विशेषांक: दलित साहित्य

10 Sep, 2020

कहानियों में प्रतिबिबिंत दलित स्त्री

साहित्यिक आलेख | डॉ. सुमित्रा महरोल

दलित रचनाकारों की कहानियों में चित्रित दलित स्त्री और उसके सामाजिक परिवेश पर मैंने अपनी दृष्टि केन्द्रित रखी है। अनेक रचनाकार लेखन के माध्यम से युग की धड़कनों को रेखांकित कर रहे हैं। स्त्री इनके लेखन में कहीं केन्द्र में है व कहीं हाशिए पर।

वर्णवादी कुव्यवस्था के कारण समाज के सबसे निचले पायदान पर पड़ी दलित स्त्री की अति दयनीय यथार्थ स्थिति का चित्रण तो इन्होंने किया ही है पर इनकी दृष्टि केवल चित्रण तक ही सीमित नहीं रही है, इस विषमता मूलक स्थिति के लिए उत्तरदायी कारकों की भी इन्होंने अच्छी पड़ताल की है। विषमतामूलक स्थितियों के लिए उत्तरदायी शक्तियों को पहचान उनके विरुद्ध दलित जन में चेतना जागृत कर उन्हें संगठित हो कर समता के लिए संघर्ष करने का आह्वान इनकी रचनाओं में मिलता है।

स्त्री समाज की मूलभूत ईकाई है, पर भारतीय परिप्रेक्ष्य में स्त्री विशेषकर दलित स्त्री जाति व पितृसत्ता रूपी दोहरे अभिशापों के तीखे दंश को झेलने के लिए अभिशप्त है। भारतीय समाज व्यवस्था में स्त्री होने के साथ दलित होना स्त्री के संतापों को कई गुना बढ़ा देता है। भारत का समाज जाति व धर्म पर आधारित है। पितृसत्तात्मक भी है, पितृसत्ता ने सारे नियम अपनी सुविधा के अनुसार बनाए हैं। दलित स्त्रियाँ जाति और पितृसत्ता दोनों का उत्पीड़न झेलती हैं। घर के बाहर ग़ैर दलित उन्हें लहुलुहान करते हैं तो घर के अन्दर दलित पुरुषों की सामंती मनोवृति वर्चस्ववाद व शारीरिक हिंसा उन्हें तोड़ती है।

इस सन्दर्भ में रमणिका गुप्ता जी का विचार है कि "स्त्री की असमानता का मूल मंत्र धर्म है। धर्म और जाति से पितृसत्ता का रिश्ता चोली दामन का रहा है। परम्परा संस्कार और सामाजिक राजनैतिक व्यवहार धर्म और जाति की देन है तो विशुद्ध ( पितृसत्ता के पोषण के औज़ार भी हैं। पितृसत्ता ने स्त्री के लिए जहाँ एक तरफ़ सारे पारिवारिक सामाजिक सांस्कृतिक मानदंड धर्म और जाति की आड़ में ही तय किए हैं।

जो यथास्थिति के समर्थक हैं तो दूसरी और उसने परिवार के रूप में एक ऐसा ढाँचा तैयार कर दिया है जो पितृसत्ता के अधिकारों की रक्षा करता है। स्त्री को जीवन भर गुलाम बनाए रखता है। परिवार का यह पिंजरा बहुत मज़बूत है क्योंकि वह परम्परा रूढ़ि व आचार संहिता पर ही आधारित नहीं है, उसमें भावनाओं के टाँके भी लगे हुए र्हैं जिसमें ममता, लिहाज़ व शर्म तो फेविकोल की तरह है, जिन्हें हाथी भी शायद तोड़ने में सक्षम नहीं होता। जुड़ाव बुरा नहीं है बशर्ते वह क़ैद व बन्धन न बने। "परिवार से मुक्ति" स्त्री की ज़रूरत पर आधारित न हो कर उसका अपने उनपर होने वाले अत्याचार व शोषण के प्रति विद्रोह है" (अन्यथा जून 2008 पृष्ठ 200, 201) भारतीय समाज में इन परिस्थितियों में दलित स्त्री की बचपन से ही ऐसी दिमागी कंडिशनिंग की जाती है कि दलित स्त्री सदैव अपने अधिकारों का अपनी स्वाभविक इच्छााओं का बलिदान करती आई है। परिवार की मान मर्यादा की बलिवेदी पर अनेकों बार ख़ुद को स्वाहा करती आई है। जन्म से ही पराया धन मान कर उसकी शिक्षा, भोजन, स्वास्थ्य इत्यादि की उपेक्षा की जाती है। बुढ़ापे की लाठी तो बेटे हैं यह मान कर दलित परिवार अपने सीमित साधनों को बेटों पर व्यय करने को प्राथमिकता देते हैं।

