकर अपनी मोटी तेज़ मज़बूत चोंच को दायें-बायें घुमा-घुमा कर ज़मीन पर पड़े पॉप कार्न के दाने उठा रहा था। ज़मीन पर पड़ी चीज़ को उसका इस तरह उठाना अजीबोगरीब तो था पर दिलचस्प भी था। मोबी को अन्दर कमरे में बंद कर दिया गया था। वरना इन पक्षियों की ख़ैर नहीं थी। तपिश मोबी को अन्दर ले गई थी। थोड़ी-थोड़ी देर में वह जाली वाले दरवाज़े के पीछे आकर अपना ग़ुस्सा ज़रूर निकाल कर बता जाती थी कि ये घर मेरा है। जब पार्वती ने लोहे के गेट को हाथ ही लगाया मोबी दरवाज़े के पीछे कूद-कूद कर नाचने लगी थी। उसकी पूँछ तेज़ी से दायें-बायें हो रही थी। पार्वती ने घरघराती आवाज़ में कहा – "हाँ हाँ आ रही हूँ"। सुमित्रा कुमारी के मुख पर छाई मनहूसियत भी सिमट कर एक कोने हो गई। पार्वती ने घुटनों पर पड़ी शाल को उनके कन्धों पर खोल को डाल दिया। "अरे हवा में काये बैठी हो। हाथ पाँव जकड़ जावैंगे।" वे व्हील चेयर पकड़कर अन्दर ले जाने की कोशिश करने लगी तो सुमित्रा को फिर से शेखर की याद आ गई।

"अरे जे प्लेट ऐसे कैसे है गई?” पार्वती जी ने नीचे पड़ी प्लेट को उठाया। ऐसे लग रहा था जैसे किसी भारी सी चीज़ से उस प्लेट को ख़ूब दबाया या कुचला गया है। जिससे अब वह काम में लेने लायक़ नहीं रही थी। सुमित्रा देवी ने उस प्लेट की ओर देखा भी नहीं। इसी में तो सुबह नीलम ने उनके लिए खिचड़ी डाली थी।

◘ ◘ ◘

आज फिर से गुनगुनी धूप खिली थी। काम ख़त्म करने के बाद पार्वती ने मैडम का लाया गाढ़ा लाल तेल उठा लिया और बाहर आ गई। बाल बिखरे थे। कपड़े गीले थे। पर पहले अम्मा की मालिश कर दे तब नहाने-धोने की सोचेगी। सुमित्रा देवी अपनी व्हील चेयर पर यूँ तो बाहर थीं पर उनके हाथ टाईम मशीन लग गई थी। तो जब-तब वे जहाँ चाहती वहीं पहुँच जाती। या कुछ था जो उन्हें खींच कर अपने साथ ले जाता था। पार्वती ने उनके सामने छोटे मुड्डे पर बैठते हुए जैसे ही उनके घुटने पर हाथ रखा तो वे चौंक कर जागी। फिर से उनकी आँखें नम थीं। 

"इस सबसे कुछ ना हो ही है।"

"अरै अम्मा आप क्यूँ हिम्मत हारो।"

कहते हुए पार्वती ने उनकी पतली सीखचों जैसी टाँगों को जो अनावृत किया। बुढ़िया एक दम से हड़बड़ा गई।

"अरे-अरे यहाँ... नहीं।"

"थोड़ी धूप तो लगन दो यान पै।"

बड़ी हिम्मत सी करके उन्होंने आसपास देखा। चारों ओर दूर-दूर तक कोई नहीं था। होता भी तो यहाँ घर के पिछवाड़े उन्हें देखने कौन आने वाला था। वैसे भी न जाने कैसे मनहूसों की बस्ती है। "ये बस्ती नहीं है अम्मा! ये सोसाइटी है।" पिछली बार जब वे यहाँ आईं थीं तो उनके ऐसा कहने पर बेटी ने समझाया था। सच में यह बस्ती हो भी कैसे सकती है। यहाँ सब आँखों पर काला चश्मा चढ़ाए रहते हैं जिससे उनका शरीर तो बाहर सड़क पर डोलता–गुज़रता नज़र आ जाता है पर वे ख़ुद ग़ायब रहते हैं। होंठ बुदबुदाते हैं "हेलो" पर उनका साथ देने को आँखें वहाँ मौजूद नहीं होतीं। ऐसा लगता है मरे हुए शरीर अपना-अपना क़ब्रिस्तान ढूँढ़ते डोल रहे हैं। उसके मुक़ाबले वहाँ सिवान में उनकी बस्ती।

 "का अम्मा ऊँहा रहुओगी, हमऊ का मरि गए। बरसों बरस सेवा कीन्हीं है सो अब भी करिहौं। 

“...बाबा कितना भरोसा किए रहे। तुमऊ भरोसा तो करो।"

“...का अम्मा, बेटी का खाआओगी, दामाद पै सेबा कराओगी।" 

शेखर के जाने के बाद नीलम से कैसे बहस की थी बस्ती वालों ने।

"तुम तनिक बिस्वास तो करौ बिटिया। जे तुम्हारी अम्मा हमाऊरी भी कुछ लगती हनि।"

वे बस्ती गाँव के लोग, वे कम पढ़े-लिखे लोग, वे छोटे और ग़रीब लोग, वे धीमे चलने और सोचने वाले लोग, वे भरपूर भावनाओं से भरे लोग बहुत प्रैक्टिकल नहीं थे। वे भविष्य को नहीं देख पाए और अन्तत: सुमित्रा को अपनी इस बीमारी के चलते दिल्ली आना ही पड़ा। कितना कठिन था यह सब। 

सुमित्रा मालिश के बाद धूप में वहाँ ऊँघती सी अधलेटी थी कि उनकी नज़र ऊपर को गई और एक पॉपकार्न हवा में तैरता हुआ आकर उनके ऊपर गिरा। वे ग़ौर से देखने लगी अरे... यह कहाँ से आया कि इतने देर में एक और गिरा। वे सोचने लगी कि हाँ कल भी यहाँ कुछ पॉपकार्न के दाने गिरे थे। कल तो इस बात पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। पर आज उनका ध्यान गया। ऊपर फ़स्ट फ़्लोर वालों की बालकनी थी। वहाँ कभी कोई नज़र नहीं आया था। कभी कोई आवाज़ भी सुनाई नहीं देती थी। 

