विशेषांक: दलित साहित्य

10 Sep, 2020

 केशव कहि न जाइ का कहिए

साहित्यिक आलेख | डॉ. आर.बी. भण्डारकर

दलित साहित्य!!! 

क्या है दलित साहित्य? ... सबसे पहले, बहुत पहले; जब मैंने यह शब्द-युग्म पहली बार सुना था तब मन में यह विचार कौंधा था कि "दलित साहित्य" नामकरण कहीं ऐसे साहित्य के लिए तो नहीं है कि जिसे साहित्य-जगत में कुछ कमतर माना गया हो या कि फिर जैसे प्राचीन साहित्याचार्यों ने साहित्य के जो विभिन्न भेद किये थे– उत्तम (ध्वनि काव्य), मध्यम (गुणीभूत व्यंग्य काव्य) और अधम (चित्र काव्य); तो आज के युग में कहीं ऐसा कोई भेद तो नहीं है यह दलित साहित्य। (क्योंकि तब साहित्य के किसी भाग के किसी जाति-समुदाय आधारित नामकरण की स्थिति मेरे मस्तिष्क में किंचित में भी नहीं आई थी। ) ...ख़ैर! थोड़ा अध्ययन करने पर यह भाव निर्मूल हो गया, संदेह तिरोहित हो गया। 

क्या है दलित साहित्य? क्या वह साहित्य दलित साहित्य है जो तथाकथित रूप से दलित कहे जाने वाले समुदाय के किसी व्यक्ति/किन्हीं व्यक्तियों द्वारा लिखा गया है या फिर वह साहित्य दलित साहित्य है जो तथाकथित दलित समुदाय के बारे में लिखा गया है, भले ही उसका रचनाकार/उसके रचनाकार कोई भी हों। 

अब, विचारणीय है कि दलित कौन है? तथाकथित रूप से एक विशेष समुदाय में डाला गया व्यक्ति या वह जो मनसा, वाचा, कर्मणा दलित है। 

इसके बाद चिंत्य यह है कि दलित साहित्य क्या है? फिर क्या वास्तव में साहित्य में "दलित चेतना", दलित विमर्श", "दलित साहित्य" जैसे किन्हीं शीर्षकों, विशेषणों की कोई आवश्यकता या औचित्य है? वैश्वीकरण और विश्वयारवाद के इस युग में क्या ऐसे शीर्षक चर्चा में रहने चाहिएँ?

विस्तार-भय से यहाँ मैं "दलित कौन" की चर्चा न कर सीधे "दलित साहित्य" अभिधान पर आता हूँ। जहाँ तक मैंने सुना और पढ़ा है और फिर जैसा मैं समझ पाया हूँ उसके अनुसार दलित कहे जाने वाले समुदाय के सदस्यों द्वारा प्रणीत साहित्य को ही दलित साहित्य नाम दिया गया है। मैंने पाया है कि कभी-कभी, कहीं-कहीं, किसी-किसी ने दलित समुदाय के बारे में लिखे गए साहित्य को भी दलित साहित्य माना है। बहुधा "दलन" (शोषण, उत्पीड़न) पर केंद्रित साहित्य को भी दलित साहित्य में शामिल करना पाया जाता है। वैसे तो यह विषय सम्भवतः "अमुक के साहित्य में दलित चेतना" शीर्षक के अंतर्गत भी अधिक चर्चित हुआ है। 

"दलित साहित्य" नामकरण क्यों? वस्तुतः साहित्य तो साहित्य है, कोई भी हो उसका प्रणेता; सामान्य या तथाकथित दलित, महिला या पुरुष। 

