विशेषांक: दलित साहित्य

11 Sep, 2020

दलित साहित्य और मानवाधिकार

साहित्यिक आलेख | डॉ. अनामिका अनु

जाति नहीं है अनुशासन
न ही यह कोई व्यवस्था है
यह ख़ालिस अराजकता 
गयी परोसी थाली में
घूँट-घूँट में गयी पिलायी
ये ज़हर था
यह नहीं था पानी!
 
हाथ हथौड़े, क़लम नहीं था
बहा पसीना खाता था
रक्त नहीं चूसा है मैंने
न ही मैं परजीवी।
मैं सूरज था
मुझसे तेरे खेत-खलिहान
तुम लगा रहे थे
मुझे ग्रहण।
मैं मौन खड़ा समय की सीढ़ी पर
देख रहा था वर्ण प्रपंच।
 
तुम लिख रहे थे गणित समय का
मैं भी मानक और इकाई था
फिर भी ज़िक्र नहीं मेरे होने का? 
ये सृजन नहीं सियासत थी!

          अनामिका अनु 
            'दलित' कविता 
            हंस पत्रिका (दलित विशेषांक) 

हम मानव एक निश्चित गुणसूत्र संख्या के साथ पैदा होते हैं। हम सब की मूलभूत आवश्यकताएँ भी एक सी हैं। मानव रूप में जन्म लेते ही मानवाधिकार हमें मिल जाने चाहिए (नहीं मिलना दुर्भाग्य है) चाहे हम किसी भी समाज का हिस्सा क्यों न हों। हम सबों में प्रेम और सम्मान पाने की एक सी ही लालसा होती है। हम सबों के आँखों में शिक्षा और रोज़गार के समान अवसर के स्वप्न भी एक से ही हैं। हम सब की भूख और प्यास एक है। हम सब के जन्म, मरण का सच भी एक ही है। फिर जन्म से मृत्यु तक लगातार रंग, जाति, अर्थ, धर्म, देश, लिंग के आधार पर मूलभूत मानवीय गरिमा का हनन करते हुए किया गया भेदभाव और अमानवीय व्यवहार कहाँ तक जायज़ घोषित किया जा सकता है?

जो जन्म से मिला कुछ भी नहीं हमारा! हम कहाँ पैदा होंगे?हमने तय नहीं किया। न अपनी चमड़ी का रंग, न अपने माता- पिता, न अपना लिंग, न ही अपनी जाति। ये सब जन्म से हमारे वजूद के साथ जुड़ गये इनमें से कुछ भी हमारा अर्जित किया नहीं था। इसे हम ने स्वयं अपने श्रम, ज्ञान, बुद्धि, कोशिश, आचरण, व्यवहार और अपनी क्षमताओं के प्रयोग से प्राप्त नहीं किया था, तो फिर इन प्रकृति प्रदत्त और समाज प्रदत्त चीज़ों के आधार पर न हम विशेष सम्मान के अधिकारी हैं, न ही किसी अवहेलना के। इनसे न ही हमारा गर्व जुड़ा होना चाहिए, न ही हमारी हीन भावना। इनके कारण न हमारे मानवाधिकार कम होते हैं, न इनके कारण वे (मानवाधिकार) सिर्फ़ हमारी ही थाती बन कर रह जाते हैं। ये न ही हमारे महिमामंडन का कारण बन सकती हैं न ही उपहास का। मगर इन चीज़ों का सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक प्रभाव चौंकाने वाला है और ये चीज़ें समतामूलक लोकतांत्रिक समाज के निर्माण में बारंबार रोडे़ अटका रही हैं। इन्हीं कारणों से वंचित और संचित दो वर्ग उभर कर सामने आए हैं जिनके बीच गंभीर आर्थिक और सामाजिक खाई है। जिसके गंभीर मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी हैं। यहाँ ग़ौर करने वाली बात यह है कि इस विभेद की प्रक्रिया ने वंचितों के मानवाधिकार का भी गंभीर हनन किया है। इन्हीं वंचितों की श्रेणी में हमारा दलित समाज भी आता है जिसे जन्म से मृत्यु तक शोषण के अमानवीय कुचक्रों में लम्बे समय से फँसा कर रखा गया है। इसी जातिगत विभेद ने ऊँची जातियों को संसाधन का मालिक और अनुसूचित जातियों को मज़दूर और मजबूर बना दिया। 

दमन ने दलितों में आक्रोश तो पहले से ही भर रखा था, शिक्षा, औद्योगिकीकरण, समाज सुधार आंदोलन और दलित जागरण ने इन्हें अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष करने को प्रेरित किया और दलित चेतना आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हुई। दलित साहित्य इसी दलित विमर्श से पैदा हुआ और दलित जागरण ने इसके लिए ठोस ज़मीन तैयार की थी। आज यह दलित आंदोलन की एक जीवंत और महत्वपूर्ण धारा बन चुकी है। सबसे पहले दक्षिण भारतीय भाषाओं में ऐसे साहित्य आये, फिर मराठी भाषा में इस साहित्य की प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज की गयी और बाद में यह हिंदी साहित्य में भी एक बुलंद आवाज़ के साथ दर्ज हुई। 