सहसा एक मासूम हाथ मुट्ठी बाँधे बालकनी के नीचे से भरपूर बाँह पसार बाहर की ओर निकला और हवा में तैरता हुआ एक पॉपकार्न फिर सुमित्रा देवी के ऊपर आ गिरा। उन्होंने झटके से अपनी साड़ी को घुटनों से नीचे कर लिया। वे उस हाथ को ध्यान से देखने लगी। कलाई में चाँदी के घुँघरू वाला काला धागा बँधा था। मुश्किल से एक पॉपकार्न से वह मुट्ठी फूलकर तन जाती कि जैसे सारी दुनिया भर की ख़ुशियाँ उसमें समा जाती हों और वह उसे सुमित्रा देवी के ऊपर उड़ेल देती थी। एक बालिका ऊपर बालकनी में बिछी दरी पर पेट के बल पसरी हुई थी। इस बालकनी के चारों ओर मुँडेर बनी थी जिसके कारण उस डेढ़-दो फुट की बालिका के लिए बाहर या नीचे झाँकना संभव न था। बालकनी और मुँडेर के नीचे लगभग चार-पाँच इँच की जगह, जगह-जगह से छोड़ दी गई थी। यही वह जगह थी जहाँ से वह बाहर की दुनिया से संपर्क साध सकती थी। तो वह वहाँ से लेटकर बाहर देख रही थी। पर ठीक नीचे से आती आवाज़ें उसे नीचे भी किसी दुनिया के होने का एहसास दिला रही थी। उस दुनिया से संपर्क साधने को वह उस चार-पाँच इँच के गैप से गर्दन तो नहीं ही निकाल सकती थी शायद एक दो बार उसने प्रयास भी किया हो। अब वह उस गैप से हाथ निकाल कर पॉपकार्न के बहाने नीचे की दुनिया में अपने संकेत सूत्र भेज रही थी कि क्या कोई वहाँ है? और अगर कोई वहाँ है तो उसे जानना चाहिए कि यहाँ भी कोई है। वह इत्मिनान से एक-एक करके इतनी साधना के साथ पॉपकार्न नीचे गिरा रही थी कि जैसे यह कोई बड़ा ज़रूरी और विशेष काम है जो उसे सौंपा गया है और उसे पूरी ईमानदारी से इसे अंजाम देना है।

नीचे पार्वती अम्मा तो सुमित्रा देवी के घुटनों की मालिश कर कब की भीतर जा चुकी थीं। बाहर एक के बाद एक गिरते पॉपकार्न को खाने के लिए दो गिलहरियाँ इकट्ठी हो गईं थी। एक पॉपकार्न का टुकड़ा उठा कर अपने दोनों पिछले पैंरो पर वे ऐसे बैठ जाती जैसे किसी मुड्डे या चौकी पर बैठी हों और अपने अगले दोनों पंजों से उस पॉपकार्न को खुदा की नेमत की तरह कुतर-कुतर कर खा रही थी। अब सुमित्रा देवी से उन्हें कोई भय नहीं होता था। शायद अब वे वहाँ के माहौल का ज़रूरी हिस्सा हो गईं थीं। बच्ची अनंत में अपना संदेश डाल तो रही थी पर उसके जवाब के प्रति ज़रा भी जागरुक नहीं थी। क्योंकि यहाँ से दोनों गिलहरियाँ चिक-चिक करके उसका धन्यवाद व्यक्त कर रही थी। सुमित्रा देवी मूक होकर जीवन के सुन्दर नर्तन को देख रही थी।

◘ ◘ ◘

इधर चार बजे ही थे कि सुमित्रा देवी कुछ बेचैन सी होने लगी। काम में लगी इधर-उधर आती-जाती पार्वती को देखकर आख़िर उन्होंने कह ही डाला। 

"आज बाहर घूमने नहीं चलना क्या?”

"अरै इत्ती काहे उतावली दिखाओ अम्मा। मैडम जी तो साढ़े पाँच से पहलो कब्बी ना आत्ती।"

"और रास्ते में कोई मिल गया तो?”

"कौन मिल जईहे, आप तो दूर तैई कुर्सी मुड़वा दओ।"

सुमित्रा को किसी से मिलना बहुत पसंद नहीं रह गया था। यूँ तो वे कुल जमा पाँच फुट की भी नहीं थी पर व्हील चेयर तो उन्हें और भी बौना बना देती थी। आस-पास चलते लोग उन्हें अपने सर पर चलते-फिरते महसूस होते। वे सबके बीच, सबके नीचे दबती चली जाती। ये तो नीलम की ज़िद थी कि अम्मा उसे लेने मैट्रो तक आए और वहाँ से वह ख़ुद अम्मा की व्हील चेयर चला कर लाती। पार्वती कितना कहती मैडम आप थक गई होंगी। पर नीलम अम्मा के पीछे खड़ी हो उन्हें अपने आगे चलाना चाहती थी।

सुमित्रा को घर के बाहर छोड़ पार्वती मोबी को घर के अन्दर बंद करने चली गई। सिर पर टोपी, पाँवों में मोजे और गर्म शाल से चारों ओर से दबी-ढकीं सुमित्रा जी आसपास गुज़रते लोगों से बेख़बर सी थीं कि एक अनजानी औरत प्रैम में छोटे बच्चे के साथ वहाँ से गुज़री। सुमित्रा देवी उससे भी भरपूर बेख़बर होना चाहती थी पर उस औरत के पैरों में बिछुए और आलते की झलक ने सुमित्रा की आँखों को बाँध लिया। जब से हाथों और पैरों के गठिया ने उसे गठरी सा बना लिया था तब से उन्हें आँखों से ज़्यादा सूझने लगा था। कानों से बराबर सुनने लगा था। वे सामने से आती उस औरत के पैरों की ओर देखने में इतनी मशग़ूल हो गईं कि सामने प्रैम में बैठी बच्ची ने इसे अपनी अवहेलना समझा। 

"ऐ...ई... फुफ्फू.…”