यह भी सत्य है कि सदियों से ऐसा ही होता आ रहा है, कि विद्वानों की दृष्टि पहले साहित्य पर, सृजन पर केंद्रित हुई है, पहले कृति को देखा, परखा गया है; विषयवस्तु को, शैली को, उसके प्रयोजन को, प्रभाव को, रचना में निहित आनंद (रस) को महत्त्व दिया गया है; सर्जक पर दृष्टि बाद में गयी है और तब भी उस सर्जक के व्यक्तित्व का विश्लेषण केन्द्रीभूत रहा है उसके लिंग, जाति, धर्म को शायद ही कभी देखा गया हो। हमने जार्ज ग्रियर्सन के ग्रंथ ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया’ तथा ‘माडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ़ नार्दर्न हिन्दुस्तान’ को, उनके महत्त्व को, पहले देखा। इन ग्रंथों के लेखक को बाद में। ज्ञात हो कि जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन किसी विश्वविद्यालय में शिक्षक भी नहीं थे, वह तो ब्रिटिश शासन के एक आई.सी.एस. अधिकारी थे। 

ऋग्वेद में एक सूक्त है–

संगच्छध्वं संवदध्वं, सं वो मनांसि जानताम्। 
देवा भागं यथा पूर्वे, संजानाना उपासते॥ 
                                                      -ऋग्वेद, 10/191/3

ऐसी ही भावना को व्यक्त करता एक सूक्त महोपनिषद में भी आया है–

अहम निजः परोवेत्ति गणना लघुचेतसाम्। 
उदार चरितनान्तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥ 
                                               -महोपनिषद्, अध्याय-4, श्‍लोक-71

स्पष्ट रूप से दोनों मंत्रों में एकता, समन्वय के पवित्र भाव को महत्ता दी गयी है ताकि मानव-मानव में भेद न पनपे; सब मिलकर मानव मात्र के परम् कल्याण के लिए चिंतन करें और तदनुरूप ही कार्य करें। 

साहित्य में प्राणिमात्र के हित का चिंतन होता है। यहाँ स्व का विस्तार सर्व तक होता है इसलिए यहाँ बहुजन से भी आगे सर्वजन(सर्व प्राणी भी) साध्य होता है। कोई भी सहृदय जब लेखनी चलाता है तो उसका मन, मस्तिष्क, हृदय सत्यं, शिवं, सुन्दरं से आवेष्ठित होता है किसी भी तरह का भेद तत्क्षण उसे छू भी नहीं पाता है। 

भारतीय काव्य शास्त्र में रस (आनंद) को काव्य की आत्मा माना गया है। अस्तु यहाँ मुझे वरिष्ठ भाषाविद्‌ एवं प्रखर आलोचक डॉ. शंकर सिंह तोमर का यह कथन प्रासांगिक लगता है– "सत्यम (The truth) शिवम (The good) सुंदरम (The beauty); यह परिकल्पना पाश्चात्य जगत की है, आर्ष साहित्य में यह उपलब्ध नहीं है। आर्ष साहित्य में ब्रह्म के सम्बंध में परिकल्पना है– सच्चिदानंद। अर्थात =सत (The essence), चित (consciousness), आनंद (The happiness)। भाव जगत में सर्वोत्कृष्ट स्थिति आनंद की ही है, सुंदर की नहीं। व्यक्ति को अपने जीवन में आनंद की स्थिति प्राप्त करनी चाहिए। आनंद की स्थिति ही उसे ब्रह्मत्व का बोध कराती है, लौकिकता से परे ले जाती है।" साहित्य के आनंद को ब्रह्मानंद सहोदर भी कहा गया है। 

अब फिर प्रश्न यह कि क्या साहित्य का "दलित साहित्य" ऐसा कोई नामकरण, वर्गीकरण या विभाजन होना चाहिए? मेरा मत है कदापि नहीं। यहाँ मैं सर्वप्रथम अपनी ही कविता की कुछ पंक्तियों से कारण स्पष्ट करना चाहूँगा–

 

"बाँटना है तो बाँटिए1, आदर्श, अमन-चैन, 
भाईचारा, प्रेम - मोहब्बत की कश्तियाँ;
जो पाट दें दरिया की दूरियाँ। 
 
बाँटना है तो बाँटिए सहानुभूति
जो अभावों के पोंछती है आँसू
उतार लेती है बोझ पीड़ाओं का। 

 