मानवाधिकार वैसे तो हमें जन्म से ही मिल जाते हैं, अगर किसी भी कारणवश ये अधिकार नहीं मिल पाते हैं तो उन कारणों का त्वरित निवारण होना ही चाहिए और पूरी गरिमा साथ ये अधिकार सुनिश्चित किए जाने चाहिएँ। ये अधिकार मानव को मानव बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं और कोई भी सभ्य समाज इसको देने से इंकार नहीं कर सकता। मानवाधिकार की पैरवी यूँ तो हर प्रगतिशील साहित्य करता आया है लेकिन दलित साहित्य इस दलित समाज में हुए मानवाधिकार के हनन और इससे उपजी पीड़ा का धड़कता दस्तावेज़ है। ये स्वानुभूति, सहानुभूति की कथा कविता नहीं बल्कि विमर्श का साहित्य है। यह केवल समस्या को उजागर करने वाला साहित्य ही नहीं है बल्कि समस्या के निवारण का भी साहित्य है। 

समाज प्रारंभ से ही दो स्पष्ट वर्णों में विभाजित रहा है–

पहला मज़बूत/ ताक़तवर वर्ग यानी संसाधनों से संपन्न
दूसरा कमज़ोर वर्ग यानी संसाधनों से वंचित

पहले (ताक़तवर) वर्ग ने यथासंभव दूसरे वर्ग का उपयोग, शोषण अपने संसाधनों के संवर्धन और विकास के लिए किया है और उसका एक वाजिब हिस्सा इन श्रमजीवी वर्ग को देने से चूकते भी रहे हैं। इस सतत प्रक्रिया ने एक गंभीर आर्थिक और सामाजिक खाई पैदा कर दी है,  आज का समय इस खाई को पाटने की माँग करता है।

साहित्य, धर्म और राजनीति में दलित विमर्श आदिकाल से चला आ रहा है। बुद्ध, कबीर, रैदास, नानक सबों ने समय-समय पर जाति व्यवस्था की आलोचना की है। डाॅ. अम्बेडकर, ज्योतिबा फुले, पेरियार, नारायण गुरु आदि ने दलित विमर्श को नये आयाम प्रदान किये हैं। दक्षिण केरल के एक साधारण परिवार में जन्मे नारायण गुरु ने नैयर नदी के किनारे देश का शायद पहला ऐसा मंदिर बनाया जहाँ बिना किसी जाति भेद-भाव के लोग पूजा कर सकते थे। उन्हें सवर्ण जाति के ज़बर्दस्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। उन्होंने इससे विचलित हुए बिना सामाजिक आंदोलन का सूत्रपात किया और जातिविहीन समाज, सहभोज और अंतर्जातीय विवाह की वकालत की। यह भी अपने आप में एक अनूठा आंदोलन था जो सभी मानव को एक ही जाति का मानता था, वह जाति थी – मानवजाति। 

दलित साहित्य में स्वानुभूति और सहानुभूति :

पहले दलित साहित्य ने दक्षिण भारतीय भाषाओं और मराठी भाषा में दस्तक दी। धीरे-धीरे यह हर भाषा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगा। इस दौरान कुछ बेहद संवेदनशील आत्मकथाएँ लिखी गयी जिसने इस वर्ग के दर्द, संघर्ष और संवेदना को साहित्य के ज़रिए लोगों तक पहुँचाया। अनुभूति का यह सिक्का मोल लाया हृदय का वह कोर और मस्तिष्क का वह छोर जो अब तक चाहकर भी सहानुभूति के नोट नहीं मोल पाया था। ये वे कहानियाँ थीं जो भोगे हुए लोगों ने लिखी थीं। इन कहानियों को उन्होंने जीया था। इस दर्द का वे हिस्सा थे। इन कहानियों ने साहित्य के मर्म में वह स्वर जोड़ दिया जो अब तक मूक था। 

बिना भोगे उस यथार्थ के जड़ों में पैठ बना पाना दुर्लभ कार्य है। हालाँकि परकाया प्रवेश की विद्या से कभी-कभी साहित्यकार यह संभव कर पाता है। पर यह विद्या दुर्लभ है इसलिए यह सही ही है कि दलित साहित्य जब दलित साहित्यकारों के द्वारा लिखा जाता है तो यह ज़्यादा यथार्थपूर्ण, प्रभावी और संवेदनशील होता है।

दलित साहित्य की भाषा और आलोचना :