उसने अपना हाथ उठाकर प्रैम के सामने लगे हत्थे पर बजाया। सुमित्रा के आँखों में चाँदी के घुँघरू चमक उठे। काश के उन्होंने भगवान से इतनी शिद्दत से पहले भी कुछ माँगा होता। औरत प्रैम को लेकर सामने से मुस्कुराती हुए निकल गई। “नहीं न बिटिया फुफ्फू तो गाँव मैं होई।” सुमित्रा की ओर देखकर वह माफ़ी की सी मुद्रा में झुक सी गई। पर सुमित्रा जी की तो आँखें उस चेहरे पर टिकी थीं जो अब अपनी प्रैम के बाईँ ओर से लगभग बाहर लटक कर पीछे मुड़ कर देख रहा था। काले घुँघराले चिकने बाल गोल-गोल छल्लों से उसके माथे और गालों पर भी लटक रहे थे। हलके साँवले रंग की बायें गाल पर गड्ढे वाली उस बच्ची को देखकर सुमित्रा जी की उस खोज को विराम मिल गया जिसमें उन्हें लगता था कि राधा हर हालत में साँवली ही रही होगी। साँवले कन्हैया की साँवली राधा। पर वह कैसी होगी जब वे इस बारे में सोचती तो उनके दिमाग़ में कोई चेहरा न बनता पर आज इस बच्ची को देखकर जैसे उनके मन कहा कि यही तो राधा है।

"ये अपने ऊपर वाले घर मैं कौन रहतु हो बिटिया?” रात में सुमित्रा देवी ने नीलम से पूछा। 

"ऊप्पर वाले घर माँ.. अञ्जू हो अम्मा। किराये पै रहति बानि।.. कुछ बात भई का..” 

उधर दूसरे कमरे में, तपिश ने पूछा, “व्हेवर इज़ योर मदर।"

"यू डोन्ट नो, इवन आइ डोन्ट नो…”

"इज़ देयर एनि प्रोबलम विद यू... व्हाए यू साउंड लिटिल एनॉएड..”

तपिश पिछले एक महीने से घुल रही थी। उसे लग रहा था कि कोई बड़ी से लहर सुनामी सी उठी है और बिना आवाज़ किए, दूर तक सब कुछ अपने भीतर समेटती हुई आगे बढ़ रही है और वह प्राण बचाने को जी जान से भाग रही है। वह बार-बार मुड़-मुड़ कर पीछे देखती है तो लगता है कि जितना वह आगे भागती है उतना ही लहर आगे बढ़ आती है। अब तो उसे यह लगने लगा है कि जितना वह आगे भाग कर अपने बचाव के लिए जगह बनाती है उतना ही लहर आगे बढ़कर उस जगह को अपने कब्ज़े में ले लेती है। जैसे उसके और लहर के बीच कोई आमने-सामने की लड़ाई चल रही है। उसने ठान लिया है कि अब वह और डर कर भागने वाली नहीं और कमाल की बात लहर भी वहीं थम गई है । पर पूरी तरह से मुस्तैद...।

"लिटिल..? नोट मच-मच,” उसने ग़ुस्से में फुफ्कारा।

"ओह माई लिटिल प्रिन्सिस.. वट हेप्पन्ड टू यू?... “

मनोज ने अपनी राजकुमारी को उसके पास बैठ अपने घुटने पर लिटा लिया। तपिश टुकड़ों-टुकड़ों में बह निकली। 

"देयर इस नो बॉडी फ़ोर मी...। मोम ऐंड हर मोम... द होल वर्ल्ड इज़ फ़ोर देम। ‘पार्वती जी अम्मा का पानी गरम हो गया.....’ ऐंड वट अबाउट माई ब्रेकफ़ास्ट.... उसने हाथ झटक दिए। पार्वती जी अम्मा को पपीता ज़रूर खिला देना, पार्वती जी अम्मा को तेल मालिश ज़रूर करनी है आपको।’ मोम इस आलवेज़ इन हरी... देयर इज़ मेनी प्रोजेक्ट फ़ोर हर इन द ऑफ़िस ऐंड घर में ग्रैनी इज़ द ओनली प्रोजेक्ट। आइ हेव नोट ऐनि पर्सनल स्पेस... माई ऑल ट्वाएज़ बिकेम होमलेस... शी इस एक्सपेकटिंग फ़्रोम मी आइ’ल डू आल हाउस होल्ड वर्क विद माई ऑन।... इस देट फेयर...?”

और भी बहुत कुछ था जिसे वह कहना चाहती थी। पर उसे नहीं पता था कि कैसे कहे। मोबी बैठी चुपचाप उसका रोना देख रही थी। या शायद सोच रही थी कि क्यों न वो भी डैडी के दूसरे घुटने में घुस कर सो जाए। वह ज़ोर-ज़ोर से पूँछ हिला-हिला कर कूँ-कूँ कर रही थी। आजकल उसे भी रोटी तपिश ही दूध में भिगो कर देती थी। यही वह उसका आज का हाउस होल्ड वर्क था जिसका उसने अभी ज़िक्र किया था। दिन भर की थकी थी। आजकल अपना बहुत सा काम उसे ख़ुद करना पड़ता था। कम से कम उनके लिए एलर्ट रहना पड़ता था कि वे हुए या नहीं और अगर नहीं तो समय रहते उन्हें किसी भी तरह पूरा करना पड़ता था। इससे उसका दिमाग़ काफ़ी थक जाता था। अब तक उसे पता ही नहीं चलता था कि उसके कपड़े कब धुलते हैं? कौन धोता है? और कौन उन्हे प्रैस कर उसकी न केवल अलमारी बल्कि पहने जाने से पहले उसके बिस्तर पर तैयार लगा देता है? कौन उसका बिस्तर लगाता या उठाता है? कैसे उसकी हर चीज़ साफ़-सुथरी तराशी हुई तरोताज़ा सी उसे मिल जाती है? उसे याद है कि जैसे इंस्ट्रेक्शन अब मम्मी नानी के बारे में पार्वती अम्मा को देती रहती हैं वे सारे इंस्ट्रेक्शन पहले उससे संबंधित हुआ करते थे। पूरे घर में अब तक जो वाक्य घूमते थे वे यही थे "तोपू बेटा फ़िनिश योउर डिनर? व्हेयर इस योअर सोक्स, पुट योअर थिगंस ऑन राइट प्लेस।" वह अपने किसी काम में लगी होती तो मम्मी ख़ुद अपने हाथों से उसके मुँह में खाना डालती जाती। वह बस, बस करती और वे एक और... एक और ... करती जाती। 