पर बाँटिए मत2-
बहुत बँट चुके हैं हम रंगों में, नस्लों में, 
महाद्वीपों में, उपमहाद्वीपों में; राष्ट्रों में, राज्यों में;
धर्म और जातियों में, अगड़ों और पिछड़ों में, 
भाषाओं और विभाषाओं में, 
विकसित, विकासशीलों में
परमाणु सम्पन्नों और विपन्नों में। 
खो गए हम, बँटवारों के बियाबान में
यहाँ तक कि साहित्य और कलाओं को भी
नहीं रखा मुक्त बँटवारे से। 
 
नदी और जल को तो बाँट ही लिया तुमने
लगता है बाँध दोगे सीमाओं में
अब हवा और आदित्य को भी, 
क्षमा करें, अब बाँटिए मत।"

               -(लेखक की ही काव्य पुस्तक "दिशाएँ मौन" से)

शब्दार्थ-1.बाँटिए=वितरण कीजिए। 2.बाँटिए मत=विभाजन न करना। 

मेरे मत में "दलित साहित्य" इस तरह का कोई विभाजन क़तई उचित नहीं माना जाना चाहिए; यह विभाजन साहित्य के असल स्वरूप में व्यवधान जैसी स्थिति लगता है। 

विचार करें कि यदि किसी तथाकथित दलित समुदाय के व्यक्ति द्वारा उत्कृष्ट साहित्य सृजा जाता है तो उसे केवल साहित्य (उत्तम काव्य) न कहकर दलित साहित्य क्यों कहा जाए? उसमें दलित शब्द का पुछल्ला क्यों जोड़ा जाए? इसी प्रकार यदि किसी ग़ैर दलित द्वारा ऐसा साहित्य सृजित किया जाए जिसमें साहित्य के लिए आवश्यक अंग, उपांग ही न हों; जो सहृदय को आह्लादित ही न कर सके तो उसे साहित्य की मान्यता ही क्यों दी जाए। आज "दलित साहित्य" नाम से जो लिखा जा रहा है उसमें बहुत कुछ, बहुत उच्च स्तर का लिखा जा रहा है; प्रायः ऐसे मार्मिक, संवेदनशील विषयों को उठाया जा रहा है जो महत्त्वपूर्ण और आवश्यक होते हुए भी जिनकी तरफ़ इससे पहले किसी ने झाँका तक नहीं था। इनमें शोषण की काली तस्वीर है तो निज अस्मिता के गौरव को भी पूरी शिद्दत के साथ प्रस्तुत किया गया है। अस्तु, यह साहित्य प्रेय है, श्रेय है। 

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि हम क्षेत्र, भाषा, सम्प्रदाय, जाति आदि के रूप में पहले से ही काफ़ी बँट चुके हैं, अब और बँटवारा न किया जाए तो ही देश, समाज और साहित्य का हित हो सकेगा। यह बात अपनी जगह सही है कि भारतीय समाज में समुदाय-गत विभाजन है पर इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि यह विभाजन लेखन या साहित्य में भी लागू किया जाय। इसलिए मेरा मानना है कि "दलित साहित्य" जैसे किसी साहित्यिक जातिवाद से जितनी जल्दी मुक्ति मिल सके उतना ही अच्छा रहेगा। सभी में एक बात का विश्वास, भाव होना चाहिए कि उत्तम साहित्य कभी झुठलाया नहीं जा सकता, दबाया नहीं सकता जबकि "कुछ भी लिखा हुआ" अंततः काग़ज़ की कश्ती ही होता है। 

सहृदय रचनाकार जो भी विषय चुनता है वह हमेशा प्राणिमात्र के कल्याण के लिए होता है। वस्तुतः वह समाज में जो देखता है, जो अनुभव करता है उससे उसे जो प्रेरणा मिलती है उससे उसका हृदय जिस रूप में द्रवीभूत होता है उसे ही वह प्रस्तुत करता है, अपनी लेखनी के माध्यम से; हम पाते हैं कि इसमें समाज के श्रेष्ठि वर्ग की विद्रूपताएँ भी होती हैं तो सर्वहारा वर्ग के दुख भी होते हैं। 