दलित साहित्य की भाषा वह नहीं हो सकती जो सवर्ण साहित्य की भाषा रही है। एक दलित उस दलित समाज का प्रतिनिधित्व करता है जो लंबे समय से शिक्षा के सुख से वंचित रहा है उसके पास न किताबें थीं, न अख़बार, न टीवी-रेडियो, न शिक्षण संस्थानों का सुख जहाँ वह शुद्ध, अलंकृत और समृद्ध भाषा सीखता, वह परिवेश से सीख रहा था। उसका परिवेश भी सीमित था वह पेट भरने के लिए ज़मींदारों के खेत और उनके दिए कामों पर निर्भर था, वहाँ मज़दूरी करके पेट भरना उनकी नियति बना दी गयी थी। उससे वे सब काम लिए जाते थे जो श्रमसाध्य थे या जिन्हें स्वयं करना संपन्नों को अमानवीय और घृणित लगता था। अब रहा दलित भाई-बहनों का ज़मींदारों और उच्च जाति के लोगों के साथ भाषा विनिमय। ये हमेशा श्रोता ही रहे, इनसे सलाह नहीं ली जाती थी, केवल आदेश दिया जाता था। इनसे काम लिया जाता था, पर सम्मान नहीं दिया जाता था। आदेश जब बिना सम्मान के दिया जाए तो भाषा से भाव और संवेदना ख़त्म हो जाती है। चूँकि सवर्ण इन्हें अस्पृश्य और छोटा मानते थे इसलिए वे इनके लिए सम्मानजनक भाषा का प्रयोग नहीं करते थे। इनकी छोटी-छोटी ग़लतियों पर इन्हें गाली देना आम बात थी। जाति सूचक मुहावरे जो मानवीय संवेदनाओं के ख़िलाफ़ थे का प्रयोग किया जाता था। दलितों ने सवर्ण से सुना सीखा भी तो बस यही हिंसक, अपमानजनक भाषा ही। फिर बताइए इनके जीवन में अंदर बाहर से आए सुंदर शब्द कितने कम थे। पहला संघर्ष तो वर्ण सीखने का था, विद्यालय तक पहुँचने का था, तब जाकर भाषा से परिचय, फिर साहित्य लिखना संभव हो पाता। यह केवल ज्ञान कोश में हाथ डालने का संघर्ष नहीं था अपितु इस पूरी प्रक्रिया में आने वाले सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक व्यवधानों से संघर्ष करते हुए अपने को मनोवैज्ञानिक रूप से मज़बूत बनाए रखने की कला सीखना भी था। यह चुनौती बेहद गंभीर थी। भाषा तक पहुँच कर फिर पीड़ादायक स्मृतियों को न्योता देकर कुछ लिख पाना कितना कठिन होगा यह कोई भोगा हुआ साहित्यकार ही बता सकता है। इस साहित्य की भाषा, शिल्प आदि पर चर्चा या आलोचना के लिए हमें नए तरह के औज़ार तलाशने होंगे क्योंकि इनके अनुभव, इनकी संवेदनाएँ, संघर्ष और भाषा तक पहुँच कर ख़ुद की व्यथा दर्ज करने का इनका अनुभव नितांत अलग है, यह शोषितों का साहित्य है इसकी विवेचना या आलोचना एक शोषक करे संभव नहीं है, साथ ही साथ इस साहित्य की भाषा, शिल्प आदि भिन्न होंगे क्योंकि कौन सी भाषा सामाजिक भाषा विनियम में हमने इन्हें दिए, हमें याद रखना चाहिए। इस साहित्य को लिखने वालों ने क़दम-क़दम पर दमन सहे हैं, समाजिक शोषण के विरुद्ध आवाज बुलंद कर क़लम थामा है। 

एक शिकारी शिकार की पीड़ा को कभी नहीं लिख सकता। शिकार ही शिकार होने का दुःख समझ सकता है। दलित आलोचक ही बता सकता है कि दलित साहित्य में यथार्थ का कैसा चित्रण हुआ है? भोगे हुए आलोचक ही यह समझ और कह पाने की योग्यता भी रखते हैं। बिना सोचे इस साहित्य के दृष्टि और व्यवहार पर प्रतिक्रिया अव्यवहारिक और असंगत है। 

दलित आत्मकथाएँ :

दलित साहित्य दलित विमर्श से पैदा हुआ है और यह दलित आंदोलन की एक धारा है। यह महज़ साहित्य ही नहीं है यह संवाद, विमर्श, चिंतन, संघर्ष और समतामूलक, लोकतांत्रिक समाज के निर्माण की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण टूल (औज़ार) है। 

दलित साहित्य में लिखी गयी आत्मकथाओं ने स्वानुभूति को जन-जन तक पहुँचाया है। इन आत्मकथाओं को पढ़कर सामाजिक विसंगतियों से दमित समाज का कोड़ा सच जन-जन तक पहुँचा है। इससे हर वर्ग में न केवल सहानुभूति का माहौल बना है बल्कि इस क्रूर व्यवस्था को बदलने का प्रण भी मज़बूत हुआ है।