मनोज ने देखा तपिश सो गई है। सामने मोबी भी अपने लिए बनाए बिस्तर में घुस कर सो चुकी है। उन्होंने तपिश का सिर उठाकर नीचे तकिया लगा दिया। चारों ओर से कस-कस कर रजाई दबाकर उसके माथे पर हाथ फेरने लगे। यह क्या तपिश ने उनका हाथ पकड़कर कर अपने गाल के नीचे दबा लिया। मतलब था कि अभी मैं सोई नहीं हूँ। मनोज अख़बार लेकर वहीं बैठ गए। आज तपिश नीचे गद्दा बिछा कर सोई थी। जानती थी कि आज पापा आ गए हैं तो बेड रूम में उसके लिए जगह नहीं हो पाएगी। यह उसका स्टेडी रूम था। थोड़ा छोटा था जिसमें रात में नीचे तो बिस्तर बिछाया जा सकता है पर दिन में उसे उठा देना ज़रूरी है। यह भी एक काम है जो तपिश के लिए बढ़ गया है। अख़बार बेशक आगे फैला था पर मनोज अख़बार में नहीं थे। अख़बार में एक खिड़की है जिसमें से वे अपने अतीत में झाँकने लगे थे। उस खिड़की पर लिखा था ‘बीकानेर में दलित दूल्हे को घोड़ी से गिराया गया।"

◘ ◘ ◘

सुमित्रा देवी बाहर अपनी व्हील चेहर पर बैठी इंतज़ार कर रही थीं। घर में कोई नहीं था इसलिए पार्वती घर में ताला लगा रही थी। काव्या की माँ उसे नीचे सुमित्रा देवी के पास छोड़ वापस ऊपर उसका प्रैम लेने चढ़ी थी। असल में ये दोनों का ईवनिंग टाईम था जिसके लिए दोनों सड़क के पार वाले बड़े पार्क में जाती थीं। काव्या के आने से पहले जब नीलम ज़बरदस्ती उन्हें पार्क में जाने के लिए कहती तो वे हमेशा टालती रहतीं। "मैं वहाँ क्या करूँगीं।" नीचे पड़ी और गिरी चीज़ों के प्रति लोगों का रवैया उन्हें अपने लिए महसूस होता। उन्हें लगता कि वे एक चला हुआ कारतूस हैं, एक खाली खोल जिसे झाड़ू से बुहार कर साइड में कर दिया गया है। इसीलिए अगर वह पार्वती जी के साथ पार्क चली भी जाती थीं तो सबकी नज़रों से दूर किसी कोने में ही रहती कि जिस से किसी की उनपर नज़र न ही पड़े तो बढ़िया। पर जब से काव्या आई थी तब से उन्हें अपने ही बराबर का एक साथी मिल गया था। दोनों की सवारियाँ एक साथ निकलतीं। ज़रा भी उनकी सवारी अगर पीछे रह जाती तो काव्या मुड़-मुड़कर उन्हें देखने लगती। "रुक्को..रुक्को..." कहकर वह अड़ जाती और पीछे पलट-पलट कर आवाज़ लगाती। "फुफ्फू... फुफ्फू... आजा... आजा..." 

पार्वती जी पीछे से कहती– "तेरी मय्यो तो जवान हैगी भैय्या हम कित्तो दौड़ सकै हैं।" फिर बराबर पहुँच कर पार्वती जी ज़ोर से उसे धप्पा कर देती तो वह आगे अपनी माँ को आदेश पारित करती– “चलो” उसका एक हाथ सुमित्रा देवी की चेयर पर रहता जिससे वे उसे छोड़कर न जा सकें। 

इस समय काव्या ने एक कटोरी में मूँगफलियाँ डाली हुईं थीं। उसने कटोरी सुमित्रा जी की गोदी में रख दी और एक मूँगफली को लेकर अपने आगे के चार दाँतों से तोड़ने लगी। बहुत प्रयास करने के बाद भी वह उससे दाना नहीं निकाल पा रही थी। इस मशक़्क़त में वह मूँगफली नीचे ज़मीन पर गिर गई। वह उसे उठाने को नीचे झुकी ही थी। 

"अरे नाहीं राधा बिटिया, ओकर नाहीं उठाओ अब्ब।.... ये लो ये दूसरा ले लो.." उन्होंने अपनी ही झोली में रखी उसकी कटोरी से एक मूँगफली को उठाया और उसकी ओर बढ़ा दिया। 

"औ देखो काब्या बिटिया तनिक ईंहा देखो, ई तुम्हारी कटोरी तो ईंहा है," काव्या ऊपर उठी और उसने सुमित्रा के हाथ की तरफ़ अपना हाथ बढ़ाया। पर यह क्या उसने मूँगफली की जगह उनका ठूँठ सा हाथ पकड़ लिया। सुमित्रा को काटो तो खून नहीं। उसने झटपट अपना हाथ छुड़ा कर अपनी मुचड़ी हुई साड़ी के अन्दर छिपा लिया। उन्होंने इधर-उधर देखा कोई नहीं था। पर काव्या तो चिल्लाने लगी। “बो चईये... बो चईये..” जैसे उसका कोई खिलौना सुमित्रा देवी ने अपनी झोली में छिपा लिया जो उसे वापस चाहिए।

"अरे का चाईये तुझे?" उसकी माँ उसका सारा सामान ले नीचे आ गई थी। वह उसकी सवारी को सँवारने लगी थी और ज़बरदस्ती उसे उठाकर उसकी प्रैम में बैठा दिया। पार्वती भी घर को ठीक-ठाक से बन्द करके आ गई और दोनों सवारियाँ अपनी यात्रा के लिए निकल पड़ी। 

पूरा एक डेढ़ घण्टा पार्क में बिताने के बाद दोनों सखियाँ वापस लौट रही थीं। बहुत सारे फूल, बहुत सारी पत्तियाँ जो भी उसे क़ीमती लगता, काव्या ने ला लाकर सुमित्रा देवी की झोली में भर दिया था। वे उसे नेमत की तरह सँभाले थीं। वह चलना सीख चुकी थी पर पार्क में जाकर उसे जब भी प्रैम के बाहर निकाला जाता वह सुमित्रा देवी की चेयर पकड़ कर ही खड़ी होती। वे तो अपनी गाड़ी में बैठी ही हैं अगर वह उसे पकड़ कर नहीं रखेगी तो वे अपनी गाड़ी चलाकर उसे छोड़कर भाग जाएँगी और तब बेचारी काव्या क्या करेगी। काव्या उनकी चेयर से ज़्यादा दूर न जाती रास्ते में उसे जो मिलता उसे उठाकर उनकी गोद में रखती जाती। काव्या को सुमित्रा देवी के साथ छोड़ कर उसकी माँ भी थोड़ा निश्चिंत हो जाती। 

"अरे अम्मा अभई थोड़ी ठण्ड बा, तनिक शाल तो ओढ़ लो," रास्ते में नीलम मिल गई। पार्वती जी ने सुमित्रा देवी की बागडोर नीलम को सौंप घर की राह ली। 

“नमस्ते दीदी,” काव्या की माँ ने कहा। 

“अरे भैय्या ये तुम्हारी राधा तो हमारी अम्मा की जान है,” कहकर उन्होंने काव्या की ओर हाथ बढ़ाया “हेलो बेबी!”