साहित्य में कोई दलित नहीं हो सकता, न सर्जक न वर्ण्य विषय। यहाँ कोई समुदाय से दलित नहीं; दलित तो वही माना जाना चाहिए जिसका मन कुंठित है, आत्मा संकीर्ण है जिसके चरित्र में दुहरापन है... हाँ, यह बात सही है कि ऐसा व्यक्ति साहित्यकार हो ही नहीं सकता। 

कुछ साहित्यकार, विचारक, आलोचक "दलित साहित्य", "दलित साहित्यकार" इस तरह का अभिधान उचित और आवश्यक मानते हैं। ऐसे लोगों में कुछ ऐसे साहित्यकार भी शामिल हैं जो तथाकथित रूप से दलित वर्ग से आते हैं और जिन्होंने अत्यंत उच्च स्तर का ऐसा साहित्य सृजन किया है जो विश्व की किसी भी भाषा के श्रेष्ठतम साहित्य के मुकाबले 21 ही ठहरता है। प्रश्न उठता है कि फिर वे या उनकी तरह सोच रखने वाले लोग पृथक नामकरण के पक्ष में क्यों हैं? कहा जाता है कि "पहचान के संकट" के कारण। इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि "साहित्य में इतनी गुटबाज़ी है कि एक गुट को अपने गुट से बाहर का कुछ स्वीकार ही नहीं होता है । यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं कि गुट से बाहर उन्हें कुछ दिखता ही नहीं है। गुट से बाहर का या तथाकथित दिग्गजों के आभामंडल के बाहर का कोई कितना भी अच्छा लिखे, उन्हें स्वीकार ही नहीं जबकि भीतर वाले का "कचरा" भी उत्तम काव्य।" हिंदी के सम्बंध में ऐसी ही चिंता 17 दिसम्बर 1960 को कोटा में दिए गए अपने व्याख्यान में प्रखर चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया ने भी व्यक्त की थी। उनका मत था कि हिंदी के साथ उसके एक विशेष प्रतीकधारी समुदाय से जुड़े होने का शाप जुड़ा हुआ है, यह शाप उसके लिए ज़बरदस्त ख़तरा है। वे यह भी कहते हैं कि मैं अज़-हद कोशिश कर रहा हूँ कि इस जुड़ाव का सम्बंध-विच्छेद हो जाये ताकि हिंदी भी आधुनिक दुनिया का औज़ार बने। इसी क्रम में आगे डॉ. लोहिया कहते है– मैं इस बात को भी मानता हूँ कि शायद दुनिया की ज़बानों में शक्ति के हिसाब से, सोच और लचक के हिसाब से सबसे अच्छी ज़बान हिंदुस्तानी है। हमारा दुर्भाग्य कि हम उसे इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं।" (अमर उजाला 12 अक्टूबर 2017 से)

ऐसी ही परिस्थितियों में समुदाय-गत दूरियाँ झेल रहे साहित्यकार यहाँ पक्षपात के शिकार हो जाते हैं और उनकी पहचान छिप जाती है या छिपा दी जाती है। अस्तु उन्हें लगता है पृथक नामकरण होने से इस संकट से मुक्ति मिलेगी। यह सही है कि साहित्य-जगत में अपने-पराए होने, पक्षपात होने की चर्चाएँ ख़ूब हुई हैं। यह भी होता है कि शोषण के शिकार रहे वर्गों के असल मुद्दों को स्वर किया ही नहीं जाता है। अस्तु दलित साहित्य नाम के पक्षधर इन मुद्दों को उठाने के लिए भी इस तरह का पृथक प्लेटफॉर्म आवश्यक मानते हैं। मुझे लगता है कि डॉ. लोहिया जी को भी आशंका थी कि एकाधिकार जैसी स्थिति रहने से साहित्य में भी अलगाव के स्वर फूटेंगे और यह स्थिति उचित नहीं होगी। वे चाहते थे कि ऐसा एकाधिकार ख़त्म हो जिससे साहित्य में सबका समानभाव बना रहे। 