मोहनदास नैमिशराय की अपने-अपने पिंजरे
ओमप्रकाश वाल्मीकि की जूठन 
सूरजपाल चौहान की तिरस्कृत 
तुलसी राम की मुर्दहिया
कौशल्या बैसंत्री की दोहरा अभिशाप 
डी. आर. जाट की मेरा सफर मेरी मंज़िल 

ये आत्मकथाएँ दलित जीवन के दर्द, मूलभूत ज़रूरतों की पूर्ति हेतु किये गए संघर्ष का बोलता दस्तावेज़ हैं जो मानवाधिकार के गंभीर हनन की घटनाओं से भरा पड़ा है। 

कुछ महत्वपूर्ण दलित उपन्यास :

छप्पर - जयप्रकाश कर्दम 
मुक्तिपर्व - मोहनदास नैमिशराय 
नरवानर - शरणकुमार लिम्बाले
मिट्टी की सुगंध - प्रेम कपाड़िया
काला पहाड़ - भगवान दास मोरवाल

कुछ महत्वपूर्ण कहानी संग्रह :

आवाजें - मोहनदास नैमिशराय 
सलाम - ओमप्रकाश वाल्मीकि 
हैरी कब आएगा - सूरजपाल चौहान

दलित कविताएँ और कविता संग्रह :

दलित काव्य संग्रह सामाजिक विसंगतियों को सामने लाने में सफल रहे हैं। इन विसंगतियों के निराकरण की ज़मीन गढ़ती और संघर्ष को स्वर देती इन कविताओं ने दलित आंदोलन को मुकम्मल आवाज़ दी है। 

 प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरीक़ों से ये कविताएँ मानवाधिकार की पैरोकार हैं। ये कविताएँ दलित आंदोलन के सूत्र वाक्य गढ़ती हैं। ये दलित आंदोलन का नारा बनती हैं। ये दलित आंदोलन का गंभीर स्वर हैं। 

कुछ महत्वपूर्ण काव्य संग्रह:

सदियों का संताप - ओम प्रकाश वाल्मीकि 
बस्स बहुत हो चुका - ओम प्रकाश वाल्मीकि 
टुकड़े-टुकड़े दंश - कुसुम वियोगी
गूंगा नहीं था मैं - जयप्रकाश कर्दम 
क्यों विश्वास करूँ - सूरजपाल चौहान 

ओम प्रकाश वाल्मीकि की कविता 'ठाकुर का कुँआ–

यह कविता सभी संसाधनों पर नाग की तरह कुँडी डाल कर बैठे सवर्ण समाज की पोल खोलती है। यह कविता बताती है कि कैसे दलितों की प्यास और भूख भी संपन्न सवर्णों के यहाँ बंधक बनी हुई है। बिना सवर्णों की इजाज़त के न वे पानी पी सकते हैं, न ही अन्न पा सकते हैं। उनकी मेहनत मूल्यहीन और उनकी दशा सदैव विपन्न बनी रही उन्हें मालिकाना हक़ मिलना तो दूर उनके साथ पशुवत व्यवहार किया गया है। 

चूल्हा मिट्टी का
मिट्टी तालाब की
तालाब ठाकुर का।
 
भूख रोटी की
रोटी बाजरे की
बाजरा खेत का
खेत ठाकुर का।
 
बैल ठाकुर का
हल ठाकुर का
हल की मूठ पर हथेली अपनी
फ़सल ठाकुर की।
 
कुआँ ठाकुर का
पानी ठाकुर का
खेत-खलिहान ठाकुर के
गली-मुहल्ले ठाकुर के
फिर अपना क्या?
गाँव?
शहर?
देश?

मलखान सिंह की आत्मकथ्यात्मक शैली में लिखी गयी कविताएँ दलित विमर्श की आवश्यकता के प्रश्न का सटीक उत्तर हैं। ये कविताएँ बताती हैं कैसे दलित भाई-बहनों के साथ अमानवीय व्यवहार होते रहे हैं। ये दलित समाज पर हो रही हिंसाओं को सीधे व्यक्त करते हैं जो सरलता से मानव मन को छूती और आंदोलित करती है। एक जगह ये लिखते हैं -

“मैं आदमी नहीं हूँ स्साब
जानवर हूँ
दो पाया जानवर” 

वे दलित समाज पर उठे हिंसक हाथों का ज़िक्र अपनी कविता में करते हुए कहते हैं -

मेरी ख़ुद की थूथन पर
अनगिनत चोटों के निशान हैं” 