"आण्टी से हेलो करो बेटा," काव्या ने भी अपना छोटा सा हाथ आगे बढ़ा दिया। 

"हाऊ स्वीट बेबी!" अब उस स्वीट बेबी ने अपनी आदत के अनुसार अपना हाथ सुमित्रा देवी की ओर बढ़ा दिया और अपनी प्रैम से लगभग उनकी व्हील चेयर में लटक कर वह ज़बरदस्ती उनका हाथ ढूँढ़ने लगी। जब सबके हाथ होते हैं तो फुफ्फू के भी तो होंगे।

"ये फुफ्फू कौन हैं आपके यहाँ?" नीलम ने पूछा।

"हमारे हसबेन्ड की विधवा बुआ हैं गाँव में हमारे ही साथ रहती हैं, काव्या उन्हीं के साथ रहती है। अपनी अम्मा की तरह दुबली-पतली हैं तभई तो काव्या अम्मा से इतनी हिल मिल गई है।" 

"ओह अच्छा... तभी।" घर दोनों बाहें पसारे उनका आह्वान कर रहा था। सुमित्रा और नीलम उसमें समा गईं। काव्या और उसकी ममा भी ऊपर अपने घर में चली गईं।

"बिटिया मरे बाद दामाद का हाथ लगने से अपशगुन होता है।" मरने से ज़्यादा बड़ा अपशगुन और क्या ही हो सकता है उसने नहीं पूछा था। वह इस वाक्य का बोझ लिए अभी कमरे में दाख़िल ही हुई थी कि "तुम्हें तपिश को भी थोड़ा टाईम देना चाहिए।" एकदम ठण्डा, शान्त बहुत सहजता से बोला गया एक और वाक्य, इस पहले वाक्य से गुत्थमगुत्था हो गया। उसे याद आया कल से मनोज को फिर एक महीने के लिए अपने अगले प्रोजेक्ट पर निकल जाना होगा। नीलम एक-एक करके उनकी सारी चीज़ें पैक करने लगी। पिछले एक हफ़्ते में उसकी ठीक से मनोज से कोई बातचीत ही नहीं हो पाई थी। हर कोशिश में उसे लगता जैसे वह कोई सफ़ाई दे रही है। दिमाग़ में कोई मुक़दमा लड़ा जा रहा था। असल में बात करने का समय ही कहाँ था। शाम में ऑफ़िस से आने के बाद माँ को समय देना उनके साथ बातचीत करना उनका पूरा दिन सेट करना उसके लिए इतना ज़रूरी था कि वह बाक़ी सब कामों को भागते-दौड़ते ही निपटा पाती थी। लेकिन क्या सचमुच बात करने का समय ही नहीं था या कुछ और...। उसकी आँखें सूनी सी दीवार को ताकने लगीं।

“तुम्हीं हमार बेटवा रही और तुम्हीं हमार बिटिया अब और का कहिं, जौन तुहार मर्जी हो करौ बिटिया पर हमई तो मजबूर भईं,” सुमित्रा देवी सिंह का दो टूक निर्णय था। 

"घर तुम्हारा है सिर्फ तुम्हरा, यहाँ तुम कभी भी आ सकती हो।" शेखर प्रताप सिंह ने कुछ राहत देते हुए कहा था। अगर नीलम का कोई एक भी भाई या बहन और होता तो शायद वह मनोज को बचा ले जाती पर उसका समय-समय पर गाँव जाना मनोज को सागर सा गंभीर और शान्त बना देता। वह आकर उफ़नती नदी सी उसमें समाना चाहती पर वह बाहें फैलाना भी भूल जाता। पीढ़ियों का घाव हरा हो जाता। न जाने कब से तपिश के भीतर भी वह घाव पकने लगा था। बच्ची नहीं थी वह। छुट्टियों में नानी के घर जाने का रिवाज़ उसे भी मालूम था। 

जब से माँ आईं थीं तब से मनोज के एक के बाद के टूर हो रहे थे। वह भी इसी तरह जल्दी–जल्दी तत्परता से उनका सामान पैक कर देती थी जैसे यही चाहती हो। बस एक ही चिन्ता पीछे से मनोज को परेशान करती। इसीलिए उन्होंने बहुत ही शान्त आवाज़ में धीरे से सहजता से कहा था कि “...तपिश का ध्यान...” बैग की चेन बंद करके जब नीलम ने सिर ऊपर उठाया तो उसकी आँखें नम थीं। पर क्यूँ? वह नहीं सोचना चाहती। 

आजकल सुमित्रा देवी बहुत ख़ुश हैं। काव्या का पहला जन्मदिन आने वाला है। उसके लिए कुछ लेना है। क्या ख़रीदे उसके लिए? क्या दे उसे? बड़े अरमान दबाए हैं वे अपने भीतर..., अब उन्होंने अपने हाथों को साड़ी के पल्लू के नीचे छिपाना छोड़ दिया है। काव्या मूँगफली का एक-एक दाना उनकी हथेली पर रखती है और उसके "खाओ" बोलते ही दूसरे हाथ की दो उँगलियों से साथ कर उसे उठाकर मुँह तक लेके जाती हैं। उसके बाद काव्या अपनी हिस्से की मूँगफली खाती है। जब वे दोनों साथ होतीं तो भूल ही जातीं कि और भी दूसरे कोई और भी उनके आसपास हैं। आज उन्होंने नीलम के साथ जाकर काव्या के लिए छोटी-छोटी चाँदी की पायल ख़रीदने की सोची है। अपने पैसे से। सुनार के पास उन्होंने न जाने कितनी पायल देख-देखकर ढेर लगा दिया। एक पायल पसंद करने में इतना टाईम। 