बचपन से ही दलित स्त्री को इस तरह क संस्कार दिए जाते हैं। इस तरह के परिवेश में उनकी परवरिश होती है कि "उसका सुख परिवार के सुख से कुछ अलग है" इस तथ्य तक से वह परिचित नहीं। दलित स्त्री चाहे वह किसी भी वर्ग की क्यों न हो, के स्व का विस्तार उसके पति, बच्चों, माँ-बाप, भाई-बहनों तक खिंच गया है। स्वयं की स्वतंत्रता व उन्नति की उसके लिए कोई अवधारणा नहीं। स्त्री विवाहित है तो पति, बच्चों की सुख समृद्धि में ही अपना सुख खोजती है और आजीवन अपनी समस्त उर्जा व शक्ति अपने इस परिवार के सरंजामों में ही ख़र्च कर देती है।

दलित स्त्री की सामाजिक, आर्थिक स्थिति उसके शोषण, उसकी पीड़ा की प्रमाणिक अभिव्यक्ति स्थान-स्थान पर दलित साहित्य में बिखरी मिलेगी। दलित स्त्री इस साहित्य में आई है– पर केवल एक शोषित के रूप में।

सबसे पहला स्तर है जाति व पितृसत्ता के कारण दलित स्त्री पर होने वाले दमन एवं शोषण को उद्घाटित करने वाली रचनाएँ। समाज में उसकी अति हीन व दयनीय स्थिति का चित्रण इन रचनाओं में हुआ है।

यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि दलित लेखकों द्वारा सृजित महिला पात्रों को भी मैंने अपने इस लेख मे लेने का प्रयास है।

क्षेत्र के अनुसार उत्पीड़न का स्वरूप बदल जाता है। ग्रामीण क्षेत्र में ग़ैर दलित भिन्न तरीक़े से दलित स्त्री को प्रताड़ित करते हैं, ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाला शोषण पूर्णतया प्रत्यक्ष एवं दृष्टिगत होता है दलितों को जातिसूचक नामों से पुकारा जाता है, मौक़ा मिलने पर दलित स्त्री के यौन शोषण का कोई भी अवसर ग़ैरदलित छोड़ना नहीं चाहते, दलित स्त्री को उसके श्रम का बहुत कम मूल्य दिया जाता है। किन्तु शहरी क्षेत्र के तथा चर्चित शिक्षित एवं संभ्रांत कहे जाने वाले समाज में शोषण का स्वरूप प्रत्यक्ष दृष्टिगत नहीं होता।

ग्रामीण क्षेत्र में दलित समाज के शोषण उत्पीड़न के अनेक चित्र सुशीलाजी की रचनाओं में दिख जाएँगे। इस संदर्भ में उनकी द्यौआ माँ, बदला, संघर्ष एवं सिलिया कहानियों की चर्चा की जा सकती है।

सिलिया कहानी सवर्णों की संकीर्ण दृष्टि व नीति के ख़िलाफ़ एक बालिका के अदम्य साहस, जीवट व जिजीविषा की कहानी है, तभी तो जो हाथ कभी उसे विकट गर्मी में दो घूँट पानी तक से वंचित रखते हैं, वही हाथ कुछ समय बाद उसी बालिका को खचाखच भरे सभागार में सम्मानित करते हैं।

कौशल पवार की ‘दिहाड़ी’ एवं रजत रानी मीनू की ‘फरमान’ नामक कहानियाँ दलितों पर होने वाले शोषण-उत्पीड़न के अनेक आयामों को हमारे सामने खोलती हुई सी प्रतीत होती हैं। पूनम तुषामड़ द्वारा रचित ‘बिच्छू’ नामक कहानी भी अपने कथ्य एवं वस्तु के कारण विशिष्ट बन पड़ी है।

शहरी क्षेत्र में प्रताड़ना के बदले हुए स्वरूप को मैंने अपनी प्रतिकार, आघात व त्रिशंकु नामक कहानियों मेें उजागर करने का प्रयास किया है।

प्रतिकार कहानी की पात्र मीता आर्थिक व शैक्षणिक दृष्टि से समर्थ होने के बावजूद जातिगत भेदभाव के कारण स्वयं को अनेक बार उपेक्षित-अपमानित महसूस करती है और बग़ैर किसी अपराध के समूह से बाहर एकाकी जीवन जीने के लिए स्वयं को अभिशप्त पाती है।