मलखान सिंह की इस कविता से भी दलितों की दयनीय और विवश स्थिति का पता चलता है –

सुनो ब्राह्मण - मलखान सिंह 
 
सुनो ब्राह्मण,
हमारे पसीने से बू आती है, तुम्हें।
तुम, हमारे साथ आओ
चमड़ा पकाएँगे दोनों मिल-बैठकर।
शाम को थककर पसर जाओ धरती पर
सूँघो खुद को
बेटों को, बेटियों को
तभी जान पाओगे तुम
जीवन की गंध को
बलवती होती है जो
देह की गंध से।

अनीता भारती दलित के साथ हो रहे व्यवहार से हतप्रभ हैं और एक जगह लिखती हैं –

रुखसाना तुम्हारी आँखों के बहते पानी ने
कई आँखों के पानी मरने की
कलई खोल दी है| 

असंगघोष की कविता "मैं दूँगा माकूल जवाब" दलित चेतना के उद्भव और नए भविष्य के प्रति उनकी आश्वस्ति को बड़ी सक्षमता के साथ व्यक्त करती है। इसमें उभरते और संगठित हो रहे दलित समाज की आवाज़ है जो अपने अधिकार से तो अवगत है ही साथ ही साथ उनके साथ हुए अन्याय के बोध से भी युक्त हैं। यह नया समाज है जो प्रतिकार कर सकता है और हर ग़ैरवाजिब और वाजिब प्रश्नों का उत्तर वाणी, प्रतिभा और कर्म से देने में सक्षम है। 

मैं दूँगा माकूल जवाब - असंगघोष 

समय
माँगता है
मुझसे हिसाब
पढ़े क्यों नहीं!
नहीं है इसका जवाब
मेरे पास
 
तुमने अपनी वर्जनाओं से
काट ली थी मेरी जिह्वा
मेरे होंठ ही
सिल दिए थे
मेरे कानों में
पिघला हुआ शीशा भी
उड़ेल दिया था
मेरी आँखों में
गर्म सलाखें भी
तुम्हारे ही कहने पर
घुसेड़ी गईं
 
तुम्हारी इस करनी पर
मेरी धमनियों में
खौल रहा है, बहता लहू
समय के साथ
इसका
मैं दूँगा माकूल जवाब
मेरी जगह
पढ़ेंगे मेरे बच्चे
जरूर

विश्व और मानवाधिकार :

10दिसम्बर1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने वैश्विक मानवाधिकार का घोषणा पत्र जारी करते हुए यह माना था कि यह मानव के मूलभूत अधिकारों की रक्षा करेगा। दुनिया के हर कोने में रहने वाले लोगों को बिना किसी भेदभाव के स्वतंत्रता, समानता और न्याय मिलेगा। 

भारतीय संविधान और मानवाधिकार :

ठीक इसी समय जब मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा को संयुक्त राष्ट्र संघ में स्वीकृति मिली, भारत अपने संविधान निर्माण की प्रक्रिया में लगा था। भारतीय संविधान निर्माताओं ने मानवाधिकारों को ध्यान में रख कर हमारे मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्वों का निमार्ण किया ताकि इन अधिकारों को अंगीकृत व आत्मसात किया सा सके। ये मौलिक अधिकार वास्तव में मानवाधिकार को महत्वपूर्ण कवच प्रदान करते हैं। मौलिक अधिकारों और नीतिनिर्देशक तत्वों में जिस तरह से हमने मानवाधिकार को अंगीकृत और आत्मसात किया है वह न्यायप्रिय और समतामूलक समाज में मजबूत मानवीय अधिकारों की अनिवार्य आवश्यकता को बताता है। 

भारतीय नागरिकों को निम्नलिखित मूल अधिकार प्राप्त हैं:

1. समता या समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18)
2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22)
3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24)
4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28)
5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30)
6. संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 32)

कैसे दलित साहित्य दलित समाज के मानवाधिकार के हनन की घटनाओं को सामने लाया है। इसे कुछ उदाहरण द्वारा सरलता से समझा जा सकता है:

 

उदाहरण 1

 

उदाहरण के लिए प्रेम कपाड़िया का उपन्यास 'मिट्टी की सौगंध' लें। इसमें मानवाधिकार के अनुच्छेद 3 और 5 में वर्णित मूलभूत अधिकार के हनन को दर्शाया गया है और दलितों पर हो रहे अत्याचार की तरफ समाज, सत्ता और न्याय व्यवस्था का ध्यान आकर्षित करने की साहित्यिक चेष्टा की गयी है। इस उपन्यास में दलित महिलाओं के शारीरिक, मानसिक शोषण पर प्रकाश डालने की कोशिश की गयी है। जबकि मानवाधिकार का अनुच्छेद 5 में कहा गया है किसी को भी शारीरिक यातना न दी जाएगी और न किसी के भी प्रति निर्दय, अमानुषिक या अपमानजनक व्यवहार होगा।

यह समाज में धड़ले से हो रहे मानवाधिकारक के अनुच्छेद 3 के हनन को भी दिखाता है जो कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति को जीवन, स्वाधीनता और वैयक्तिक सुरक्षा का अधिकार है।

