तुम तो बहुत ख़र्चीली हो

15-12-2025

तुम तो बहुत ख़र्चीली हो

पवन कुमार ‘मारुत’ (अंक: 290, दिसंबर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

बहुत महँगी हो गई हो तुम, 
जैसे सोना हो रहा है प्रतिदिन। 
 
शंका होती है मन में कभी-कभी, 
सच में तुम इतनी महँगी हो गई या 
जानबूझकर कर दी गई हो। 
 
हमको पूरे पन्द्रह साल में इतना नहीं सताया तुमने, 
जितना अब सता रही हो हर साल, 
कमर ही तोड़ कर रख दी तुमने तो। 
 
अंदाज़ा इसका तब हुआ 
जब मैं पहुँचा दूकान पर, 
था छठी कक्षा का कोर्स, 
कक्षा के दुगुने हज़ार का। 
आख़िर तुम शिक्षा हो या व्यापार? 

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