सुकून की छत
पवन कुमार ‘मारुत’
खुले आसमान की छत,
धरती का बिछौना।
निर्माणाधीन मकान के सम्मुख
पल्ली बिछाकर,
चार ईंटों का बना लिया चूल्हा।
अधेड़ औरत रोटी बना रही है,
पुरुष पास में ही लेटा हुआ
पी रहा है बीड़ी,
दिनभर की थकान उतारने के लिए।
बेशक अधिक साज़ो-सामान नहीं है इनके पास
पर प्यार की दो रोटियाँ है।
प्रेम भरे दो शब्द है इनके पास,
जिनके लिए तरसते है
दुनिया के बड़े-बड़े शहंशाह।
न आज की चिन्ता है ना ही कल की फ़िक्र,
है तो सुकून के प्यारे-प्यारे पल।
दो रोटियाँ खाकर चैन की नींद सोते है,
और कहीं लोभी-लालची धन-कुबेर भी,
पैसे के लिए दिन-रात रोते हैं॥
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