 

उदाहरण 2

 

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी 'शवयात्रा' का ले लें

यह कहानी उच्च जातियों के दोष को ही नहीं बल्कि जातियों में बँटे दलित समाज में भी हो रहे मानवाधिकार हनन को भी बड़े मार्मिक तरीक़े से प्रस्तुत करती है। इस कहानी में मृत बच्ची के शव को सहारा देने के लिए भी कोई तैयार नहीं था। शव को जलाने के लिए लकड़ी और ज़मीन तक नहीं देने वाले समाज की काष्ठ निर्ममता पर से पर्दा उठाती यह कहानी आपको झकझोर कर रख देती है।

अपने श्रम के पैसे से भी अपना घर पक्का करने के लिए जिस तरह से ऊँची जाति के ठेकेदारों के दरवाज़े पर गुहार लगानी होती है और फिर भी अनुमति न मिलने पर मन मसोस कर रह जाना पड़ता है। इस कहानी के माध्यम से यह जाना जा सकता है कि किस तरह दलित समाज को दबाया जाता रहा है। उच्च जाति का हर कमज़ोर तबक़े को डराना, धमकाना ताकि उनकी मंशा के विरुद्ध कोई भी इन कमज़ोर लोगों की मदद न करे। यह दलित समाज के पिछड़ेपन में तथाकथित ऊँची जातियों की भूमिका को इंगित करता है। मानो मूलभूत ज़रूरत और हर सुख केवल ऊँची जाति का अधिकार हो और वे किसी शोषित को उस तक नहीं पहुँचने हेतु किसी भी प्रकार की नाइंसाफ़ी और नृशंसता पर उतर आते हैं। 

यह कहानी मानवाधिकार के अनुच्छेद 25में वर्णित अधिकारों के हनन के मार्मिक प्रसंग को दुनिया के सामने लाती है। 

अनुच्छेद 25 कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे जीवनस्तर को प्राप्त करने का अधिकार है जो उसे और उसके परिवार के स्वास्थ्य एवं कल्याण के लिए पर्याप्त हो। इसके अंतर्गत खाना, कपड़ा, मकान, चिकित्सा-संबंधी सुविधाएं और आवश्यक सामाजिक सेवाएं सम्मिलित है।

 

उदाहरण 3

 

सूरजपाल चौहान की कहानी 'घाटे का सौदा' लें इसमें अच्छी काॅलोनी में सामान्य सी ज़िंदगी के लिए जाति छिपा लेने वाले डी. लाल की विवशता को दर्शाया गया है। यह कहानी मूलभूत और लोकतांत्रिक अधिकार के प्रयोग में सामाजिक विसंगतियों की भूमिका को रेखांकित करती हैं। 

संपत्ति का अधिकार, समानता के नैसर्गिक अधिकार के हनन की घटना को प्रस्तुत करता है। यहाँ भी मानवाधिकार के अनुच्छेद 25के हनन को स्पष्टता से देखा समझा जा सकता है।

 

उदाहरण 4

 

अजय नावरिया की कहानी 'एक देर शाम में' दिनकर के साथ हो रहा व्यवहार और ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा में जिस प्रकार विद्यालय में शिक्षक पेश आते हैं। वह मानवाधिकार के अनुच्छेद 26 के प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार है, के हनन की भी कथाएँ हैं। 

अजय नावरिया की कहानियों ने तो दलित विमर्श में नयी दृष्टि जोड़ी है। इनकी प्रभावशाली कहानियों ने दलित विमर्श की भूमि को और भी सशक्त किया है। 

 

उदाहरण 5

 

मुकेश मानस की कहानी 'अभिशप्त प्रेम' में जिस तरह से राघौ की सपरिवार हत्या होती है वह समाज में मानवाधिकार के हनन की घटनाओं की ओर मज़बूती से इशारा करती है। यहाँ मानवाधिकार के अनुच्छेद 16 में वर्णित नैसर्गिक अधिकारों के गंभीर उल्लंघन को दिखाया गया है जो कहता है कि बालिग स्त्री-पुरुषों को बिना किसी जाति, राष्ट्रीयता या धर्म की रुकावटों के आपस में विवाह करने और परिवार स्थापन करने का अधिकार है। उन्हें विवाह के विषय में वैवाहिक जीवन में, तथा विवाह विच्छेद के बारे में समान अधिकार है।

 

उदाहरण 6

 

विपिन बिहारी की कहानी 'प्रतिकार' में दलित औरतों का सवर्णों के द्वारा की जाने वाले अमानवीय यौन शोषणों का मार्मिक चित्रण है। जाति व्यवस्था ने किस प्रकार दलित महिलाओं की अस्मिता को दाँव पर लगा रखी है इसका दारूण वर्णन आपके रोंगटे खड़े कर देता है। 