"अम्मा इत्ती बड़ी-बड़ी पायल काहे देख रही हो, ये कहाँ आईहें उस छटंकी को।" नीलम का मन न जाने कैसा अजीब सा हो रहा है, शायद उसकी तबीयत ठीक नहीं है। भीतर बहुत भारी-भारी हो रहा है। वह चाहती है कि वाशरूम में जाकर हलक में उँगली डालकर एक बार उल्टी कर डाले तो शायद जी कुछ हल्का हो जाए। कितना कहा नीलम ने पर पेमेंट के समय सुमित्रा देवी ने उसे बाहर भेज दिया। वह भी कुछ ताज़ी हवा में आना चाहती थी इसलिए चली ही आई। आते हुए नीलम ने रास्ते में तपिश के लिए उसकी फ़ेवरेट दुकान से मोमोज़ ख़रीदे। बारबेक्यू मोमोज़, फ़्राइड मोमोज़, मलाई मोमोज़, सच अम्मा के आने के बाद उसने तपिश का ध्यान रखना ही छोड़ दिया। अम्मा तो काव्या के यहाँ चली जाएँगी। उन्हें भूख नहीं और तपिश के लिए यह हो जाएगा।

यूँ वह सीढ़ियाँ बहुत खुली जगह में बनी थीं। एक साथ दो लोग भी चढ़ और उतर सकते थे। पर आज सुमित्रा देवी को उनकी व्हील चेयर सहित ऊपर चढ़ाना उन लोगों के लिए भारी हो रहा था। उस व्हील चेयर का बोझ ही अपने आप में बहुत भारी हो रहा था। सीढ़ियों पर शोर सुनकर सुरेन्दर बाहर निकल आया।

"अम्मा आप ये कुर्सी पकड़ लो बस, और अम्मा आप इधर आओ,"  कहते हुए सुरेन्दर ने सुमित्रा देवी को झटके से अपनी गोद में उठा लिया और जल्दी-जल्दी डग भरता हुआ ऊपर ले आया। सोफ़े पर बैठ वे सकपका गईं। यह सब इतनी तेज़ी से घट गया कि किसी को कुछ सोचने, कहने का मौक़ा ही नहीं मिला। और ठीक भी तो था। पीछे-पीछे पार्वती अम्मा उनकी व्हील चेयर लेकर कमरे में आ गईं। सुमित्रा देवी को न जाने कैसा-कैसा लग रहा था। कुछ अजीब सा। यहाँ शायद बहुत ठण्ड थी, उन्हें फिर से अपने सारे जोड़ जुड़ते और दुखते से महसूस हुए। हाथों-पैरों की उँगलियों में ऐंठन होने लगी थी। सुरेन्दर की उनसे कोई पहचान नहीं थी सिवाए इसके कि उन्होंने सुना था कि काव्या के पिता दो दिन पहले ही आए हैं। सुमित्रा देवी के यहाँ लोग इतने सहज विश्वसनीय नहीं होते। सुरेन्दर का इस तरह निसंकोच होना उन्हें बहुत बेचैन बना रहा था। जैसे कोई ज़बरदस्ती कहे मान न मान मैं तेरा मेहमान। अगर नीलम के दस साल बाद हुआ उनका एकमात्र बेटा ज़िन्दा रह गया होता तो इतना ही बड़ा न हुआ होता। उन्होंने स्वयं को शान्त करने के लिए सोचा "पर इससे क्या कोई पराया मर्द अपना बेटा जैसे कैसे महसूस किया जा सकता है। उसे कम से कम उन्हें बताना तो चाहिए ही था कि वह उन्हें इस तरह उठाने वाला है हो सकता है कि कुछ और उपाय सोचा जा सकता पर..."। वे अपने आप को वैसे ही छला हुआ महसूस कर रही थी जैसे कर्ण के व्यवहार पर परशुराम ने महसूस किया था।

"आज तो गज़ब, कोई नज़र न लगा दे मेरी राधा रानी को," सुमित्रा देवी कुछ सहज हुईं। गले में सफ़ेद फूलों की माला पहने, माथे पर रोली का सुन्दर गोल टीका लगाए, काव्या ने अभी कमरे में प्रवेश किया। वह सब के बीच इस क़दर घूम रही है कि जैसे उसे मालूम है कि आज उसका जन्मदिन है और उसे सबसे हँस कर मिलना चाहिए। सुमित्रा देवी की उँगलियाँ फिर से मचलने लगीं उसने सुन्दर सी डिबिया आगे बढ़ाई।

"एस.एस. ये पायल अम्मा लेकर आई हैं, काव्या के लिए," काव्या की माँ ने उसके पाँवों में वे चाँदी की पायल पहनाते हुए कहा। काव्या को भी जैसे मालूम है कि यह कोई बड़ा क़ीमती तोहफ़ा है जो उसे मिला है अपनी सबसे बेस्ट फ़्रेण्ड से। अब वह नीचे बैठ गई है और अपनी तर्जनी और अँगूठे के प्रयास से पायल के घुँघरू पकड़ने का प्रयास कर रही है। बच्चे अपना-अपना लाया खिलौना काव्या को देना और दिखाना शुरू कर चुके हैं। एक के बाद एक चीज़ उसका ध्यान आकर्षित कर रही है। वह सबको उलट-पलट कर देख रही है, बच्चों की जान साँसत में है, इतनी छोटी बच्ची को इतना अच्छा तोहफ़ा दिया जाता है कहीं, अगर तोड़ देगी तो। कुछ तो इसी डर से अपना गिफ़्ट उसे देना ही नहीं चाहते, बार-बार पीछे पलटते हैं और उनकी माताएँ या दीदियाँ मुस्करा कर उन्हें वापस ठेल देती हैं। 

"एस.एस तुम्हारा फोन बज रहा है। बाहर चले जाओ, अन्दर शोर है," अपने पर्स से फोन निकाल कर काव्या की माँ ने पति की ओर फोन बढ़ाया। कितनी चिल्लपौं मची है! 