‘आघात’ कहानी दलितों के प्रति ग़ैर दलितों के दोगले व स्वार्थपूर्ण व्यवहार का पर्दाफ़ाश कर दलितों में जाग्रत एकता का आभास कराती है।

"ये कोटे वालियाँ" नामक कहानी में अनीता भारती जी ने यह बताने की कोशिश की है कि शिक्षा और रोज़गार प्राप्त कर लेने के बाद भी सामाजिक सम्मान के लिए दलित स्त्रियों को अभी लड़ाई लड़नी पड़ेगी। ग़ैरदलित समुदाय अपने पूर्वाग्रहों के कारण, दलित शिक्षित रोज़गार शुदा स्त्रियों को, अभी भी हेय दृष्टि से ही देखता है।

"नई धार" नामक एक अन्य कहानी में उन्होंने स्पष्ट करने की कोशिश की है कि दलित स्त्रियों की मुक्ति का दम भरने वाली सवर्ण महिला कार्यकार्ता वास्तव में दलित स्त्रियों को सीढ़ी बना कर अपने स्वार्थ सिद्ध करना चाहती हैं। रजत रानी मीनू जी की "सुनीता" नामक कहानी दलित स्त्री की सामाजिक पारिवारिक स्थिति का ही बयान न हो कर दलित स्त्री की उत्कट जिजीविषा व उसके संघर्ष का दस्तावेज़ है। तभी तो इस कहानी की नायिका सभी बाधाओं को पार कर अपने अभीष्ट को पाने में अन्ततः सफल होती है।

ओम प्रकाश बाल्मीकी जी की कहानी "जंगल की रानी" दलित स्त्री के शोषण व दमन पर आधारित है। शहर के प्रतिष्ठित कहे जाने वाले एस.पी., डिप्टी कलक्टर एवम् विधायक न केवल उसके साथ दुष्कर्म करने का प्रयास करते हैं अपितु कमली द्वारा आत्मरक्षा किए जाने पर गला घोंट कर उसकी हत्या भी कर देते हैं व आरोप एक बेकसूर पत्रकार पर लगा देते हैं। अन्यायी समाज व्यवस्था के नकाब को बेपरदा करती है यह कहानी।

सूरज पाल चौहान जी की "घाटे का सौदा" नामक कहानी बताती है कि सामाजिक सम्मान पाने की आतुर दलित व्यक्ति यदि अपनी वास्तविक जातिगत पहचान को छुपा कर कुछ समय के लिए तो भ्रमित हो सकता है पर अंत में उसे पहले से भी ज़्यादा अपमानित स्थितियों का सामना करना पड़ता है।

शहरी क्षेत्र में व्याप्त शोषण के स्वरूप पर इस प्रसंग में कैलाश चन्द्र चौहान के उपन्यास ‘सुबह के लिए’ में आए लक्ष्मी वाले संदर्भ को लिया जा सकता है। नगर निगम में सफ़ाई कर्मचारी के रूप में नियुक्त लक्ष्मी के रूप सौन्दर्य पर ग़ैरदलित इन्सपेक्टर आसक्त हो जाता है, मगर अपनी यौन अभिलाषाओं की पूर्ती न होने पर वह किस-किस तरह से दलित महिला का दमन करता है, इसका बड़ा सटीक चित्रण कैलाश चन्द्र चौहान जी ने अपने उपन्यास में किया है।

दूसरी श्रेणी में उन रचनाओं को लिया जा सकता है, जहाँ दलित स्त्री चेतना सम्पन्न हो गयी है। वह जान गयी है कि पूर्व जन्म के कर्मों के कारण उसकी यह दुर्दशा नहीं है। अपने वास्तविक शोषकों के चेहरे अब पहचान लिए हैं और प्रतिरोध का हौसला भी अब उसमें आ गया है।

इस क्रम में अजय नावरिया द्वारा रचित इज्ज़त कहानी की चर्चा की जा सकती है। इज्ज़त कहानी की नायिका ग़ैर दलितों के दुष्कर्म के बाद घुटने नहीं टेकती। दोषियों को सज़ा दिलाने का हौसला अपने भीतर सँजोती है। समाज व परिवार में बदनामी के डर से आतताइयों को वह खुला नहीं छोड़ सकती ताकि वही हरकत वह फिर दूसरों के साथ न कर पाएँ।