पुलिस, न्याय सब स्तरों पर संवैधानिक अधिकारों को नज़र अंदाज़ कर जिस तरह से दलित समाज का शोषण किया गया है, यह कहानी उसे बड़ी सहजता के साथ व्यक्त करती है। मानवाधिकार को चुनौती देते समाज के क्रूर स्वरूप को सामने रखती ऐसी कहानियाँ सामाजिक जीवन का पूरा सच समेटे हुए हैं। 

हंस 2019 के अंक में कमला दास की कहानी पैंथर का शिकार (अनुवादक - अनामिका अनु) में बड़ी स्पष्टता के साथ दिखाया गया है कि कैसे दलित जागृति के नायकों को सत्ता ने षड्यंत्र कर मौत के घाट उतारा है और उनके परिवार की महिलाओं के साथ अमानवीय क्रूरता कर दलित आंदोलन को दबाने का प्रयास किया है। 

 

उदाहरण 7

 

ओम प्रकाश वाल्मीकि की कहानी 'पच्चीस चौका डेढ़ सौ' (कहानी) में दलितों की निरक्षरता और भोलेपन का फ़ायदा उठाकर किस प्रकार उनका आर्थिक शोषण किया जाता है उसकी बानगी देखने को मिलती है। इस कहानी में छोटे से कर्ज पर ग़ैरवाजिब ब्याज लगाकर मूल को बड़ी राशि में बदलकर ग़रीब दलितों के अनवरत शोषण दिखाया गया है। इस शोषण संस्कृति पर आवाज़ उठाती यह कहानी कई ज़मीनी हक़ीक़तों से हमें जोड़ती है और सामाजिक दोषों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करती है। 

 

उदाहरण 8

 

जयप्रकाश कर्दम की कहानी 'तलाश'

 

बिना भेद-भाव के रोज़गार के अवसर पर जातिप्रथा के कुठाराघात की कहानी है जिसमें मेहनतकश, शुचिता पसंद और ईमानदार रामबती को मकान मालिक इसलिए काम से निकालने की ज़िद करता है क्योंकि वह दलित समाज से आती है। एक निर्दोष महिला हुनर रखते हुए भी अपना जीविकोपार्जन नहीं कर सकती क्योंकि उसने एक सामाजिक रूप से पिछड़ी जाति में जन्म लिया है। उसके काम करने के अवसर को कम कर देना और उसकी क्षमताओं को नज़र-अंदाज़ कर देना मानवाधिकार का गंभीर अनादर है। यह प्रगति का मार्ग तो अवरोधित करती ही है, साथ ही साथ अपनी जाति के प्रति दलित समाज को सचेत और कई बार हीन भावना से ग्रसित करने का काम करती है।

 

उदाहरण 9

 

मोहनदास नैमिशराय की कहानी 'आवाज़ें' 

 

इस कहानी में दलित चेतना को दबाने के लिए पुलिस मशीनरी का प्रयोग कर दलित पुरुषों को डकैत घोषित कर गिरफ़्तार कर देना और कानूनी संरक्षण मिलने की संभावना देख उनके घरों को आदमी सहित स्वाहा कर देने जैसी दुर्दांत घटनाओं का वर्णन है। मानवाधिकार हनन के साथ-साथ जाति के साथ जुड़े सम्मान, असम्मान और अहं को इंगित करती यह कथा मानवाधिकार हनन की घटना में पुलिस की भूमिका को भी सजगता से इंगित करती है। 

ऐसे असंख्य उदाहरण दलित साहित्य में मिल जाएँगे जो मानवाधिकार के हनन को न केवल इंगित करते हैं बल्कि उससे उत्पन्न विसंगतियों, मनोवैज्ञानिक प्रभाव, विमर्श, क्रांति और न्याय के लिए उठे क़दमों को भी बड़े जीवंत और संवेदनशील तरीक़े से प्रस्तुत करते हैं। 

साहित्य समाज का दर्पण होता है, समाज मानव समुच्चय है। मानव है तो उसके नैसर्गिक मानवीय अधिकार है। इन अधिकारों के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़, अमानवीय और अनैतिक मानी जानी चाहिए। 

 

दलित, मानवाधिकार और वर्तमान भारत :

 

भारत की जनसंख्या का लगभग 16.6 प्रतिशत लोग दलित वर्ग में आते हैं इनमें से अधितर भूमिहीन मज़दूर हैं। अनुसूचित जाति-जनजाति निरोधक कानून के बावजूद इनके मानवाधिकार का हनन होता आया है और हो रहा है। संविधान के द्वारा पाए अधिकार को समाज बड़ी निर्ममता से छीन रहा है और सत्ता, पुलिस, न्याय-व्यवस्था आज भी लगभग मूक ही है। इन्हें जितने प्रभावी ढंग से इन घटनाओं का संज्ञान लेते हुए कारवाई करना चाहिए, नहीं कर पा रही है, इसके अनेक कारण हैं। 

