विशेषांक: दलित साहित्य

11 Sep, 2020

दुख और पीड़ा के अग्नि स्नान के बाद 
गीले अनुभवों की तौलिया लिए
पोंछता हूँ मानस पटल
कंकड़नुमा चुभन 
रेत भरे घाव
टीसते हैं
हाय!
अपनी विवशता घिसती है
कोई भी क्षण
अंदर में आ कर फुंफकार दे 
कोई भी क्षण।

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