"अरे भाई एस.एस. बोल रहे हैं सुरेन्दर सोनकर आप बताइए तो आप क..." कहते हुए सुरेन्दर बाहर बालकनी के बाहर निकल गए। जाली के बाहर से उनके हँसने और बात करने को सुमित्रा देवी ग़ौर से देख रही हैं। उनका सिर चक्कर खा रहा है। शरीर में अजीब सी तरंगें उठ रही हैं। अभी ठण्ड लग रही थी अब अचानक से गर्मी लगने लगी है। उनकी बढ़ती बेचैनी देख कर पार्वती ने कहा–

"लगता है अम्मा की तबियत ख़राब हो रही है। शायद साँस लेने में दिक़्क़त हो रही है।"

"अरे ये इतनी अगरबत्तियाँ किसने जला रखी हैं?" – 

"कुछ नहीं इतनी भीड़ है मन घबरा ही जाता है।"

"बुढ़ापे में इतनी चिल्लपौं कहाँ भाती है।" – "अम्मा ऐसे न जाइए, कम से कम केक तो...। आपकी राधिका ..." 

"कोई नहीं मैं तपिश को भेजती हूँ... अरे आप लोग परेशान न हों... बिटिया का पहला जन्मदिन है... मैं हूँ न मैं सँभाल लूँगी,।" कहते हुए नीलम ड्राइवर की मदद से सुमित्रा देवी को व्हील चेयर सहित नीचे ले गई।

कोई दो ढाई घण्टे बाद…

"नहीं पार्वती जी आप ठहरिये, मैं आपको छोड़कर आती हूँ।“

"तुम बैठो अम्मा संग। मैं चली जाऊँगी। पता नी किसकी नज़र लग्गी।..." सच में पार्वती सुमित्रा देवी को लेकर परेशान हो रही थी।

"अम्मा हम जैहें... तुम ठी...क हो?" सुमित्रा देवी ने गर्दन उसकी ओर घुमाई और इशारे से जाने को कहा। फिर कुछ याद आया। इधर-उधर देखने लगी। डब्बा ऊपर अलमारी में रखा दिखा। इशारे से कहा, "ले जाओ।" 

"मुझे भी मिला है।" उन्होंने झोले से अपना वाला डब्बा निकाल कर दिखाया। पार्वती जी को नीलम के कारण संकोच हो रहा है यह सोचकर उन्होंने नीलम की ओर देखा कि वह उसे कहे। नीलम का मुँह जैसे कड़वा हो आया। उसके चेहरे पर तनाव आ गया उस पर मुस्कुराने की चेष्टा में चेहरा जैसे विकृत हो गया। फिर भी बोली– "ले जाईये न पार्वती जी, वो क्या है न अम्मा बहुत मानती हैं आपको... इस टाईम... आप खा लीजिएगा बाक़ी बच्चे हैं न घर में," जैसे नीलम को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या बोल रही है। पार्वती जी ने डिब्बा ले लिया।

"सुबह जल्दी आ जाऊँगी।... अच्छा," कहकर वे बाहर की ओर निकल गई। घर में सब बड़े व्यस्त थे तो मोबी उन्हें छोड़ने गेट तक आई। पार्वती जी ने गेट हिफ़ाज़त से बंद कर दिया। वरना न जाने मोबी रात में कहाँ निकल जाए। कुछ देर तक नीलम चुपचाप माँ के हाथ पाँव मसलती रही, जब लगा अम्मा अब कुछ स्थिर है, शायद ठीक है... तो वह उठकर भीतर चली गई। कमरे में छोटी बत्ती जल रही थी। उसका मैला-पीला धुँधला प्रकाश कमरे में बीमारी की तरह फैला था। कमरे का भीतर वाला दरवाज़ा खुला था जिससे माँ की कोई भी आवाज़ नीलम तक पँहुच जाए। वह अपने कमरे में बैठी लैपटॉप पर कोई काम कर रही थी। कोई ज़रूरी प्रोजेक्ट था। पर मन उचाट हो चुका था। इस उम्र में बीमार माँ को किसके भरोसे छोड़ दे। जैसी भी है उसकी माँ है। पर न जाने क्यों वह आज भीतर से टूट रही थी। अपमान, ग़ुस्से और विवशता से तड़पती वह फफक उठी। आज तो मनोज भी नहीं। अच्छा ही है नहीं हैं; तो उसने सोचा उसका अपमान हो तो हो पर मनोज का अपमान वह कभी नहीं होने देगी। 

सुमित्रा देवी नींद में मुस्कुरा रही हैं। काव्या अपने छोटे- छोटे हाथों से उन्हें मूँगफ़ली खिला रही है। 

"खाओ... खाओ..." 

"अरी बिटिया तू भी तो खा... सारी हमईं खिला दई।" कभी दोनों की सवारी साथ-साथ निकल रही है। काव्या का चाँदी के घुँघरू वाला हाथ उनकी व्हील चेयर को थामे है। वह "हेलो" कर रही है उनके उस ठूँठ जैसे हाथ को पकड़ कर। यह क्या उनका हाथ तो ठीक हो गया। अरे उनकी सारी उँगलियाँ ठीक हो गईं। 

"अरे राधिका रानी... तुम्हारे हाथ में तो सच में जादू है!" अब काव्या बालकनी में खड़ी, उन पर फूल बिखेर रही है। वह खिलखिला रही हैं। इधर सुमित्रा देवी भी खिलखिला रही हैं। अरे ये कौन चला आ रहा है? गेट खोलकर ... अरे ये तो घर में घुसा चला आ रहा है। "ओ–हो कोई रोको इसे!" उन्होंने काव्या को अपने सीने से लगा लिया। वे छटपटा रही हैं। वे काव्या को लेकर भाग रही हैं। पर यह क्या काव्या ने तो ख़ुद ही अपने दोनों हाथ उसकी ओर बढ़ा दिए। 

"पापा-पापा!" वह उनकी गोद से नीचे उतरने को मचलने लगी। नीचे उतरते ही वह नीलम बन गई। फिर वही तपिश बन गई। ये क्या माया है? ये कैसी माया है…? उन्होंने घबराकर कान बन्द कर लिए। आँखें मूँद ली। वे ज़ोर-ज़ोर से साँस लेने लगीं।

