घर

पवन कुमार ‘मारुत’ (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

मैंने देखा है कंकड़ों पत्थरों पीतल के लिए
बड़े-बड़े महलों का निर्माण होते। 
 
परन्तु क्या कभी बनाया है घर
उन फटे-पुराने चिथड़ों में लिपटे छोटे-छोटे बच्चों के लिए
जो दर-दर की ठोकरें खाते फिरते हैं
सड़कों पर एक छत की तलाश में उम्रभर। 
 
बना सको तो बनाकर देखना कभी
सच्चा सुकून ज़रूर मिलेगा॥

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में