आज भी हरियाणा, आंध्र प्रदेश, गुजरात, उड़ीसा, बिहार, राजस्थान, उत्तरप्रदेश आदि प्रदेशों में अस्पृश्यता का प्रचलन है। रोहित वेमुला, गुना, भीम आर्मी, भीमा कारेगाँव की घटनाएँ दलितों के साथ हो रहे ग़ैरवाजिब व्यवहार को स्पष्टता के साथ इंगित करती है। खैरालांजी गाँव की घटना, दुलीना हत्याकांड, गोहाना कांड, बांसगाँव, गौमती गाँव में दलित महिला प्रधान रामसखी की सपरिवार हत्या जैसी घटनाएँ दलितों के साथ हो रहे बर्बर व्यवहार की ओर हमारा ध्यान इंगित करती हैं। 

बारात निकालने के प्रश्न पर, शादी में कार, घोड़े, कोट-टाई, शामियाना के प्रयोग पर, पक्का मकान बनाने पर जिस तरह से सवर्ण जाति के ठेकेदारों ने जुर्म किये हैं वह भी कम अमानवीय नहीं है। दलित महिलाओं का बलात्कार कर उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश, उन्हें डायन बताकर मैला पिलाने और नंगा करने की घटनाएँ हमसे छिपी नहीं है। बलात्कार को जिस तरह नीचा दिखाने के औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है वह बेहद ख़तरनाक है। इन बालात्कारों पर जिस तरह से सवर्ण महिलाओं ने चुप्पी साध रखी है वह वास्तव में महिला अस्मिता के लिए लड़ने वाली पढ़ी लिखी सवर्ण महिलाओं की चेतना पर गंभीर प्रश्नचिन्ह है। आरक्षण के विरोध में जिस तरह शिक्षित सवर्ण महिलाएँ सामने आयी थी वह भी दर्शाता है की किस तरह सवर्ण पुरुष सवर्ण शिक्षित महिलाओं को विचार भूमि देने से रोक रहे हैं और अपने अनुचर बनाने में लगे पड़े हैं। शिक्षित संवेदनशील महिलाओं की चुप्पी इस तथ्य की जीवंत पुष्टि करती है। 

19 फरवरी 2020, राजस्थान के नागौर में दो दलित युवकों को पीटकर उनके गुप्तांगों में पेट्रोल डालने की घटना बताती है किस प्रकार हमारे समाज में दलितों के मानवाधिकार को अनदेखा किया जाता है। आरोप लगाकर कभी डायन, कभी चोर बताकर भीड़ उनके साथ अमानवीय व्यवहार पर उतर आती है। ऐसे संवेदनहीन समाज में दलित मानवाधिकार के लिए आवाज़ बुलंद करता दलित साहित्य वास्तव में न केवल साहित्यिक दायित्व और समाजिक दायित्वों का तो निर्वहन कर ही रही है साथ ही साथ यह दलित आंदोलन को ऊर्जा और दिशा भी प्रदान कर रही है। समाज के हर वर्ग की आवाज़ को समान अवसर मिले और समान सजगता,  सम्मान, संयम के साथ सुना जाना बेहद जरूरी है अगर इस दिशा में की गई गंभीर कोशिशों से ही साहित्य में समाजवाद और लोकतंत्र की स्थापना संभव है। साहित्य का लोकतंत्र समानता और वर्गविहीन समाज के संश्लेषण की पृष्ठभूमि तय करता है और समाज सुधार के आंदोलन की रीढ़ को मज़बूत करता है। 


उपसंहार :

मानव के रूप में जन्म लेने भर से ही कुछ अधिकार उसकी झोली में आ जाते हैं या आ जाने चाहिए क्योंकि मनुष्य के रूप में ये उनका नैसर्गिक अधिकार है जिसको देने से कोई सभ्य समाज इंकार नहीं कर सकता। यही अधिकार मानवाधिकार कहलाती हैं। ये अधिकार मनुष्य को मनुष्य बने रहने के लिए बेहद ज़रूरी हैं और समतामूलक समाज की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करतीहैं।

भारत के मौलिक अधिकार मानवाधिकार की आत्मा को अंतर्निहित किये हैं मगर रूढ़ सामाजिक व्यवस्था ने इसके क्रियान्वयन में गंभीर चुनौतियाँ खड़ी की है। दलित साहित्य ने समाज में हो रहे मानवाधिकार के हनन की घटनाओं को उजागर कर प्रशासन, न्याय-व्यवस्था और समाज को सचेत करने का काम किया है।

इस तथ्य से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है कि दलित साहित्य समता मूलक, लोकतांत्रिक समाज के निर्माण में एक महत्वपूर्ण औजार का काम कर रही है और यह हमारे साहित्य का वह ज़रूरी हिस्सा है जो सोशल इंजीनियरिंग का काम करती आयी है।

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