डूब जाना ही प्रेम है 

01-02-2026

डूब जाना ही प्रेम है 

पवन कुमार ‘मारुत’ (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)


नदी लहर-लहरकर चलती है
जैसे तुम चला करती थी वर्षों पहले। 
 
उसी तरह मैं भी लहर-लहरकर चलता हूँ
आजकल तुम्हारी गली में। 
 
दिखती तो नहीं हो तुम
पर यादों की गगरी लबालब
ज़रूर भर लेता हूँ प्रेम नदी में डूबकर॥

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