विशेषांक: दलित साहित्य

11 Sep, 2020

दूसरे का घर बनाने में 
अपना ही घर नेस्तनाबूत कर देना
कितना बेमानी है
सच को सच नहीं कह 
झूठ को चूमना है कसैले फल जैसा
फल के कसैलेपन से 
पिच सा थूक फेंकना 
मगर फेंकते नहीं घोट लेते हैं 
यही झूठ की मूठ से 
पूरा घर मटमैला हुआ पड़ा है।
 
मैंने कई बार अपने अंतर्मन को 
दबाकर 
बिना दीवारों के घर को 
घर बनाया है 
सजाया है 
लोगों को दिखाया है 
अपना मन 
मगर, विचित्र साथ है 
अनमेल भाव का 
बिना खेल का खेले ही हमसे 
हमारे घर को 
मिस1 देती भावना 
भला इतिहास क्या माफ़ कर देगा 
नहीं! नहीं! 
मैं भीतर की घुटन को 
लीलता हूँ 
सूँघता हूँ अपने घर को 
ताकि लोगों को लगे 
मैंने घर की मटमैली दीवार को 
ओढ़ लिया है 
और ओढ़ता ही रहता हूँ हर क्षण 
यद्यपि कई दाग़ हैं उनपर 
बल्कि दाग़ ही दाग़ हैं 
फिर भी अपना घर है


1.चुटकी से मसल देना 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

इस विशेषांक में
कविता
गीत-नवगीत
साहित्यिक आलेख
शोध निबन्ध
कहानी
आत्मकथा
उपन्यास
लघुकथा
सामाजिक आलेख
बात-चीत
ऑडिओ
विडिओ