चाँदी के कड़ूले
पवन कुमार ‘मारुत’
लाश मिली है खेत में,
ताज़ी-ताज़ी लाश।
शायद एक-दो दिवस ही हुए है मरे हुए,
शव औरत का है या आदमी का।
उड़ती हुई ख़बर मिली कि अधेड़ औरत थी बेचारी।
सनसनी-सी फैल गई पूरे गाँव में,
सच कहूँ तो आजकल सनसनी कहाँ फैलती है साहब?
क्योंकि संवेदना-सहेली जो मर चुकी है।
बेरहमी की भी कोई हद होती होगी,
दोनों पैर ही काट दिए बेचारी बुढ़िया के।
दिल दहल गया था,
ज़मीन खिसक गई थी पैरों तले की,
जब पता चला कि क़ातिल कौन है?
कलेजे के टुकड़े ने पैसे माँगे थे,
माँ ने नहीं दिये तो मारकर दफ़ना दिया था अपने खेत में।
और ले गया चाँदी के कड़ूले काटकर पैरों को,
क्योंकि शराब पीने की लत थी ज़बरदस्त॥
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कविता
-
- अन्धे ही तो हैं
- अब आवश्यकता ही नहीं है
- अब मैं क्या करूँ
- अफ़सोस
- आख़िर मेरा क़ुसूर क्या है
- इसलिए ही तो तुम जान हो मेरी
- ऐसा क्यों करते हो
- कमअक़्ल कौन
- काली कमाई
- कितना ज़हर भरा है
- घर
- चाँदी के कड़ूले
- चाय पियो जी
- जागरण की वेला आई है
- जूती खोलने की जगह ही नहीं है
- डूब जाना ही प्रेम है
- तीसरा हेला
- तुम तो बहुत ख़र्चीली हो
- तुम्हारे जैसा कोई नहीं
- थकी हुई जूतियाँ
- दृश्य
- देखादेखी दुखदाई है
- धराड़ी धरती की रक्षा करती है
- नदी नहरों का निवेदन
- नादानी के घाव
- नफ़रत सोच समझकर कीजिए
- प्रेम प्याला पीकर मस्त हुआ हूँ
- प्लास्टिक का प्रहार
- मज़े में मरती मनुष्यता
- रहस्य
- रोटी के रंग
- रोज़ सुबह
- विधायक साहब आने वाले हैं
- संयोग या साज़िश
- सुकून की छत
- सोया हुआ समाज
- सौतन
- हैरत होती है
- ज़िल्लत की रोटी
- विडियो
-
- ऑडियो
-