टेकचंद द्वारा रचित ‘उतरन’ नामक कहानी में भी दलित स्त्री के इसी हौसलेे व हिम्मत का चित्रण है। स्वयं अपने बाजुओं के दम पर अपना और अपने बच्चों का पालन-पोषण करने वाली कमली यहाँ पितृसत्ता के सामने नहीं झुकती, दम भर उसका सामना करती है।

सुशीला जो "दमदार" कहानी की पात्र सुमन अपनी आत्मशक्ति के बल पर ही अपने शोषक "जग्गू पहलवान" का न केवल सामना करती है अपितु उससे प्रेरणा लेकर जग्गू द्वारा प्रताड़ित अन्य नारियों जैसे प्रेमलता व पगली भी जग्गू पर प्रहार कर अपना प्रतिशोघ लेती हैं। नारी में जाग्रत यह चेतना ही उसकी मुक्ति का प्रथम चरण है।

इसी तरह अनीता भारती जी की कहानी ‘तीसरी कसम’ पितृसत्ता प्रधान समाज में नारी की शोचनीय स्थिति के साथ नारी के साहस व स्वाभिमान की गाथा को समेटे है।

यह कहानी नारी में आत्मसम्मान, स्वाभिमान व चेतना जाग्रत होने की कथा कहती है।

तभी अशिक्षित होते हुए भी शिक्षा का महत्व समझती है व अपने बच्चों को शिक्षित करने के प्रति दृढ़ संकल्प है।

समकालीन परिवेश से स्वयं को अछूता रख पाना किसी भी रचनाकार के लिए संभव नहीं है।

भूमंडलीकरण व उदारीकरण के इस दौर में दलित समाज के प्रति समाज व व्यवस्था के चेहरे से नक़ाब कई दलित रचनाकारों ने उठाए हैं। अनीता भारती की ‘सीधा प्रसारण’ नामक कहानी बताती है कि मीडिया किस तरह नारी पर हो रहे शोषण-उत्पीड़न को टी.आर.पी. बढ़ाकर अपने मुनाफ़े के साधन के रूप में अपनाता है। तभी तो ग्रामीण दलित बालिका पर हुए अत्याचार उसके चैनलों की सुर्ख़ियाँ नहीं बनते।

‘बीज बैंक’ नामक एक अन्य कथा में उन्होंने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दोगले एवं शोषक चरित्र को हम सबके समक्ष खोल कर रख दिया है।

रजनी दिसादिया ने अपनी ‘घर परिवार’ नामक कहानी में लिव इन रिलेशन मे रह रहे युगलों की कथा को तो लिया ही है, घरेलू हिंसा की शिकार दलित स्त्रियों की कथा भी उन्होंने इस कहानी में बयान की है।

इसी तरह सूरज बड़त्या की कहानी ‘गुफाएं’ की नायिका अपूर्वी अम्बेडकरवादी पिता एवं मामा के अंर्तविरोधी विचारों के कारण अपने प्रेमी राजन से विवाह नहीं कर पाती व अमन से विवाह के लिए विवश हो जाती है। मार्क्सवादी विचारों वाला अमन अंदर से नितांत पुरुषवादी विचारों का पोषक है। पिता एवं पति दोनों की कथनी एवं करनी में भेद है। अन्ततः अपूर्वा पति से अलग हो एकाकी जीवन व्यतीत करने का निर्णय लेती है। वैवाहिक संबंधों के युगीन तनाव व पुरुषों के अंर्तविरोधी चरित्रों के कारण कहानी विशिष्ट बन पड़ी है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि अस्मितावादी विमर्श मे दलित स्त्री चतुर्दिक दिशाओं में सक्रिय है, उसकी दृष्टि अतीत से लेकर यथार्थ के थपेड़ों से प्रति पल बदलते हुए वर्तमान और उस वर्तमान के लिए उत्तरदायी कारकों तक से अछूती नहीं है, यहाँ तक कि समय की गर्त में छिपे हुए भविष्य तक वह अपनी दृष्टि पहुँचाने का यत्न कर रही है।

किन्तु यहाँ पर मैं यह भी कहना चाहूँगी कि शिक्षा, चेतना एवं विवेकबुद्धि से सम्पन्न होने के बाद ही उसकी दृष्टि और सोच में यह फैलाव व गहराई आ पाई है।

अपने दलित समाज की शत-प्रतिशत स्त्रियों को शिक्षित व चेतना सम्पन्न बनाने की दिशा में अभी बहुत सा कार्य किया जाना शेष है, पर शुरूआत हो चुकी है व आने वाले वर्षों में अपने इस वृहत्तर लक्ष्य को हम प्राप्त कर पाएँगे ऐसी मैं आशा रखती हूँ।

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