काव्या को गए कोई दो महीने हो गए थे। मौसम बदल गया था पर सुमित्रा जी के दिल से उसकी याद न मिटती थी। पर फिर भी किसी से उसका कोई ज़िक्र न करती। जैसे अपनी सबसे क़ीमती चीज़ उसे देने को मजबूर हो गईं थी जिसके बारे में उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था। अब उनका उससे क्या लेना-देना? उनकी चीज़ गई तो गई। उन्होंने निर्ममता से सारे बंधन तोड़ लिए। वे अपनी शर्तों पर जीती आई हैं। वह तो इस बीमारी से मजबूर हो गई। वरना... ये उन्हीं के साथ बार-बार ऐसा क्यूँ होता है? उनका मन अब इस संसार से उखड़ चुका था। ऊपर वाले घर में भी फिर से सन्नाटा पसरा रहता था। काव्या की बुआ का तो वही सुबह सवेरे निकल जाना और रात गए लौटना। काव्या आई थी तो घर, घर जैसा लगता था। जैसे आस-पड़ौस से बातचीत का कोई सूत्र ही टूट गया। गर्मी काफ़ी बढ़ गई थी इसलिए अलबत्ता तो सुमित्रा जी घर से बाहर निकलती ही नहीं थी। और निकलती भी तो किसी से न मिलती। इधर नीलम भी यंत्रवत से उनके सारे काम निपटाती। उनकी सेवा और सुविधा में कोई कमी नहीं आई थी पर शायद भावना में कुछ परिवर्तन ज़रूर हो गया था। अब तपिश को माँ से उतनी शिकायत न थी। उसकी माँ, जो माँ के भीतर से निकलकर कहीं चली गई थी, अब उसकी माँ में लौट आई थी। पर यह माँ कुछ थकी हुई सी थी जैसे बहुत दूर तक चलकर गई तो पर काम पूरा नहीं हुआ और बीच में ही लौट आना पड़ा। यह माँ उस पर बहुत निर्भर रहने लगी थी।

"क्या हुआ पार्वती जी आप ठीक तो हैं?" साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछते पार्वती जी घर में घुसी तो नीलम घबरा उठी। 

"आप बैठिये, अरे तपिश ब्रिंग अ गलास ओ.. वाटर," उन्होंने तपिश को पुकारा। "आपके घर में..." पार्वती जी ने अपने आप को स्थिर किया। 

"घर में सब्ब ठीकै है मेडम जी, आपने काव्या की सुनी?" 

"काव्या की सुनी.. मतलब?" फिर न जाने किस आशंका से उनका मन काँप उठा। 

"काव्या का क्या पार्वती जी... काव्या का..." 

"हैजा है गया मेडम जी बो तो गई.. मेडम जी बो तो गई," उनकी आँखें फिर से भर आईं। 

“कब?” 

"चार दिन से अस्पताल में थी, कल रात ही... ऊपर वाली मेडम सुबह-सुबह निकली गाँव के लिए। वही चौकीदार को बता कै गई।" पार्वती जी ने अपना सारा शोक नीलम के ऊपर डाल दिया। वे तो वहाँ से उठकर अपने काम में लग गई पर नीलम वहीं बैठी कि बैठी रह गई। न जाने क्यूँ पिछले दो महीने से काव्या नीलम के भीतर बस गई थी। जैसे उस पर वही कहानी दोहराई गई थी जो उसकी अपनी कहानी थी। उसे ऐसा लगता था। संसार में हर बीमारी का इलाज है। समय बड़े से बड़े घाव को भर देता है। पर शायद माँ के कोढ़ का कोई इलाज नहीं। उस मासूम लड़की को माँ ने अपने कोढ़ी हाथों से छू जो दिया था। वह कैसे बच सकती थी। माँ के ठूँठ से हाथ, उनके ख़ूब-सूजे ऊभर आए जोड़ उनकी आँखों के सामने घिन्नाने लगे। वह झटके से उठी और माँ के कमरे में पँहुची। आज सारा हिसाब-किताब बराबर कर देगी। अपने बाजू उठाने का दम नहीं और ब्रह्मा के बाजू से पैदा होने का इतना दंभ। पर माँ अब वहाँ कहाँ थी। एक हड्डियों का मुचड़ा हुआ सा पिंजर बिस्तर पर पड़ा था जिसके मुँह पर मक्खियाँ भिन-भिना रही थी। 

आज दिल्ली में जम कर बारिश हुई थी। अच्छी हवा चल रही थी। नहाकर आई तो सात बज चुके थे। हालाँकि अभी रोशनी बाक़ी थी। पीछे बाहर लॉन में कुर्सी डाल कर बैठ तो गए पर रह-रह कर अब भी बिजली चमक जाती थी। नीलम जैसे भीतर से बिलकुल ख़ाली हो गई थी। बिजली की चमक में वह ख़ालीपन उभर उठता था। पिता तो पहले ही चले गए थे, अब जैसे माँ के बाद जीवन की किताब के पिछले पन्ने फट कर अलग हो गए थे। उन पन्नों पर क्या लिखा था अब किसी को उसे पढ़ने की भी क्या ज़रूरत थी जब उसके लिए ही उसकी ज़रूरत ख़त्म हो गई थी। वह धीरे-धीरे अपने उलझे बाल सुलझाने लगी इतने में तपिश भी नहाकर आ गई। दोनों आज ही सिवान से माँ का काज-साज करके लौटी हैं। मनोज को वह जानबूझ कर नहीं लेकर गई। जिसने जीते जी अपनी दहलीज़ पर नहीं चढ़ने दिया मरने के बाद भी उसकी इच्छा को उन्होंने इज़्ज़त बख़्शी थी। आज मोबी के लिए बहुत अच्छा दिन था। सब घर पर एक साथ मौजूद थे। जैसे पुराने दिन लौट आए थे। वह बार-बार अंदर-बाहर हो रही थी। मनोज के बाहर आने के बाद वह भी आकर उनके साथ सट कर बैठ गई जैसे वह भी घर की कोई महत्वपूर्ण सदस्य थी। 

"ये देखो तोपू.." 

"वट्स दिस?" कहकर तपिश ने उस चमकती चीज़ को हाथ में उठा लिया।

"ये तो पायल है?” नीलम के मुँह से निकला तो जवाब, पर आँखों में ढेरों उम्मीदें लिये वह मनोज की ओर प्रश्नाकुल सी देखने लगी। 

"अम्मा के तकिये के नीचे मिली थी। पार्वती जी ने बताया कि तपिश के लिए अम्मा ने उसी दिन ख़रीदी थी जब काव्या के लिए ख़रीद कर लाई थीं। इसके जन्मदिन पर देने वाली थीं।" 

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