डूब जाना ही प्रेम है
पवन कुमार ‘मारुत’
नदी लहर-लहरकर चलती है
जैसे तुम चला करती थी वर्षों पहले।
उसी तरह मैं भी लहर-लहरकर चलता हूँ
आजकल तुम्हारी गली में।
दिखती तो नहीं हो तुम
पर यादों की गगरी लबालब
ज़रूर भर लेता हूँ प्रेम नदी में डूबकर॥
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