विशेषांक: दलित साहित्य

10 Sep, 2020

तुम कविता पर होकर सवार
लिखते हो कविता
और हमारी कविता
रोटी बनाते समय जल जाती है अक़्सर
कपड़े धोते हुए 
पानी में बह जाती है कितनी ही बार
 
झाड़ू लगाते हुए
साफ़ हो जाती है मन से
पौंछा लगाते हुए
गँदले पानी में निचुड़ जाती है
 
साफ़ करते हुए घर के जाले
कहीं उलझ जाती है अपने ही भीतर
और जाले बना लेती है अनगिनत
धूल झाड़ते हुए दीवार से
सूखी पपड़ी सी उतर जाती है
टॉवल टाँगते समय
टँग जाती है खूँटी पर
 
सूई में धागा पिरोते-पिरोते
हो जाती है आँख से ओझल
 
छेद- छेद हो जाती है
तुम्हारी कमीज़ में बटन टाँकते
बच्चों की चिल्ल-पों में खो जाती है
मिट्टी हो जाती है
गमलों में खाद देते हुए खाद
 
घर-बाहर सँभालते सहेजते
तुम्हारे दंभ में दब जाती है
और निकलती है किसी आह सी
जैसे घरों की चिमनियों से
निकलता है धुँआ
 
पढ़ सको तो पढ़ो
हमको ही
हमारी कविता की तरह
हम औरतें भी
एक कविता ही तो हैं॥

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