लेकिन तमाम स्थितियों, परिस्थितियों के बाद भी पृथक नामकरण इसलिए भी नहीं क्योंकि इससे साहित्य और साहित्यकार दोनों का दायरा सीमित हो जाने की स्थिति बनती है। पृथक्करण से वे समग्र के नहीं एक ब्रांड, एक विचारधारा के प्रतिनिधि बन जाते हैं। जब साहित्य एक रूप होता है तो उसके पाठक भी अधिक होते हैं, जब अलग-अलग धड़े बन जाते हैं तो अपनी-अपनी विचारधारा को पसंद किया जाने लगता है। ऐसे में सर्वाधिक हानि उन रचनाकारों की होती है जो अच्छा लिखते हैं, सर्वजनीन लिखते हैं, सर्वग्राह्य लिखते हैं। हाँ उनको कुछ लाभ अवश्य मिल सकता है जिनके लिखने का स्तर "प्रवेश" स्तर का होता है। 

इस संदर्भ में एक बात यह भी ध्यातव्य है कि साहित्यकार किसी एक वर्ग का नहीं होता, वह सबका होता है, वह सर्जक होता है, दृष्टा होता है, सृष्टा होता है, पथप्रदर्शक होता है, उसे किसी सीमित दायरे में कैसे बाँधा जा सकता है?

फिर बात भेद (भेदभाव) की; तो मेरा मानना है कि यदि कथरी में जूँ हैं तो जूँ का इलाज किया जाना चाहिए, कथरी का जूँ वाला टुकड़ा अलग करने या जूँ वाले टुकड़े से बिना जूँ वाला अपना/पराया टुकड़ा अलग करने का क्या औचित्य?

यह कहा जा सकता है कि दलित साहित्य, महिला साहित्य ऐसे प्लेटफॉर्म्स के फ़ायदे अधिक हैं। हाँ हैं। रचनाकरों को अधिक स्पेस मिलता है। महत्त्वपूर्ण पर अनछुए विषयों को स्थान मिलता है, दबाए गए गौरव का प्रकटीकरण आसानी से हो पाता है। यह सब तो है पर जो शोभा समग्र आकाश की है वह टुकड़ा-टुकड़ा आसमान की कैसे सम्भव है। अस्तु, साहित्य के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए। आवश्यक यह है कि आज़ादी के पहले सामाजिक आज़ादी के जो अभियान चलाए गए थे उन्हें पूर्णता पर पहुँचाया जाए। 

 

(*लेख में मेरे वह निजी विचार हैं जो समय-समय पर मेरे मानस में उमड़े-घुमड़े हैं। सच में, किन्हीं की मान्यताओं का खंडन या मंडन उद्देश्य क़तई नहीं है। किसी का इन विचारों से सहमत होना भी अपेक्षित नहीं है।)

परिशिष्ट

दिनांक 17 दिसम्बर 1960 को कोटा में दिये गए व्याख्यान में से- "मैं इस बात को मानता हूँ कि हिंदी के लिए ये सब कुछ बहुत ज़बरदस्त ख़तरा है और उसका एक ज़बरदस्त शाप उस पर है कि चोटी और जनेऊ के साथ वह जुड़ी हुई है। मैं अज़-हद कोशिश कर रहा हूँ कि किसी तरह हिंदी का यह चोटी, जनेऊ से सम्बन्ध विच्छेद हो जाये और हिंदी भी आधुनिक दुनिया का औज़ार बने। मैं इस बात को भी मानता हूँ कि शायद दुनिया की ज़बानों में शक्ति के हिसाब से, सोच और लचक के हिसाब से सबसे अच्छी ज़बान हिंदुस्तानी है। हमारा दुर्भाग्य कि हम उसे इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं।"

 - अमर उजाला 12 अक्टूबर 2017 में प्रकाशित। 

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